• दो आत्माओं की निजी बातचीत (व्यंग्य)

मरने वाले के मुंह में पवित्र जल डालने से उसकी आत्मा के लिए स्वर्ग के द्वार खुलने की बात मानी जाती है, घर घर में पवित्र जल रखा जाता है। हम नदी मां की गोद में तैरते रहे लेकिन नदी हमसे प्रदूषित हो गई, हमें स्वर्ग तो बिलकुल नहीं मिलेगा।

दो पड़ोसी शरीर जब आत्मा हो गए तो ब्रह्माण्ड में कहीं अमुक जगह उनकी मुलाक़ात और बात हुई। इतिहासजी हमेशा कहते रहे हैं कि जो धरती पर मिल न सके ऊपर मिल जाते हैं। मिल जाओ तो पुराने किस्से भी छिड़ जाते हैं। पहली आत्मा बोली, जब हम लाश थे, रेत में साथ साथ दबाए गए थे तब मुझे बहुत बुरा लग रहा था। एक गंदे कुत्ते ने मुझे नोचना शुरू कर दिया था लेकिन भला हो तेज़ आंधी का जिसके कारण वह परेशान होकर चला गया और शरीर बच गया। फिर तेज़ बारिश होने के कारण ऊपर से रेत हट गया लेकिन डर सताने लगा कि कहीं भेड़िया अपने साथियों को लेकर दोबारा न आ जाए। हमें जला दिया होता या गहरे दफना दिया होता तो हमारी कहानी बेहतर तरीके से खत्म हो सकती थी।

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दूसरी बोली शुक्र मनाओ इतना कर दिया, आग या मिट्टी या रेत सब प्रकृति के अंश हैं, एक समान ही समझो। हम जीवित तो रहे नहीं कि झगड़ा कर सकें या दूसरे हम पर झगड़ा करवा सकें, पहली बोली। इस महामारी ने ज़िंदगी के बाद की कई औपचारिकताएं समाप्त कर दी हैं। डर और सामाजिक दूरियां इतनी ज़्यादा बढ़ा दी, इतनी ज्यादा कि रिश्तेदारों ने भी हाथ न लगाया। असली रिश्तेदार वही लोग बने जिन्होंने नदियों से निकाला। दूसरी बोली, नदी बहुत पवित्र होती है, पाप धो डालती है, लेकिन मरा हुआ शरीर तो उसे भी अपवित्र कर देता है। नदी भी यही सोचती होंगी कि इन्हें जल्दी जैसे कैसे ठिकाने लगा दिया जाए। पहली आत्मा बोली, चलो अब तो किस्सा खत्म हो चुका, अब हमें ऑक्सीजन की ज़रूरत भी नहीं है।

कुछ क्षण दोनों चुप रहीं फिर पहली बोली, हम आत्माएं तहजीब से बात करती हैं लेकिन धरती पर जो इंसान घूम रहे हैं, खुली बदतमीजी और बेशर्मी से आपस में लड़ते हैं। क्या अब ज़िंदा लोगों के बारे कुछ न कुछ संजीदा तरीके से करना शुरू हो गया होगा। दूसरी बोली, अभी समय बदलने की असली लहरें आनी बाकी हैं। अभी तो प्रोटोकॉल के उल्लंघन की बात की जा रही है लेकिन भूख व दवाई बारे किसी उचित नियम की बात नहीं दिखती। अब भी नोटिस भेज कर काम चला रहे हैं जोकि सबसे आसान काम है। वाह! कितना विकास हो चुका है। 

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मरने वाले के मुंह में पवित्र जल डालने से उसकी आत्मा के लिए स्वर्ग के द्वार खुलने की बात मानी जाती है, घर घर में पवित्र जल रखा जाता है। हम नदी मां की गोद में तैरते रहे लेकिन नदी हमसे प्रदूषित हो गई, हमें स्वर्ग तो बिलकुल नहीं मिलेगा। जीना भी दुश्वार रहा हमारा, मरने के बाद भी हम पर राजनीति जारी है। वैसे यह सम्मान की बात है, चाहे हमारा आत्मा हो जाना कहीं आंकडा न बने लेकिन दोनों स्थितियों में व्यवहार एक समान किया गया। जीते जी भी मिटटी पलीद और मरने के बाद भी मिटटी पलीद। अब आंकड़ों को पकौड़ों की तरह तल कर, स्वादिष्ट चटनी के साथ परोसा जा रहा है, दूसरी बोली। पहली आत्मा ने पूछा, बहन, नियम कहां हैं, दूसरी आत्मा बोली वो नदी किनारे वृक्ष पर टंगे हैं।  

- संतोष उत्सुक