दिमाग से ली गई शपथ (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  नवंबर 23, 2020   19:41
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दिमाग से ली गई शपथ (व्यंग्य)

रेकी ने सावधान खड़े होकर शपथ सुनानी शुरू की तो पापा ने कहा, 'बैठ कर ही सुना दे। आंख तरेर कर बोला पापा क्यूं अनुशासन तोड़ रहे हो। सही सीधे खड़े होकर मानो वह दिमाग से सुनाने लगा, ‘भारत हमारा देश था’, पापा बोले, ‘क्या बोल रहे हो’।

ऑनलाइन पढ़ाई वाली छुट्टियां खत्म होने के बाद, छटी क्लास में पढ़ने वाला युवा हो रहा रेकी स्कूल का बैग रिसैट करने लगा तो उसके पिता ने सोचा सिलेबस थोड़ा रिवाइज़ करवा दूं। यह अच्छा काम हो रहा था कि रेकी की मम्मी आकर बोली खुद क्यों परेशान हो रहे हो जी, ट्यूशन वाली मैडम करवा देगी, बंद करवा दूं, पैसे भी बचेंगे। पापा ने सोचा पैसे बच भी गए तो क्या रेकी का सिलेबस पढ़ाया जा सकेगा, इसलिए पापा ने रिवीज़न पर तुरंत रोक लगा दी। रेकी भागने को ही था पापा ने कहा जाते जाते वो शपथ तो सुना दे, छुट्टियों में भूल तो नहीं गया। हैड मास्टर ने उम्दा शपथ चुनी हुई है विद्यार्थियों के लिए। ऐसी शपथ हर स्कूल में दिलवाई जानी चाहिए। तुम्हारी शपथ सुनकर मुझे स्कूल के दिन याद आते हैं। क्या शपथ थी, अब तो भूल भी गए। 

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रेकी ने सावधान खड़े होकर शपथ सुनानी शुरू की तो पापा ने कहा, 'बैठ कर ही सुना दे। आंख तरेर कर बोला पापा क्यूं अनुशासन तोड़ रहे हो। सही सीधे खड़े होकर मानो वह दिमाग से सुनाने लगा, ‘भारत हमारा देश था’, पापा बोले, ‘क्या बोल रहे हो’। रेकी बोला, ‘शपथ लेते समय नहीं टोकते। कोई ऑब्जेक्शन होगा तो बाद में डिस्कस कर लेंगे'। पापा चुप तो शपथ पुनः शुरू हुई, ‘भारत हमारा देश था, नाउ इंडिया इज़ अवर कन्ट्री। हम सब भारतवासी बहनभाई होते थे। अब हम एक दूसरे के लिए मुंबई वाले ‘भाई’ हैं। बहनों ने अपना ज़िम्मा खुद संभाल लिया है। हम अपने देश से बहुत प्यार करते थे, हम अपने देश से बहुत प्यार करते हैं, हम अपने देश से प्यार करते रहेंगे। मगर मगर मगर, अब अब अब, मैं अपने आप से भी बेहद प्यार करता हूं। क्योंकि अब सब अपने आप से प्यार करते हैं। अपने काम से काम रखते हैं। हमारे देश ने दुनिया को बहुत कुछ दिया। मुझे अभी भी अपने देश की महान सभ्यता और संस्कृति पर नाज़ है। बहुत से लोग देश की कला संस्कृति, सभ्यता, धर्म, एकता व राष्ट्रीयता को सैट रखने का नेक काम कर रहे हैं। कुछ लोग ईमानदारी को भी जीवित रखना चाहते हैं मगर ज्यादातर लोग साथ नहीं देते। मैं अपने मातापिता, अध्यापकों व वरिष्ठजनों का सम्मान दिल से तो करता हूं, मगर व्यव्हारिक स्तर पर कुछ कर सकने में, उनके बताए रास्ते पर चलने में, दिन पर दिन अपने आप को विवश पा रहा हूं। स्थितिवश मैं देश व देशवासियों के सम्बन्ध में ईमानदारी से प्रतिज्ञा  करता हूं कि पूरी निष्ठा से उनके माध्यम से अपने स्वार्थों को  किसी न किसी तरीके से पूरा करके दिखाऊंगा ताकि मेरा जीवन भी सफल हो। मैं कोशिश करूंगा कि सब कुछ किनारे रख अपना उल्लू सीधा कर सकूं। इस सन्दर्भ में मुझे देश के नेता, अभिनेता, अफसर, रक्षक भक्षक से जो दिव्य प्रेरणा मिली उसके लिए मैंटली थैंकफुल हूं’।

