मिठास की दीपावली यात्रा (व्यंग्य)

मिठास की दीपावली यात्रा (व्यंग्य)

कपूरजी ने शर्माजी को दिया होगा कुछ देर बाद शर्माजी ने गुप्ताजी के यहां पहुंचा दिया होगा। श्रीमती गुप्ता ने अपने परिचितों का हिसाब करते हुए गुप्ताजी को कहा होगा मेहताजी के यहां दे आओ, शर्माजी का है अन्दर माल ठीक होगा।

दीपावली से पहले हमने जो पैकेट कपूरजी के यहां भिजवाया था, अगली सुबह वर्माजी वही डिब्बा लेकर हमारे यहां आए। हम पत्नीपति जब कपूरजी के यहां गए अच्छा हुआ, श्रीमती कपूर बाज़ार गई हुई थी, नहीं उन्हें शक हो जाता कि मिठाई बढ़िया नहीं तभी चमकते कागज़ में पैक है। श्रीमती कपूर जानती थी अब पैकिंग सामान से बड़ी और आकर्षक होती है और बड़े आकार के भड़कीले पैक से वह चीज़ निकलती है जो मंगाई नहीं जाती। कपूरजी को दिए गए अंतर्राष्ट्रीय लुक वाले पैकेट में बढ़िया क्वालिटी की मिठाई थी। हमें लगा श्रीमतीकपूर व श्रीमतीवर्मा चर्चा करती होंगी कि उनका डिब्बा इनके, इनका जिनके और किसका किसके यहां पहुंच जाता है। किसे फुर्सत रहती है देखे किसने कौन सी व कैसी मिठाई दी है। कौन से हलवाई से खरीदी है या रेडीमेड। अच्छा नहीं लगा मगर हमारा डिब्बा हमें वापिस मिल गया। पत्नी ने मुंह बिचकाया, हमारा नहीं है, हमारे वाला वापिस कयूं आएगा। मैंने कहा सर, डिब्बाजी खुद नहीं आए वर्माजी ने भिजवाए हैं। 

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कपूरजी ने शर्माजी को दिया होगा कुछ देर बाद शर्माजी ने गुप्ताजी के यहां पहुंचा दिया होगा। श्रीमती गुप्ता ने अपने परिचितों का हिसाब करते हुए गुप्ताजी को कहा होगा मेहताजी के यहां दे आओ, शर्माजी का है अन्दर माल ठीक होगा। खोल लिया तो खाई जाएगी फिर बाज़ार से एक और लाना पड़ेगा। मेहताजी ने कयूं नहीं रखा, वर्माजी के यहां कयूं भिजवाया, क्या श्रीमती मेहता ने सोचा होगा कि गुप्ता ने जानबूझ कर कम मिठाई दी है। क्योंकि वर्माजी उनके पड़ोसी हैं, दीवार के चक्कर में उनका रोज़ का झगड़ा है मगर दीवाली की शुभकामनाओं के दिखावे के लिए उन्होंने यह डिब्बा वर्माजी के यहां भिजवाया होगा, पप्पू के हाथ। क्योंकि वर्मा ने मेहता को मिठाई नहीं भिजवाई इसलिए आगे सरका दी। उन्होंने थैंक्स भी नहीं कहा होगा। मतलब यह कि पैकेट किसी ने भी खोल कर नहीं देखा कयोंकि सब को फॉर्मेलिटी करनी थी। 

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हम सभी नंगे एक वाशरूम में नहाते हैं और मगर मानते हैं सभी ने बढ़िया कपड़े पहने हैं। यदि हम पैकेट को बिना रैप किए देते तो संभवत: कपूरजी के यहां ही खुल जाता। हमारा पैकेट हमें ही मिल गया, देखूं खोलकर, बेटा बोला। मैंने उसे मना किया लेकिन उसने तुरंत ऊपर लगा कागज़ उतार दिया। अन्दर वह डिब्बा नहीं था जो हमने पैक किया था मगर साइज़ वही था। मिठाई के साथ कार्ड पर लिखा था, ‘उन्हें धन्यवाद जिनकी बदौलत इतनी स्वादिष्ट मिठाई खाने को मिली, वर्मा परिवार’। वर्माजी को विश्वास था, यह मिठाई उनके अच्छे पड़ोसी मेहताजी ने उनके लिए खरीदी नहीं होगी और कहां से आया देखने के चक्कर में डिब्बा खोल दिया होगा। वर्माजी का धन्यवाद सभी के लिए था जिनके यहां से होते हुए हमारा डिब्बा उन तक पहुंचा। हम संतुष्ट रहे हमारा वापिस नहीं आया । 

- संतोष उत्सुक