रालिव, त्सालिव या गालिव: सिख का सिर, मुसलमान का घर और हिंदू की जर के नारे के साथ इस्लामिक अलगाववाद की शुरुआत

रालिव, त्सालिव या गालिव: सिख का सिर, मुसलमान का घर और हिंदू की जर के नारे के साथ इस्लामिक अलगाववाद की शुरुआत

केवल कुछ मुट्ठी भर भारतीय मीडिया ने बमुश्किल दो-तीन लाइन वाली खबरों के साथ इस नरसंहार को रिपोर्ट किया। वह भी 14-15वें पेज पर कहीं छपी थीं। वहीं इस 'जिहादी-आंदोलन' के बुद्धिजीवी और जमीनी सहानुभूति रखने वाले उग्रवादियों को पर्दे के पीछे से झूठ बोलते हुए मार्गदर्शन करते रहे।

विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' की सफलता के बाद जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक लोगों की भावनाओं में एक तरह का नया संचार देखने को मिल रहा है। यह रेचन इसलिए भी हुआ है क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों से कश्मीरी पंडितों के जनसंहार की बर्बरता को एक बड़ी साजिश के तहत छुपाया गया। या फिर इस तरह की किसी भी घटना से साफ इनकार ही कर दिया गया। जैसे कि कभी कुछ हुआ ही न हो। हालाँकि, 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन अचानक हुआ ऐसा नहीं था। किसी समुदाय/जाति का नरसंहार की व्याख्या संख्या के लिहाजे से नहीं बल्कि उनके खिलाफ किए गए अपराधों के इरादे होता है। कश्मीरी हिंदुओं के कश्मीर को जातीय रूप से साफ करने का इरादा हमेशा मौजूद था। कालानुक्रमिक रूप से देखें, तो खून के प्यासे जिहादी हमेशा कश्मीर-वादी को शुद्ध करना चाहते थे, परिणामस्वरूप उन्होंने काफिरों को घाटी से बाहर निकाल दिया।

अब्दुल कादिर के जहरीले बोल और 13 जुलाई का काला दिन

1930 के दशक से कश्मीर फिर से कट्टरपंथी इस्लाम से संक्रमित हो गया था, जिसमें अब्दुल कादिर और राघव राम कौल नामक एक कश्मीरी पंडित की आगे की पीढ़ी शेख अब्दुल्ला जैसे महत्वपूर्ण किरदार थे। इसे जम्मू कश्मीर राज्य की विडंबना ही कहा जाएगा की महीनों तक तबाही जारी रही। अनगिनत हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया, हत्या कर दी गई, अपंग कर दिया गया, लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, उनके साथ छेड़छाड़ की गई और यहां तक ​​कि जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया। मना करने वालों ने पहले अपने बच्चों को फेंक कर कुएं में छलांग लगा दी। पुलिस द्वारा चुनौती दिए जाने के बाद मारे गए कुछ जिहादियों को शहीद के रूप में सम्मानित किया गया।  हर साल 13 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में मनाकर उन जिहादी आतंकवादियों को शहीद नायक के रूप में पवित्र किया। जिसकी पटकथा 1931 के दौरान लिखी गई जब महाराजा हरि सिंह के खिलाफ अब्दुल कादिर ने आवाज बुलंद करते हुए जनसभा में भाषण देना प्रारंभ किया। उसका कहना था जो हाकिम जुल्म करे, उसको सफाए हस्ती से मिटाना होगा। अब्दुल की तरफ से महाराजा की ओर से राज्य की मुस्लिम आबादी के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार के बारे में बातचीत की गई। महाराजा के खिलाफ आग उगलने की वजह से अब्दुल को बंदी बना लिया गया।  13 जुलाई, 1931 को श्रीनगर जेल में कादिर के मामले की सुनवाई हो रही थी। बाहर एकत्रित भीड़ ने जेल के दरवाजे तोड़कर उसे छुड़ाने की कोशिश की। पुलिस को गोली चलानी पड़ी। इस गोलीबारी से 22 लोग मारे गए और अबकी बार फिर मुसलमान उपद्रवियों ने हिंदुओं की दुकानें लूट लीं और कुछ की हत्या भी की । कहा जाता है कि ये रियासत में सांप्रदायिकता का पहला वाक्या था।

