विश्वगुरु न होते हुए (व्यंग्य)

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संतोष उत्सुक । Jun 15 2026 6:59PM

विकास की तेज़ चाल विश्वगुरु बना देती है। राजनीति के सबसे प्रसिद्ध, आदरणीय और लोकप्रिय चरित्र यानी विकासजी की मेहरबानियों का सिलसिला थमता नहीं है। किसी ने ख्वाब भी नहीं लिया होगा कि चाहे हर घर में चुल्लू भर जल न हो, खाने के लिए दो वक़्त की रोटी न हो लेकिन कई कई मोबाइल होंगे।

कई साल तक यह कहते रहो कि हम विश्वगुरु हैं और बाकी सब हमारे चेले हैं। हमारे जैसा दूसरा कोई नहीं। विश्व में सब कुछ, हर कुछ सबसे पहले हमने ही किया। सबसे ज़्यादा अविष्कार हमने ही किए। दुनियावालों ने हमसे सीखा यानी संसार को हमने सिखाया। फिर किसी दिन कह दो कि विश्वगुरु होने में अभी वक़्त लगेगा तो बात कुछ हजम नहीं होती। कभी यशस्वी गुरुजन कहते रहे कि विश्वगुरु  होने के लिए, महागुरु अमेरिका को पीछे छोड़ना पड़ेगा। अब अमेरिका की ट्रम्प चालों ने दुनिया भर में तनाव, अस्थिरता, लड़ाई और झगडा फैला दिया है तो हम कह रहे हैं कि विश्व गुरु होने में समय लगेगा। ऐसे असमंजस में तैरते हालातों में विश्वगुरु होने से तो अच्छा है विश्वगुरु न होना। 

विकास की तेज़ चाल विश्वगुरु बना देती है। राजनीति के सबसे प्रसिद्ध, आदरणीय और लोकप्रिय चरित्र यानी विकासजी की मेहरबानियों का सिलसिला थमता नहीं है। किसी ने ख्वाब भी नहीं लिया होगा कि चाहे हर घर में चुल्लू भर जल न हो, खाने के लिए दो वक़्त की रोटी न हो लेकिन कई कई मोबाइल होंगे। अब मोबाइल नहीं कहा जाता बलिक स्मार्ट फोन कहा जाता है। डाटा प्रयोग करने के मामले में तो हम विश्वगुरु हैं ही और इस सन्दर्भ में हमें विश्वगुरु के रूप में पहचाना जा चुका है। कुछ भी हो जी, इंटरनेट ने गरीब, संघर्षरत युवा वर्ग व आम जनता का कल्याण कर रखा  है। सब सुसंस्कृत, मनोरंजन में व्यस्त, शांत हो चले हैं एक दूसरे को बुरा नहीं कहते, परेशान नहीं करते । किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है। सब अपनी अपनी ज़िंदगी में अस्त व्यस्त और मस्त हैं। सभी ने स्वयं को अपना गुरु मान लिया है ऐसे में विश्वगुरु मानो न मानो क्या फर्क पड़ता है।  

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वरिष्ठ नेता, महाजन, प्रसिद्धजन, धनवान और मनवान तो सदियों से खुद को महागुरु समझते रहे और दूसरों को बुद्धू चेलों का हुजूम। यह चेले समाज की कई तरह की ऊंची दीवारों और बंद दरवाजों में जीते रहे और खुद को आनंद विभोर समझते रहे और समझ रहे हैं। अब ख़ास लोगों ने समझाया है कि हम फिलहाल विश्वगुरु नहीं हैं तो हमारे विश्वगुरु न होने की घोषणा का फायदा दुनिया को होने वाला है। इस बहाने दुनिया वाले अपने बारे खुद सोचना शुरू कर सकेंगे। अपने समाज के वैचारिक निर्णय खुद लेंगे। हर क्षेत्र में बार बार प्रेरणा के लिए हमारी तरफ नहीं देखेंगे। कुल मिलाकर हमें भी लाभ होगा वह यह कि हमें इस गर्वीले विचार से आज़ादी मिलेगी कि दुनिया हमारे पीछे चल रही है, हमें बार बार लगातार देख रही है, हमारे बिना संसार का काम नहीं चल रहा । 

समझदार उच्च कोटि विचार गुरुओं का क्या है, जिस दिन चाहेंगे अच्छा सा मुहर्त निकलवा कर, अपने विश्व गुरु होने की घोषणा फिर से कर देंगे। दुनिया तो बुद्धू है ही, फिर से हमारा लोहा ही नहीं बहुत कुछ मानना शुरू कर देगी।  

- संतोष उत्सुक

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