मनमोहन सिंह नीत UPA सरकार हो या मोदी सरकार, हर बार जाति आधारित जनगणना कराने से क्यों कर दिया जाता इनकार?

मनमोहन सिंह नीत UPA सरकार हो या मोदी सरकार, हर बार जाति आधारित जनगणना कराने से क्यों कर दिया जाता इनकार?

कोई भी सरकार चाहे वह 2011 में मनमोहन सिंह की या 2014 से अभी तक देश में मोदी सरकार हो। जाति आधारित जनगणना नहीं कराना चाहती। जिसके पीछे का एक बड़ा कारण है जाति आधारित जनगणना के बाद तमाम तरह के ऐसे मुद्दों के सामने आने की आशंका जिसकी वजह से देश की शांति व्यवस्था मुश्किल में पड़ जाए।

देश में हर दस साल के बाद जनगणना होती है। लेकिन इस बार जनगणना को लेकर विवाद इसलिए शुरू हो गया है। केंद्र सरकार ने अचानक से एक फैसला किया है औऱ फैसले के तहत ये साफ कर दिया है कि जाति आधारित जन गणना देश में नहीं की जाएगी। पिछले दो दशकों से जातिय आधारित जनगणना को लेकर मांग बहुत तेज रही। बहुत सारे सियासी दल मांग करते रहे कि देश में होने वाली जनगणना उसमें ये आकंड़े सार्वजनिक होने चाहिए कि किस जाति की कितनी जनसंख्या देश में है। आजादी के बाद से देश में जाति आधारित जनगणना कभी नहीं हुई है। हालांकि 2011 की यूपीए सरकार के दौरान कहा जरूर गया कि जातिय आधारित जनगणना हुई है लेकिन वो आंकड़े टेबल नहीं किए गए। सार्वजनिक नहीं किया गया। लेकिन इसको लेकर भी तमाम तरह के मतभेद हैं कि अगर जाति आधारित जनगणना हुई थी तो इसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया,जबकि इसके बाद 3 वर्षों तक मनोमहन सरकार का कार्यकाल चला था। बहरहाल, बीजेपी के केंद्र में सरकार है। जिसकी तरफ से ये साफ किया गया है कि केवल एससी/एसटी के आंकड़े ही अलग से पता किए जाएंगे। लेकिन ओबीसी और सामान्य वर्ग के आंकड़े अलग-अलग जारी  नहीं होंगे। जिसको लेकर विपक्ष हमालवर हो गया है।

 क्या है जाति आधारित जनगणना?

भारत में जनगणना का इतिहास काफी पुराना है। 1872 में इस देश में पहली जनगणना होती है जिसे अंग्रेजों ने कराया। जनगणना एक ऐसा टूल है जिसका इस्तेमाल दुनिया के लगभग सारे देश करते हैं। ताकि देश को बेहतर तरीके से समझा जा सके। कितने लोग हैं, उनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति क्या है? उसके हिसाब से कैसी नीतियां बनाई जाए। कोशिश ये होती है कि जनगणना में ज्यादा से ज्यादा तरह के आंकड़े इकट्ठे किए जाएं। जैसे भारत में तीस तरह के आंकड़े इकट्ठा किए जाते हैं। भारत में जनगणना 1872 से हो रही है और यह सिलसिला कभी टूटा नहीं है और वर्ष 1931 तक सभी जातियों की गिनती होती थी। जिसके कई रिपोर्ट्स आज भी आपको देश की कई लाईब्रेरी में मिल जाएंगे। 

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1931 के बाद देश में नहीं हुई जाति आधारित जनगणना 