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स्वतंत्रता के समय, भारत में सभी भारतीय क्षेत्रों का राजनीतिक एकीकरण, संप्रभु भारत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य था।  अगस्त 1947 को महाराजा ने अपने प्रधानमंत्री राम चंद्र काक को बर्खास्त कर दिया, जिन्होंने राज्य की स्वतंत्रता की वकालत की थी। हरि सिंह पहले से ही भारत में शामिल होने के इच्छुक थे। लेकिन उसकी एकमात्र चिंता शेख अब्दुल्ला में नेहरू की रुचि थी। उस समय के आसपास, पाकिस्तानियों कश्मीर को बलपूर्वक हथियाने की कोशिश में लगा था। जिसके मद्देनजर उन्होंने ऑपरेशन 'गुलमर्ग' शुरू किया। पाकिस्तानी सेना के नियमित नेतृत्व में फाटा (आज के तालिबान क्षेत्र) से लगभग 5,000 जिहादी जनजातियों ने 22 अक्टूबर, 1947 को इसी स्पष्ट आह्वान के साथ इस क्षेत्र पर हमला किया।

पाकिस्तान का ऑपरेशन गुलमर्ग

जब परेशान और हताश महाराजा हरि सिंह ने मदद की उम्मीद के साथ फोन किया, तो नेहरू ने  दिल्ली द्वारा उन्हें बचाने की स्थिति में नहीं होने की बात कही। राज्य बलों के मुस्लिम अधिकारियों ने महाराजा को धोखा दिया, कर्नल नारायण सिंह सम्ब्याल जैसे अधिकारियों को मार डाला और दुश्मन को कश्मीर का रास्ता दिखाया। मुजाहिदीनों ने बारामूला सेक्टर में तेजी से प्रगति की, 11000 से 14,000 निवासियों को मार डाला।  भीम्बर से मीरपुर तक कोटली और मुजफ्फराबाद से बारामूला तक हिंदुओं और सिखों का सफाया कर दिया। वे केवल लूटपाट करने, घर जलाने, महिलाओं का बलात्कार करने और युवतियों का अपहरण करने के लिए रुके थे। कबाइली हमला करते समय नारा लगाते थे, सिख का सिर, मुसलमान का घर और हिंदू की जर। यानी पाकिस्तान की सेना ने कबायलियों को हुकूम दिया था कि उन्हें जम्मू कश्मीर में जैसे ही कोई सिख दिखाई दे उसका सिर काट कर दिया जाए, जैसे ही कोई भारत समर्थक मुसलमान दिखाई दे, उसका घर जला दिया जाए और हिंदुओं की संम्पत्ति पर कब्जा किया जाए। उन्होंने अस्पतालों और मठों की भिक्षुणियों को भी नहीं बख्शा। पहले अपने बच्चों को फेंकने के बाद महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए किशनगंगा नदी में छलांग लगा दी।

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महाराजा के हस्ताक्षर और शेख अब्दुल्ला की रिहाई

जब सरदार पटेल ने नेहरू की लापरवाही के कारण कश्मीर में खोई हुई जमीन को वापस पाने की कोशिश की, तो भारतीय सैनिकों को श्रीनगर भेज दिया गया और उन्होंने अपना तेज अभियान शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में सेना ने बारामूला और जम्मू-कश्मीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर फिर से कब्जा कर लिया। लेकिन इससे पहले कि हरि सिंह ने नेहरू की दृढ़ मांग पर 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर किए, शेख अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया और उन्हें जम्मू-कश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया गया। ब्रिटिश से भारतीय नेताओं को सत्ता के हस्तांतरण ने जम्मू-आधारित हिंदू शासक से कश्मीर आधारित इस्लामी नेतृत्व को सत्ता का हस्तांतरण किया। परिणाम दुखद रहे हैं, और 70 साल पहले पैदा हुई अराजकता सुलझने से बहुत दूर है।

