काफी 'Power'फुल है सरकार का नया बिल, मोबाइल की तरह बिजली कनेक्शन हो सकेगा पोर्ट, फिर क्यों हो रहा विरोध

काफी 'Power'फुल है सरकार का नया बिल, मोबाइल की तरह बिजली कनेक्शन हो सकेगा पोर्ट, फिर क्यों हो रहा विरोध

कई वर्षों से मोदी सरकार बिजली पर कानून लाने की कोशिश में है। जब सरकार इस ड्राफ्ट को बिल के रूप में संसद में पेश करने की बात करती है तो हल्ला मचता है। विरोध किसान संगठनों की ओर से भी होता है राज्य सरकारों की तरफ से भी।

आप सभी मोबाइल फोन इस्तेमाल जरूर इस्तेमाल करते होंगे। इसके साथ ही अगर किसी कंपनी के सर्विस प्रोवाइड से खुश नहीं होंगे वजह चाहे खराब नेटवर्क हो या नेट का स्लो होना आप झट से मोबाइल नंबर पोर्ट कराने के बारे में सोचते होंगे। लेकिन अब बिजली के क्षेत्र में भी ग्राहकों को अपनी पसंद की बिजली कंपनी का चयन करने का विकल्प दिया जाने वाला है। मोदी सरकार परिवर्तन की एक नई पहल के अंतर्गत विद्युत क्षेत्र का कायाकल्प करने में जुट गई है। इसके अंतर्गत ही विद्युत संशोधन विधेयक को आगामी शीतकालीन सत्र में पास कराने की तैयारी में है। लेकिन जब परिवर्तन की बात आती है तो उसका विरोध अवश्य होता है। देश की मोदी सरकार जिस विद्युत संसोधन विधेयक को लेकर बिजली के क्षेत्र में एक बड़ा सुधार बता रही है वहीं विपक्ष निजीकरण का आरोप लगाकर इसका भरपूर विरोध कर रही है। ऐसे में आज के इस विश्लेषण में जानेंगे कि इस बिल पर इतना विवाद क्यों होता है औऱ क्या है इसका मसौदा और इसे एक बड़ा पॉवर चेंज क्यों बताया जा रहा है। 

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कई वर्षों से मोदी सरकार बिजली पर कानून लाने की कोशिश में है। जब सरकार इस ड्राफ्ट को बिल के रूप में संसद में पेश करने की बात करती है तो हल्ला मचता है। विरोध किसान संगठनों की ओर से भी होता है राज्य सरकारों की तरफ से भी। पिछले साल संसद में बिल को पेश करने की तैयारी थी। लेकिन विरोध ज्यादा बढ़ा तो सरकार ने पैर पीछे खींच लिए। जिसके बाद मानसून सत्र में विधेयक संसद में पेश किये जाने को लेकर सूचीबद्ध था लेकिन इसे पेश नहीं किया गया। लेकिन अब कयास ये लगाए जा रहे हैं कि आगामी शीतकालीन सत्र में सरकार इसे पास कराने को लेकर गंभीर है। 

क्या फायदा है इस बिल का 

इस बिल के आने के बाद निजी कंपनियों के लिए बिजली वितरण के क्षेत्र में आने का रास्ता खुल जाएगा, क्योंकि लाइसेंस लेने की जरूरत खत्म हो जाएगी, इससे प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा बिजली उपभोक्ताओं को होगा, क्योंकि उनके पास चुनने के लिए कई सर्विस प्रोवाइडर्स होंगे। मौजूदा वक्त में कुछ सरकारी और निजी कंपनियों का ही बिजली वितरण के क्षेत्र में दबदबा है।

कई बिजली वितरण कंपनियां होने से ग्राहकों को लाभ 

बिजली उपभोक्ताओं के पास भी उनके क्षेत्र में सेवाएं दे रही इन्हीं में से कोई एक कंपनी को चुनने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं होता है। प्रस्तावित बिल के आने के बाद मौजूदा वितरण कंपनियां अपनी सेवाएं जारी रखेंगी, लेकिन उसी क्षेत्र में दूसरी बिजली वितरण कंपनियां भी पावर सप्लाई का बिजनेस कर सकेंगी। ऐसे में उपभोक्ताओं के पास कई सारी बिजली कंपनियों में से चुनाव करने का विकल्प होगा।