1941 में अगली जनगणना होनी थी और इसकी प्रक्रिया शुरू भी गो गई। लेकिन उस समय दूसरा विश्व युद्ध भी शुरू हो गया। उस जनगणना में काफी आंकड़े एकत्रित किए गए लेकिन जनगणना पूरी नहीं हो पाई। जिसकी वजह से इसके आंकड़े का टेब्यूलेशन नहीं हुआ। 1931 तक निरंतर जनगणना हुई और जाति के आंकड़े भी इकट्ठे किए जाते रहे। 1951 में अगली जनगणना होनी थी और तब तक देश आजाद हो गया। उस वक्त देश के नीति निर्माताओं ने आधुनिक प्रणाली अपना रहे हैं और जाति की पहचान अब धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। इसलिए जाति को नहीं गिनने का फैसला लिया गया। यही वजह है कि आज भी जब कभी जाति के किसी भी आंकड़े की जरूरत होती है तो 1931 की जनगणना रिपोर्ट का हवाला दिया जाता है। इसी आंकड़े के आधार पर बताया गया कि देश में ओबीसी आबादी 52 फीसदी है। जाति के आंकड़ों के बिना काम करने में मंडल आयोग को काफी दिक्कत आई और उसने सिफारिश की थी कि अगली जो भी जनगणना हो उसमें जातियों के आंकड़े इकट्ठा किए जाएं। इसमें एक दिलचस्प बात ये है कि संविधान में ये प्रावधान है कि एससी/एसटी को आबादी के हिसाब से लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में सीटें आरक्षित की जाएगी। उनकी संख्या जाने बिना ऐसा करना मुमकिन नहीं। 1951 में एससी/एसटी को गिना गया। सारे धर्मों की गिनती हुई, सभी भाषाओं के लोगों को गिना गया केवल जाति आधारित जनगणना नहीं हुई। 

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 मौजूदा सरकार का क्या है स्टैंड?

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में लिखित जवाब देकर कहा कि जातिय आधारित जनगणना नहीं होगी और केवल /एसटी के आंकड़े ही अलग से पता किए जाएंगे। अपने नवीनतम बयान से पहले, नित्यानंद राय ने 10 मार्च को भी राज्यसभा को बताया था: "स्वतंत्रता के बाद भारत संघ ने एससी और एसटी के अलावा अन्य जाति के अनुसार आबादी की गणना नहीं करने की नीति के रूप में निर्णय लिया। लेकिन 31 अगस्त, 2018 को, तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक के बाद, जिसमें जनगणना 2021 की तैयारियों की समीक्षा की गई थीब प्रेस सूचना ब्यूरो ने एक बयान में ये कहा था कि 'ये उल्लिखित है कि पहली बार ओबीसी डाटा भी इकट्ठा किया जाएगा। जब द इंडियन एक्सप्रेस ने बैठक के मिनटों के लिए एक आरटीआई अनुरोध दायर किया, तो ओआरजीआई ने जवाब कि इस मीटिंग में ओबीसी डाटा का उल्लेख नहीं हुआ और ना ही इस मीटिंग के कोई मिनट्स जारी किए गए।

यूपीए सरकार का क्या था स्टैंड 

2010 में तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर 2011 की जनगणना में जाति/समुदाय के आंकड़ों के संग्रह की मांग की थी। 1 मार्च, 2011 को, लोकसभा में चर्चा के दौरान गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि जनगणना का उद्देश्य लोगों की गणना करना है और इसमें जाति का प्रावधान करने से जनगणना की प्रक्रिया जटिल हो जाएगी। ओबीसी की एक केंद्रीय सूची और ओबीसी की राज्य-विशिष्ट सूची है। कुछ राज्यों में ओबीसी की सूची नहीं है; कुछ राज्यों में ओबीसी की एक सूची है और एक उप-समूह है जिसे सबसे पिछड़ा वर्ग कहा जाता है। रजिस्ट्रार जनरल ने भी ये कहा था कि इस सूची में कुछ नई और कुछ खत्म हो गई श्रेणियां भी हैं, जैसे अनाथ और निराश्रित बच्चे। अनुसूचित जाति की सूची और ओबीसी की सूची दोनों में कुछ जातियों के नाम मिलते हैं। ईसाई या इस्लाम में परिवर्तित अनुसूचित जातियों के साथ भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग व्यवहार किया जाता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवासी की स्थिति और अंतरजातीय विवाह के बच्चों की स्थिति, जाति वर्गीकरण के संदर्भ में, भी विवादास्पद प्रश्न हैं। संसद में भारी हंगामे के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री ने कहा था कि "मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मंत्रिमंडल शीघ्र ही निर्णय लेगा। बाद में, वित्त मंत्री स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी के नेतृत्व में मंत्रियों के एक समूह का गठन किया गया। कई दौर के विचार-विमर्श के बाद, यूपीए सरकार ने सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना (एसईसीसी) कराने का फैसला किया।।