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ओफ्फ! यह शपथ है तुम्हारी। सब भूल गए, बिगड़ गए तुम। रेकी के पापा चीखे थे। रेकी बोला, ‘रिलेक्स, रिलेक्स, रिलेक्स माई डियर पापा, लाइफ में आगे निकलना हो तो पुरानी शपथ नहीं चलती, न पुराने तरीके। अब हमारा देश भारत नहीं, न्यू इंडिया है। समय के साथ नहीं बदलूंगा तो हर कोई मेरी रेकी कर देगा। मैंने अपना नाम तभी तो बदलकर रेकी रखा है। अब तो जैसा देश में हो रहा है वैसा ही करना होगा नहीं तो रेस से बाहर होना पड़ेगा। वो पुरानी शपथ लेते लेते मुझे सब पुराना, घिसा पिटा लगता था मेरा माइंड कुछ चेंज चाहता था सो मैंने शपथ को ग्लोबल कर दिया है। एंड यू नॉट वरी, मुझे पुरानी शपथ भी याद है। टीचर के सामने वही लेता हूं, मगर आप तो मेरे पापा हो आप से झूठ नहीं बोल सकता। पापा ने गौर से देखा छटी कक्षा में पढ़ने वाला रेकी आज उन्हें अपना नहीं लग रहा था। वैसे उसने, शपथ तो सामयिक ज़रूरत के हिसाब से ठीक ली थी। उन्हें विश्वास हो चला था कि उनका रेकी अब ज़माने की रेकी कर सकेगा।

- संतोष उत्सुक







सुरक्षा विभाग के उचित सुरक्षा निर्देश (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  जनवरी 21, 2021   15:35
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सुरक्षा विभाग के उचित सुरक्षा निर्देश (व्यंग्य)

सुरक्षा अधिकारी ने परामर्श दिया कि सारे जेवरात साथ ले जाएं या फिर बैंक लाकर में रख दें। हां नकली गहने छोड़कर जा सकते हैं, जिन्हें चुराकर चोर दुख पाएंगे। यह बिलकुल सच बताया कि सर्दी के मौसम में चोरी व सेंध की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

विकास और विनाश पक्के यारों की तरह मज़े ले रहे होते हैं उधर असुरक्षा ज़िंदगी के खेत में पड़ी पराली में आग लगा रही होती है। समझदार नागरिकों को अधिक जागरूक करने के लिए, शहर के ज़िम्मेदार सुरक्षा विभाग ने नागरिक सुरक्षा समिति की बैठक की, हालांकि स्थायी ट्रेफिक जाम, अनुचित समय और मास्क न होने के कारण कम लोग आए। खूबसूरत हाल में मंच बढ़िया ढंग से सजाकर फ़्लेक्स का नष्ट न होने वाला बढ़िया बैनर लगाया गया । बैनर अंग्रेज़ी में लिखवाया गया क्योंकि हिन्दी मास जा चुका था। बिना लाल बत्ती वाली उदास गाड़ी में पधारे असली वीआईपी का ताज़ा फूलों से स्वागत किया गया जो नए पालिथिन में लिपटे हुए थे। क्षेत्र में पहली बार आयोजित इस बैठक में नागरिकों को समझाया गया, यदि आप किसी बेहद ज़रूरी काम से घर से बाहर जा रहे हैं तो इस बार बढ़िया सेंसर लॉक ज़रूर लगवा कर जाएं, आपका घर बेहद सुरक्षित रहेगा। लॉक कंपनी का बैनर हाल में लगाया हुआ था, लगा सुरक्षा विभाग के कर्मचारी का बेटा सुरक्षा उपकरणों में डील करता होगा।