शेख अब्दुला को जेल, जेकेएलएफ की आहट

अपनी चालबाजी के लिए पकड़े जाने के बाद, शेख को बर्खास्त कर दिया गया और 11 साल के लिए जेल में डाल दिया गया। इस दौरान कश्मीर अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। बाद में, नेहरू को शेख के लिए बुरा लगा और उनकी मृत्यु से पहले उन्हें रिहा कर दिया गया। तभी गिलगित में जन्मे अलगाववादी अमानुल्लाह खान ने 1965 में प्लेबिसाइट फ्रंट की स्थापना की, जिसकी सशस्त्र शाखा - जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) ने जनवरी 1971 में श्रीनगर-जम्मू की विमान का अपहरण किया था। लेकिन उनकी प्रमुख आतंकी गतिविधियां 1980 के दशक में चरम पर थीं। 1971 के युद्ध में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद पाकिस्तान पर अपमानजनक प्रभाव पड़ा कि स्वतंत्र कश्मीर के लिए उनका उत्साह कम हो गया। भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच अन्य महत्वपूर्ण घरेलू समस्याएं भी थीं, जिसने कश्मीर को ठंडे बस्ते में डाल दिया। शेख अब्दुल्ला और अन्य कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं का रवैया भी बदल गया। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस्लामी जिहादी चुप थे। इस दौरान कश्मीर के इस्लामिक आतंक के पहले पोस्टर बॉय मकबूल भट ने पुलिस कर्मियों और एक स्थानीय सीआईडी ​​इंस्पेक्टर अमर चंद पर घात लगाकर हमला किया। गिरफ्तारी के बाद स्थानीय अधिकारियों ने भट को पाकिस्तान भागने में मदद की। भट पर लाहौर में एक यात्री एयरलाइन के अपहरण के मास्टरमाइंड का भी आरोप लगाया गया था। शेख अब्दुल्ला की फिर से वापसी होती है। यह तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के साथ एक समझौते (कड़ी चेतावनी) के परिणामस्वरूप हुआ। इसके बाद उन्होंने सितंबर 1982 में अपनी मृत्यु तक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने रहने के लिए लगातार चुनाव जीते। हालात बेहतर नियंत्रण में थे।

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इस्लामिक जिहाद फिर से उभरने लगा

जेकेएलएफ के अमानुल्लाह खान को पाकिस्तानी सेना द्वारा विद्रोह शुरू करने का काम सौंपा गया था, जिसने बाद में जनरल ज़िया-उल-हक द्वारा ऑपरेशन ट्यूपैक (या ज़िया योजना) के रूप में आधिकारिक मंजूरी ले ली। पाकिस्तान से प्रशिक्षित आतंकवादियों ने श्रीनगर, बारामूला, पुलवामा, भद्रवाह और अनंतनाग में तबाही मचाई। ये शहरी केंद्र आतंकी केंद्रों में बदल गए। हिंदुओं के खिलाफ दंगों, लूटपाट और आगजनी के एक तांडव और हर शुक्रवार को कई मंदिरों को जलाकर गिरा दिया जाता है और जगमोहन के लिए गुल शाह की सरकार को बर्खास्त करने और राज्यपाल शासन लगाने और बाद में 7 सितंबर 1986 को राष्ट्रपति शासन लगाने का मार्ग प्रशस्त किया।