बिजली काटी तो देना होगा हर्जाना

इस बिल में उपभोक्ताओं को ज्यादा ताकतवर बनाया गया है, अगर कोई कंपनी बिना बताए बिजली काटती है तो उसे उपभोक्ताओं को हर्जाना देना होगा। बिजली कंपनी को बिजली काटने से पहले उपभोक्ता को इसकी जानकारी देनी होगी। निश्चित समयसीमा से ज्यादा बिजली कटौती हुई तो भी हर्जाना देने का प्रावधान किया गया है।

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नई कंपनियों को रजिस्टर करना होगा 

ऐसी कंपनियां जो बिजली वितरण के कारोबार में उतरना चाहती हैं, उन्हें केंद्र सरकार योग्यता शर्तों का पालन करना होगा और बिजली वितरण शुरू करने से पहले खुद को वाजिब कमीशन के साथ रजिस्टर्ड करना होगा, कमीशन को भी कंपनी को 60 दिन के अंदर रजिस्टर्ड करना होगा। कमीशन रजिस्ट्रेशन को रद्द भी कर सकता है, अगर कंपनी योग्यता शर्तों पर खरा नहीं उतरती है।

किसानों को दी जाने वाली बिजली

किसानों के लिहाजे से देखें तो खेती की लागत का एक बड़ा हिस्सा होता है बिजली। जुताई, बुआई या बीज का खर्चा एक सीजन में एक बार ही लगता है लेकिन सिंचाई के लिए बिजली का खर्चा अगर तीन सीजन की खेती हो तो किसान को हर महीने पूरे साल देना होता है। कुल खर्च राज्यवार अलग-अलग है। मसलन कोई आंध्र प्रदेश का किसान है तो उसे सिंचाई की बिजली के लिए 1 रुपया नहीं देना पड़ेगा। आंध्र प्रदेश में किसानों को फ्री बिजली दी जाती है। इसके लिए करीब 7 हजार करोड़ सब्सिडी सरकार खर्च करती है। आंध्र प्रदेश की तरह तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में किसानों के लिए बिजली फ्री है। फिर वो राज्य आते हैं जहां किसानों के लिए बिजली फ्री तो नहीं लेकिन सरकार की तरफ से सब्सिडी दिए जाते हैं। इसमें भी दो तरह का सिस्टम है एक तो ये कि किसान के कुएं या पंप के लिए जो भी बिजली इस्तेमाल होती है उसके लिए मीटर सिस्टम की जगह एक निश्चित रकम ले ली जाए। जितने बीएचपी या ब्रेक हार्स पॉवर का पंप हो उसके हिसाब से डिसकॉम कंपनी एक फिक्स चार्ज का बिल किसान को भेज दे। उत्तर प्रदेश में 170 प्रति बीएचपी पंप चार्ज किया जाता है, अगर 10 बीएचपी का पंप है तो चार्ज 1700 रुपये हो जाएगा। हालांकि ये बिजली भी सबसिडाइज होती है और इसमें किसान के हिस्से की सब्सिडी सीधे डिसकॉम कंपनी को भेजी जाती है ताकि किसान को सस्ता चार्ज पड़े। दूसरा तरीका मीटर वाला है जिसमें किसान से प्रति यूनिट के हिसाब से पैसा वसूला जाता है। लेकिन रिहाइशी इलाकों के मुकाबले ये बिजली सस्ती होती है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में ये बिजली 2 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। बता दें कि बिजली की सप्लाई करने वाली कंपनियों को पॉवर डिसकॉम कहते हैं, हिंदी में बोले तो विद्युत वितरण कंपनी। देश के ज्यादातर राज्यों में डिसकॉम कंपनियां सरकारी हैं। केवल दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद जैसे गिने-चुने शहरों में ही प्राइवेट कंपनियां बिजली सप्लाई के सेक्टर में है। देश में पब्लिक सेक्टर की 41 बड़ी कंपनियां हैं। किसानों को सस्ती बिजली देने के लिए डिसकॉम कंपनियां दो काम करती है- पहली तो सरकार से सब्सिडी लेती है, दूसरी क्रॉस सब्सिडी दी जाती है। 

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किसानों को फ्री बिजली देने वाले राज्य

 

 राज्य  रेट उपभोक्ताओं की संख्या (31.03.2019)
 आंध्र प्रदेश शून्य 1740418
 कर्नाटक शून्य 2969013
 पंजाब शून्य  1378960
 तमिलनाडु शून्य 2117440
 तेलंगाना शून्य 2305318