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सुरक्षा अधिकारी ने परामर्श दिया कि सारे जेवरात साथ ले जाएं या फिर बैंक लाकर में रख दें। हां नकली गहने छोड़कर जा सकते हैं, जिन्हें चुराकर चोर दुख पाएंगे। यह बिलकुल सच बताया कि सर्दी के मौसम में चोरी व सेंध की घटनाएं बढ़ जाती हैं। यह राज़ खोल दिया गया कि पिछले साल छोटे से क्षेत्र में ही चोरी के डेढ़ दर्जन से ज़्यादा मामले दर्ज हुए। रिकार्ड के मुताबिक पिछले साल चोरों ने अनेक घरों से पचास लाख रूपए से ज़्यादा के गहने चुराए थे। उन्होंने यह नहीं माना कि चोर भी इंसान हैं उनके पास भी परिवार और पेट दोनों हैं, उनका व्यवसाय चोरी है जिसे उन्हें ईमानदारी व मेहनत से चलाना है। यह स्वीकार किया कि वह गहने आज तक नहीं मिले हैं हालांकि सीमित स्टाफ और कम सुविधाओं के बावजूद तप्तीश ईमानदारी से जारी है। वैसे तो नकली गहने पहनना ज्यादा सुरक्षित है या फिर पुरातन काल की तरह फूल पत्तियां पहनना शुरू कर, खुद को प्राचीन भारतीय संस्कृति से जुड़ा महसूस कर सकते हैं । 

उन्होंने आग्रह किया कि चोरी की घटनाएं न हों तो सुरक्षा विभाग भी फालतू में परेशान न होगा। सूचित किया कि ऑन लाइन सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाने बारे शीघ्र निर्णय लिया जाएगा। यह भी सुझाया कि आम लोग अगर उनके सुझावों पर अमल करेंगे तो पछताना नहीं पड़ेगा, बात तो ठीक है, मगर चोरी होने के बाद तो पछताना ही पड़ेगा। सुरक्षा विभाग की सलाह के अनुसार घर से बाहर जाते समय पड़ोसी को सुरक्षित तरीके से ज़रूर बताकर जाएं। अगर उन्हें आपके बाहर होने की सूचना नहीं होगी तो घर में चोर के घुसने की स्थिति में पड़ोसी सोचेंगे कि घर में आप ही होंगे। कभी कभार पड़ोसी को चाय, बिस्किट और नमकीन की सादा दावत देने में बहुत फायदा है। आजकल तो वैसे भी कोई नहीं आएगा। इस विशेष सलाह पर अमल करने से पड़ोसी से अच्छे रिश्तों का विकास होगा, कभी आपको भी पड़ोसियों के काम आने का मौका मिलेगा, जो उन्हें भी अच्छा लगेगा।

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व्यक्तिगत सुरक्षा, गलत पार्किंग, सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ न होने, दोपहिया वाहनों की दहशत भरी ड्राइविंग बारे गलती से पूछा तो मार्गदर्शन किया, कृपया इस बारे ऑनलाइन चैक कर लें, यह विशेष बैठक, सर्दियों के मौसम में होने वाली सिर्फ संभावित चोरियों के मामले में आयोजित की गई है। हमारे विभाग में अलग अलग सेक्शन है जो आवश्यकतानुसार, उचित समय पर ज़रूरी बैठक कर प्रेस विज्ञप्ति देते हैं। वैसे काम करने का यही सही तरीका है। यह बैठक बेहद सफल रही ऐसा अगले दिन समाचार पत्रों में छपी रिपोर्ट विद फोटो से पता चला। लोकतान्त्रिक सत्य जमा रहा कि सुरक्षा विभाग के पास आम नागरिकों की सुरक्षा के अतिरिक्त और भी बहुत से ज़रूरी राजनीतिक, धार्मिक व सामाजिक काम हैं, क्यूंकि अब यही उनकी असली ड्यूटी है। 

- संतोष उत्सुक







यूँ बुलबुलाते और फट जाते हैं (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  जनवरी 19, 2021   20:09
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यूँ बुलबुलाते और फट जाते हैं (व्यंग्य)

रात को अलार्म ऐसे लगा रखा था जैसे सुबह होते ही विश्वविजेता बनने के लिए सिकंदर की तरह कूच करना है। अब भला आपको क्या बताएँ कि घर का कुत्ता मौके-बेमौके भौंक देता है तो मैं उसको चुप नहीं करा पाता और चला था नए प्रण निभाने।