1987 का राज्य चुनाव भारत में सबसे अधिक धांधली वाला चुनाव है जिसने मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट एमयूएफ नामक गठबंधन को जन्म दिया। गठबंधन के पीछे मुख्य ताकत पाकिस्तान समर्थक हुर्रियत प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी, जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक और हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन थे। धार्मिक जुनून को भड़काने के लिए सीमा पार से उदारतापूर्वक कट्टरपंथी मस्जिदों और मौलवियों के लिए धन का प्रवाह शुरू हो गया। 1988 के मध्य जून तक, शरिया कानून लागू करने के माध्यम से कश्मीर के इस्लामीकरण के प्रति प्रतिबद्धता की मांग करते हुए स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन आयोजित किए गए। टीवी स्टेशन और सेंट्रल टेलीग्राफ कार्यालय को निशाना बनाकर किए गए दो बम विस्फोटों को अंजाम दिया गया। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में तीन लोगों की मौत हो गई। जिहादियों के बीच फारूक की सरकार की प्रतिष्ठा धूमिल होने लगी। जुलाई और दिसंबर 1989 के बीच उनकी सरकार ने 70 कट्टर पाक-प्रशिक्षित आतंकवादियों को रिहा किया। जिहादी भावनाओं ने एक नया आतंकवादी चरित्र प्राप्त कर लिया। कश्मीरी हिंदुओं के चुनिंदा घरों पर पोस्टर चिपकाए गए और हंगामा शुरू हो गया। इसमें एक बड़ा सवाल यह है कि क्या 1989 की राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की जानकारी के बिना यह संभव हो सकता था? राज्यपाल जगमोहन ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 11 जुलाई 1989 को पूरी स्थिति से पूरी तरह अवगत कराया। बाद में उन्होंने राजीव को एक खुले पत्र में उजागर किया जो उन्होंने राजीव को पीएम रहते हुए लिखा था।

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यह स्तब्ध करने वाला था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी इस तरह की खबरों पर संज्ञान लेने और तुष्टीकरण की राजनीति के लिए कोई उचित कार्रवाई करने में विफल रहे। मानों ऐसा प्रतीत हो रहा हो कि राजीव-फारूक की जोड़ी ने कश्मीर घाटी को जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से जिहादी आतंकवादियों के हवाले कर दिया। जिहाद की खुली उद्घोषणा ने 'आजादी' की तथाकथित खोज को पीछे छोड़ दिया था।

14 मार्च, 1989: बडगाम जिले की प्रभावती की हरि सिंह हाई स्ट्रीट, श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में हत्या कर दी गई।

14 सितंबर, 1989: श्रीनगर के हब्बा कदल में जेकेएलएफ के हत्यारों ने एक प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित, वकील, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता टिक्का लाल टपलू को गोलियों से भून दिया।

4 अक्टूबर, 1989: एक पूर्व सत्र न्यायाधीश नीला कंठ गंजू  की श्रीनगर में हाई कोर्ट के पास हरि सिंह स्ट्रीट बाजार में करीब से गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या के बाद दो घंटे तक उनका शव सड़क पर ही पड़ा रहा था। बता दें कि उन्होंने ने ही मकबूल बट को फांसी देने का आदेश दिया था। बाद में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के लीडर और अलगाववादी नेत यासिन मलिक ने इस हत्याकांड की जिम्मेदारी ली थी। इसे आतंकी मकबूल भट्ट की मौत का बदला बताया था।

31 अक्टूबर 1989: श्रीनगर के शिवपोरा में जेकेएलएफ आतंकवादियों ने एक गृहिणी शीला कौल (टीकू) की गोली मारकर हत्या कर दी। जब एम्बुलेंस नहीं पहुंची, तो उसे एक तह बिस्तर पर अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे लावारिस छोड़ दिया गया।

1 दिसंबर 1989: अजय कपूर अपने इलाके में थे, जहां जेकेएलएफ के आतंकियों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी।

27 दिसंबर, 1989: अनंतनाग के 57 वर्षीय प्रमुख वकील प्रेम नाथ भट्ट को मुस्लिम आतंकवादियों ने सीधे उनके सिर में गोलियां मार दी। 

राजीव गांधी ने दिसंबर 1989 में अपने कट्टर विरोधी विश्वनाथ प्रताप सिंह के हाथों केंद्र की सत्ता खो दी। वीपी सिंह ने फारूक अब्दुल्ला के कट्टर प्रतिद्वंद्वी मुफ्ती मोहम्मद सईद को अपना गृह मंत्री बनाया। 8 दिसंबर, 1989 को गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद उग्रवादियों के हौसले और बढ़ गए। बेहद दहशत में फारूक की सरकार ने पांच खूंखार कैद जिहादी नेताओं को रिहा करने पर सहमति व्यक्त की। 19 जनवरी, 1990 का कश्मीरी हिंदू नरसंहार, कश्मीर घाटी में 'आतंकवादी शासन' के सामने सरकारों के आत्मसमर्पण का केवल अंतिम बिंदु था।

