महंगाई से हम नहीं, हमसे महंगाई है (व्यंग्य)

neta
Prabhasakshi
एक दिन हम अपने स्थानीय नेता से भेंट कर आए। सौभाग्यवश 364 चक्कर काटने के बाद 365वें चक्कर पर दया-करुणा दिखाई। तब किसी ने हमें बताया कि वे 364 दिन खुद की और 365वें दिन अपनी जनता की सुनते हैं। हमारे पास मुँह था उनके पास कान।

पिछले साल 365 दिन थे। इस साल भी 365 दिन हैं। वही रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार हैं। फिर यह महंगाई वही क्यों नहीं है? पहले केंचुआ, फिर अजगर और अब अनाकोंडा का रूप धारण किए बैठी है। यहाँ कहने को कमीजों पर खलीते सिले होते हैं लेकिन करनी में लक्ष्मी दूर-दूर तक नजर नहीं आती। हमने जुमलों के लिए उल्लू बनकर देखा। यह सोचकर कि कम से कम सरकार न सही लक्ष्मी ही हमें अपना वाहन समझकर बैठ जाती। दुर्भाग्य से जो आदमी, आदमी न बन सका, वह उल्लू खाक बनेगा। सो हम यहाँ भी बेकार साबित हुए। काश दशहरा, दीपावली, रमजान, क्रिसमस की तरह गली-गली-कूचो-कूचों में लक्ष्मी दर्शन दे जाती। लगता है उल्लू ने अपना नाम बदलकर जुमला कर लिया है, इसलिए लक्ष्मी आजकल वहीं विराजमान हैं। 

  

एक दिन हम अपने स्थानीय नेता से भेंट कर आए। सौभाग्यवश 364 चक्कर काटने के बाद 365वें चक्कर पर दया-करुणा दिखाई। तब किसी ने हमें बताया कि वे 364 दिन खुद की और 365वें दिन अपनी जनता की सुनते हैं। हमारे पास मुँह था उनके पास कान। हमने महंगाई से बचने का रोना रोया। बदले में उन्होंने महंगाई से डटकर लड़ने का गुरुमंत्र सिखाया। कहा –दूध के बदले देशभक्ति, भोजन के बदले हवा और कपड़े के बदले देश की मिट्टी से सन जाओ। महंगाई तो क्या उसका बाप भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने आगे कहा – उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक पुलिस हमारी, वकील हमारे, मीडिया हमारा। जहाँ चाहे वहाँ जाओ। वहाँ हम ही हम नजर आयेंगे। चूंकि तुमने हमें तर्जनी अंगुली से चुना है, इसलिए हम भी तर्जनी अंगुली से बहार न सही बाहर का रास्ता तो दिखा सकते हैं।

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हम समझ चुके हैं कि महंगाई के साथ-साथ नेता भी बदल चुके हैं। दोनों के तेवरों में उछाल आया है। सच है कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है क्योंकि नेता वही हैं, मंच वही है, भाषण वही है, अलग-अलग भाषाओं में लूटने का अर्थ वही है। जहा महंगाई से वस्तुओ और सेवाओ की कीमते बढती है, तो वहीं दूसरी ओर नेता की किस्मत और जनता की गरीबी चमकती है। सच है महंगाई उस मिर्च का नाम है जो जनता की आँखों में, जनता के लिए, जनता के द्वारा झोंकी जाती है। नेता तो सिर्फ तमाशा देखने के लिए चुने जाते हैं।  

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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