मैंने प्रण किया कि कल से अक्खी जिंदगी की लाइफ स्टाइल बदलकर रख दूँगा। देखने वाले देखते और सुनने वाले सुनते रह जायेंगे। वैसे भी मैं दिखाने और सुनाने के अलावा कर ही क्या सकता हूँ। सरकार ने रोजगार के नाम पर ज्यादा कुछ करने का मौका दिया नहीं, और हमने खुद से कुछ सीखा नहीं। हिसाब बराबर। कहने को तो डिग्री तक पढ़ा-लिखा हूँ लेकिन जमीनी सच्चाई बयान करने की बारी आती है तो इधर-उधर ताकने लगता हूँ। सो मैंने मन ही मन ठान लिया। अब कुछ भी होगा लेकिन पहले जैसा नहीं होगा। कल से सब कुछ नया-नया। एकदम चमक-धमक वाली जिंदगी। कल मेरा ऐसा होगा जो पहले जैसा कभी न होगा। बस जीवन में कल-कल होगा। कल से याद आया कि हिंदी वैयाकरणशास्त्री की मति मारी गई थी जो उन्हें भूत और भविष्य के लिए केवल एक ही शब्द मिला था– ‘कल’। कल के चक्कर में कल तक भटकता रहा। देखने वालों ने गालिब हमें पागलों का मसीहा कहा। अब यह मसीहा बदलना चाहता है तो कम्बख्त नींद भी किश्तों में मिलने लगी है। क्या करें बार-बार मधुमेह की बीमारी के चलते शौचालय के दर्शन जो करने पड़ते हैं।

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रात को अलार्म ऐसे लगा रखा था जैसे सुबह होते ही विश्वविजेता बनने के लिए सिकंदर की तरह कूच करना है। अब भला आपको क्या बताएँ कि घर का कुत्ता मौके-बेमौके भौंक देता है तो मैं उसको चुप नहीं करा पाता और चला था नए प्रण निभाने। यह अलार्म शब्द जिसने भी रखा है वह कहीं मिल जाए तो उसकी अच्छे से खबर लूँ। जब भी गाढ़ी नींद में रहता हूँ तभी अल्लाह-राम (शायद प्रचलन में यही आगे चलकर अलार्म बन गया होगा) की अजान और मंदिर की घंटी बनकर बज उठता है। मुझे आभास हुआ कि जो घरवालों की डाँट-डपट से उठने का आदी हो चुका हो उसे दुनिया के अलार्म क्या उठा पायेंगे।

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जैसे-तैसे सुबह उठा तो देखा कि सूरज अभी तक आया नहीं है। मैंने आव देखा न ताव एक बार के लिए घरवालों की क्लास लगाने के बारे में सोचा। तभी बदन को तार करने वाली ठंडी ने अहसास दिलाया कि ये तो सर्दी के दिन हैं। सूरज दादा वर्क फ्रॉम होम की तर्ज पर बादलों की ओट से छिप-छिपकर ड्यूटी किए जा रहे हैं। मैंने सोचा जिस सूरज दादा की फिराक़ में लोग आस लगाए जीते हैं वे ही साल के चार महीने सर्दी और चार महीने बारिश के चक्कर में छिप-छिपकर रहते हैं। और मात्र चार महीने गर्मी के दिनों में अपनी चुस्त-दुरुस्त ड्यूटी देकर हमारा आदर्श बने बैठे हैं। उनसे ज्यादा तो ड्यूटी मैं ही कर लेता हूँ। इस हिसाब से देखा जाए मुझे नए प्रण लेने की आवश्यकता ही नहीं है। वैसे भी न जाने कितने मोटे लोग दुबले बनने की, न जाने कितने काले लोग गोरे बनने की, न जाने कितने जड़मति बुद्धिमति बनने की कोशिश करने के चक्कर में पानी पर प्रण के लकीरें खींचते रहते हैं। उनमें हम भी एक सही। वैसे भी–

पानी के बुलबुलों-सी सोच हमारी, यूँ बुलबुलाते और फट जाते हैं।

जैसे नींद में खुद को शहंशाह और, सुबह होते ही कंगाल पाते हैं।।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त







टीका से टिकाऊ हुआ टीका (व्यंग्य)

  •  अरुण अर्णव खरे
  •  जनवरी 18, 2021   19:38
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टीका से टिकाऊ हुआ टीका (व्यंग्य)