फारूक का त्यागपत्र और अगले चार दिनों तक प्रदेश सरकार विहीन

जैसे ही ठंडी, अंधेरी रात गिरी, कश्मीरी हिंदू दहशत में थे, जब घाटी इस्लामवादियों के युद्ध-नारों से गूंजने लगी, अत्यधिक उत्तेजक, सांप्रदायिक और धमकी भरे नारे। हज़ारों कश्मीरी मुसलमान लाउडस्पीकरों और भीड़-भाड़ वाली सड़कों से चिल्लाते हुए घाटी की सड़कों पर उतर आए। उन्हें एक बार फिर तीन विकल्पों दिए गए: रालिव, त्सालिव या गैलीव (कन्वर्ट हो जाओ, भाग जाओ या मारे जाओ)! हालात को भांपते हुए, फारूक अब्दुल्ला ने 18 जनवरी 1990 को मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को त्याग दिया और लंदन रवाना हो गए। उन्होंने कार्यभार सौंपने का भी इंतजार नहीं किया। 18 जनवरी 1990 से 22 जनवरी 1990 तक जम्मू-कश्मीर में कोई सरकार नहीं थी। जगमोहन, जिन्हें 19 जनवरी 1990 को फिर से राज्यपाल नियुक्त किया गया था, 22 जनवरी 1990 को ही श्रीनगर पहुंच सके। तब तक जिहादियों ने घाटी पर कब्जा कर लिया था। आतंकवादियों ने व्यवस्थित ढंग से कश्मीरी पंडितों का सफाया कर दिया। उनरे होली वॉर ने  किसी को भी नहीं बख्शा - पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सभी के साथ बिना किसी भेदभाव के समान रूप से दरिंदगी दिखाई। 

जगमोहन के शासन में नरसंहार वाली थ्योरी झूठी

केवल कुछ मुट्ठी भर भारतीय मीडिया ने बमुश्किल दो-तीन लाइन वाली खबरों के साथ इस नरसंहार को रिपोर्ट किया। वह भी 14-15वें पेज पर कहीं छपी थीं। वहीं इस 'जिहादी-आंदोलन' के बुद्धिजीवी और जमीनी सहानुभूति रखने वाले उग्रवादियों को पर्दे के पीछे से झूठ बोलते हुए मार्गदर्शन करते रहे। राज्यपाल जगमोहन की निगरानी में 1990 में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ, यह सबसे बड़ा झूठ है! सभी उपलब्ध सबूत और गवाह इस बात की पुष्टि करते हैं कि जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस सरकार और केंद्र में कांग्रेस सरकार (1986 से 1989 तक) कश्मीरी हिंदू नरसंहार से बचाने में बुरी तरह विफल रही। घाटी में अलग-अलग इलाकों में रहने वाले हिंदुओं की लक्षित हत्या कभी नहीं रुकी। दिसंबर 1990 तक, 300 से अधिक सरकारी कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी जिहादी आतंकवादियों द्वारा मारे गए थे।

पिछली सदी और उससे आगे के कश्मीर के इतिहास का निष्कर्ष है कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद और आतंकवाद कभी भी 'स्वतंत्रता संग्राम' नहीं था। कोई भी स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता पर थोपी नहीं जाती। यह  शरीयत की तलाश में लोकतंत्र को मानने से इनकार करता एक इस्लामी जिहाद था। विडंबना ये है कि दुखद क्रूरता के खिलाफ अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए, कश्मीरी पंडित केवल भाषा, बहस और चर्चा की मर्यादा खोए बिना तथ्य बताते रहे हैं। ऐसे में सरकार के लिए एक "सत्य और जवाबदेही" आयोग स्थापित करने का इससे उचित समय नहीं होगा। इस नरसंहार को अंजाम देने वाले और इसके पीछे छिपे किरदारों को भी बेपर्दा कर दे। फिर से कश्यप की धरती पर यज्ञ और मंत्र के साथ कातिल और हत्यारों पर न्याय के डंडे चले। 

-अभिनय आकाश