क्या है क्रॉस सब्सिडी

क्रॉस-सब्सिडी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें अमीर उपभोक्ता औसत लागत से अधिक का भुगतान करके गरीब उपभोक्ताओं को दी जा रही सब्सिडी या सस्ती बिजली की क्षतिपूर्ति करता है। जिसके मुख्य लाभार्थी कृषि, ग्रामीण और घरेलू उपभोक्ता हैं। लेकिन राज्य सरकारें डिसकॉम का सब्सिडी वाला बिल वक्त पर नहीं देती है। जिसकी वजह से कंपनियां घाटे में चली जाती है। वित्त वर्ष 2019-20 में सिर्फ एक साल में डिसकॉम कंपनियों का घाटा 38 हजार करोड़ रुपये का था। घाटे में रहने की वजह से बिजली वितरण का तरीका भी उन्नत नहीं होता। परिणाम स्वरुप बिजली का नुकसान भी अधिक होता है। बिजली सेक्टर में इन सभी चीजों को दूर करने के लिए सुधारों की बात हो रही थी। इन सुधारों के नाम पर मोदी सरकार बिजली संसोधन विधेयक लाई है। बिजली कानून 2003 में संसोधन का ये विधेयक है। पिछले छह बरस में सरकार चार बार बिल का ड्राफ्ट तैयार कर चुकी है। हर दफा विरोध का सामना करना पड़ता है। 

किसान और राज्य सरकार को क्या आपत्ति है?

अब कोई परिवर्तन हो और विपक्षी दल उसका विरोध न करे ये असंभव है। विद्युत संशोधन विधेयक के संबंध में शिवसेना से लेकर कांग्रेस और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विरोध का रुख अख्तियार किया हुआ है। अभी तक किसानों को जो सस्ती बिजली मिलती है उस पर सब्सिडी का भुगतान सरकारें सीधे वितरण कंपनियों यानी डिसकॉम को करती हैं। नए बिल के ड्राफ्ट के आधार पर राज्य सरकार को आपत्ति है कि अगर ये संसद से पास होकर कानून बन जाता है तो सब्सिडी सीधे ग्राहकों के अकाउंट में आएगी। यानी एक बार ग्राहकों को बिजली की पूरी कीमत चुकानी पड़ेगी। नियामक संस्थाएं सब्सिडी को बिना कैल्क्यूलेशन में लाए टैरिफ़ या बिजली दर तय करेगी। उसके बाद राज्य सरकार जितनी सब्सिडी देना चाहेगी, वो सीधे ग्राहक के अकाउंट में डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर स्कीम से भेज देगी।यानी जैसे LPG सिलेंडर के लिए सब्सिडी सीधे खाते में ट्रांसफर होती है। विपक्ष के विरोध के पीछे ये दलील दी जा रही है कि विद्युत संशोधन विधेयक के कानून का शक्ल लेने के बाद निजी क्षेत्र की कंपनियां ही बिजली वितरण क्षेत्र में उतर सकेंगी। जिससे दो-चार कंपनियों का आधिप्तय खत्म हो जाएगा। कहा जा रहा है कि विद्युत संसोधन विधेयक के जरिये सरकार कुछ निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहती है। ये विधेयक राज्य सरकार की शक्तियों को सीमित कर देगा और नागरिकों से बिजली के और अधिक शुल्क लिए जाएंगे। इतना नहीं विपक्षी दलों का कहना है कि विद्युत संशोधन विधेयक 2021 बिजली वितरण को लाइसेंस से वंचित करना चाहती है। ताकि इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए निजी क्षेत्र कंपनियों के लिए प्रवेश बाधा हटाई जा सके। इससे उपभोक्ता विभिन्न सेवा प्रदाताओं में से किसी का चयन कर पाएंगे। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे डिसकॉम कंपनियों का घाटा और बढ़ जाएगा। एग्रीकल्चर सेक्टर के बजाय इंडस्ट्रियल या कमर्शियल सेक्टर में बिजली सप्लाई का ठेका लेंगी। ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विद्युत संशोधन विधेयक को लेकर एक पत्र लिखा था और इस योजना का विरोध किया था। ममता ने नए संशोधनों को जन विरोधी करार दिया था।

-अभिनय आकाश






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