आस्था का टीका हमारे लिए कितने महत्व का है यह हम पुरातन काल से जानते हैं। इतिहास बताता है कि युद्ध में हर योद्धा को उसकी मॉं या पत्नी टीका लगाकर ही भेजती थी जिससे उसकी बाज़ुओं में कई गुना जोश भर जाता था और दुश्मन की शामत आ जाती थी।

उन्होंने टीकाकरण से पहले टीका के डिब्बे को टीका लगाया... टीवी पर यह सीन देख कर दिल बाग़-बाग़ हो गया। ये हुई न बात... मन के भीतर से आवाज आई। हमें विश्वास हो गया कि अब विज्ञानं अपना काम करेगा। विज्ञानं और आस्था हमारे लिए हमेशा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं पर विज्ञानं से ज्यादा भरोसा हमें अपनी आस्था पर है। हम अपनी आस्था के मुताबिक ही विज्ञानं पर भरोसा करते हैं। केवल विज्ञानं पर भरोसा करना हमें नहीं आता। इसीलिए हमने जब राफ़ेल मँगाए तो उनके उतरते ही सबसे पहला काम हमने उन पर टीका लगाने का किया। हमारा मानना है कि टीका लगने से राफ़ेल की मारक क्षमता में और वृद्धि हो गई व दुश्मन के मन में भय का भाव दोगुना हो गया।

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आस्था का टीका हमारे लिए कितने महत्व का है यह हम पुरातन काल से जानते हैं। इतिहास बताता है कि युद्ध में हर योद्धा को उसकी मॉं या पत्नी टीका लगाकर ही भेजती थी जिससे उसकी बाज़ुओं में कई गुना जोश भर जाता था और दुश्मन की शामत आ जाती थी। सिर कटने के बावजूद केवल धड़ से ही घंटों युद्ध करते रहते थे हमारे पुराने जमाने के ये योद्धा। बाजुओं में जोश आ जाए तो फिर किसी की क्या बिसात जो सामने टिक जाए। बस पूर्व में हमसे यही गलती हो गई थी कि बाजुओं में जोश भरे बिना ही हमने वायरस को सबक सिखाने की ठान ली और तालियाँ बजवा दी। जैसी आशंका थी वही हुआ... तालियाँ बजीं, खूब बजीं पर कमजोर रह गईं और उनसे इतनी ऊर्जा उत्पन्न नहीं हो सकी कि वायरस भयभीत हो पाता, उलटा वह बेशर्म मेहमान की तरह घर में टिक गया। उस समय हमने ललाट पर टीका लगवा कर तालियाँ बजाने का आव्हान किया होता तो फिर फड़कती भुजाओं से निकली तालियों का असर ही कुछ अलग होता और हमें आज इस विज्ञानी टीके की जरूरत ही नहीं पड़ती।

उसके पहले भी हमसे एक गलती हुई थी। उसी गलती के कारण देश में वायरस के प्रकोप से संक्रमित मरीजों की संख्या करोड़ के आंकड़े को पार गई। देश में जब पहला मरीज़ मिला था तभी हम उसे पकड़ कर माथे पर हल्दी चावल का टीका लगा देते तो उसके अंदर जा घुसे वायरस का दम वहीं निकल जाता। दम नहीं भी निकलता तो कम से कम वह दूसरे पर चिपकने लायक तो नहीं ही बचता और हमें महामारी का इतना दुखद एवं घातक स्वरूप नहीं नहीं देखना पड़ता।

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हमारे यहाँ कहा भी जाता है कि देर आए दुरुस्त आए। सो हमने पिछली दो-दो गलतियों से सबक सीखा और उन गलतियों को सही समय पर सुधार लिया। टीका को टीका लगाकर हमने अपने टीकाकरण अभियान की शुरुआत की। डिब्बे के ऊपर आस्था का टीका क्या लगा, डिब्बे में बंद विज्ञानं के टीका में हमारी आस्था जाग गई। हमें अपनी आस्था पर हमेशा अपनी काबिलियत से ज्यादा भरोसा रहा है। टीकाकरण शुरु हुए दो दिन हो गए और कहीं से कोई शिकायत नहीं मिली... यह सुखद परिणाम आना ही था सो आ रहा है। टीका पर टीका टिप्पणी करने वाले टीका के टिकाऊ सिद्ध हो जाने से चुप हैं।

- अरुण अर्णव खरे







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