एसईसीसी के आंकड़ों का क्या हुआ

4,893.60 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी क्षेत्रों में आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना शुरू की गई। लेकिन इससे जातिगत डाटा को अलग ही रखा गया। इसके डाटा को दोनों मंत्रालयों ने मिलकर 2016 में प्रकाशित किया। कच्चे जाति डाटा को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को सौंप दिया गया, जिसने डेटा के वर्गीकरण और वर्गीकरण के लिए नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पंगारिया के तहत एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया। यह स्पष्ट नहीं है कि समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की या नहीं, लेकिन अब तक ऐसी कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। 31 अगस्त, 2016 को लोकसभा अध्यक्ष को प्रस्तुत ग्रामीण विकास पर एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में SECC के बारे में बताया गया है।

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आरएसएस का क्या है मानना?

आरएसएस ने हाल ही में जाति जनगणना पर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन पहले इस विचार का विरोध किया है। 24 मई 2010 को आरएसएस के उस वक्त के सर-कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने नागपुर से एक बयान में कहा था कि हम कैटेगरीज को पंजीकृत करने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जाति दर्ज करने के विरोध में हैं। उन्होंने कहा था कि जाति आधारित जनगणना संविधान में बाबा साहेब अंबेडकर जैसे नेताओं द्वारा परिकल्पित जातिविहीन समाज के विचार के खिलाफ है और सामाजिक सद्भाव बनाने के लिए चल रहे प्रयासों को कमजोर करेगी। 

कई राज्यों ने पास किया प्रस्ताव 

बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने जातिय जनगणना कराने का दवाब बनाने के लिए राज्य से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा। उत्तर प्रदेश में भी जातिय जनगणना की गूंज सुनाई दी। बिहार विधानसभा से दो-दो बार जाति आधारित जनगणना कराने की मांग हो चुकी है। हाल के बयानों से जेडीयू ने ये साफ कर दिया है कि वो अपने पुराने स्टैंड पर अडिग है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर कहा कि देश में जातिगत जनगणना होनी चाहिए। इससे SC/CT के अलावा अन्य कमजोर वर्ग की जाति की वास्तविक संख्या के आधार पर सभी के विकास के कार्यक्रम बनाने में सहायता मिलेगी।

केंद्र सरकार के हिचक की वजह

 जाति भारतीय समाज की एक सच्चाई है, जिसकी कोई अनदेखी नहीं कर सकता। हमारे समाज और राजनीति में जाति से ही तमाम चीजें तय होती हैं। ऐसे में बड़ा सवाल कि आखिर जब अनुसूचित जातियों और जनजातियों की जनगणना हो सकती है तो शेष वर्गों की क्यों नहीं? दरअसल जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट आई थी, और 90 के दशक में उसे लागू कराने की बात हुई तो उसके बाद देश में खूब बवाल मचा था। यही वजह है कि कोई भी केंद्र सरकार चाहे वह 2011 में मनमोहन सिंह की सरकार रही हो या 2014 से अभी तक देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार हो। जाति आधारित जनगणना नहीं कराना चाहती। जिसके पीछे का एक बड़ा कारण है जाति आधारित जनगणना के बाद तमाम तरह के ऐसे मुद्दों के सामने आने की आशंका जिसकी वजह से देश की शांति व्यवस्था मुश्किल में पड़ जाए और आपसी भाईचारा व सौहार्द बिगड़ जाए। कई ऐसे पहलु हैं जो जाति आधारित जनगणना के बाद सामने आ सकते हैं। मसलम, जिन लोगों की संख्या कम होगी वे अधिक बच्चे पैदा करने पर जोर दे सकते हैं। हर क्षेत्रीय दल जो किसी न किसी जाति विशेष की राजनीति करता है उसका जाति आधारित जनगणना की मांग करना, उसकी सियासी मजबूरी भी है और चुनावी लाभ पाने के लिहाजे से जरूरी भी। जाति आधारित जनगणना से उस जाति की स्थिति पता चल सकेगी जिस जाति की वह राजनीति करते हैं। इससे उन्हें अपनी शक्ति का अंदाजा होगा। हालांकि उनके छोटे से लाभ के लिए देश में बवाल कराना और आपसी भाईचारा व सौहार्द बिगड़ने का रिस्क उठाना सही नहीं है। -अभिनय आकाश







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