दिल्ली दंगों के 1 साल: हे भगवान ऐसी फरवरी कभी न आए!

दिल्ली दंगों के 1 साल: हे भगवान ऐसी फरवरी कभी न आए!

दिल्ली दंगों को एक बरस पूरे हो गए। लेकिन आज भी उस दिन की बर्बरता और दहशत दिल्लीवालों के जेहन से गई नहीं। आग किसने लगाई और लगाई तो क्यों लगाई? किसकी दुकान में लगाई, किसकी छत से पत्थर बरसे। किसके घर से चली गोलियां।

कितनी मामूली हसरतें होती है एक साधारण आदमी की। मेहनत के पसीने से बरक्कत की दो रोटियां, गुजारे लायक छत, बच्चों को तालीम मिल जाए और सोते हुए खिड़कियों के कांच का टूट जाने का अंदेशा ना हो। डर न लगे घर से बाहर निकलते हुए। ईश्वर और अल्लाह के नाम पर उठाई हुई दीवार चकनाचूड़ ना कर दे आदमी होने का भ्रम। 23 फरवरी एक तारीख नहीं बल्कि एक सबक है जिससे ये साबित होता है कि हिंसा की आग मजहब नहीं देखती। अपनों को खोने का गम हर तबके का एक जैसा ही होता है। दिल्ली दंगों को एक बरस पूरे हो गए। लेकिन आज भी उस दिन की बर्बरता और दहशत दिल्लीवालों के जेहन से गई नहीं। दिल्ली में ऐसी नौबत क्यों आई? किसकी गलती थी? किसने शुरुआत की, किसके बयान ने भड़काया? सड़क बंद करने की वजह से दंगा हुआ। या सड़क खोलने की कोशिश में दंगा हुआ। आग किसने लगाई और लगाई तो क्यों लगाई? किसकी दुकान में लगाई, किसकी छत से पत्थर बरसे। किसके घर से चली गोलियां। ये तो बस सवाल हैं और इनके जवाब किसी को जिंदा नहीं कर सकते हैं। इनके जवाब राख से जीवन को वापस खड़ा नहीं कर सकते हैं। इनके जवाब नहीं हटा सकते वो गांठे जो दिलों में पड़ चुके हैं। लेकिन आखिर हुआ क्या ऐसा कि दिल्ली का दिल एक दूसरे की सलामती के लिए धड़कना बंद हो गया। दंगा भड़काने वाले सलाखों के पीछे पहुंचे जरूर हैं लेकिन नेताओं की जुबानी राजनीति के अखाड़े अब भी जारी हैं। पिछले एक बरस में जांच-पड़ताल जितनी आगे बढ़ी उतनी तेजी से दोनों तरफ के दिए गए बयानों पर सियासत भी जमकर हुई। यहीं वजह है कि दंगे के एक साल के बाद भी जख्म भरे नहीं है। 

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दिल्ली में कहां-कहां हुई थी हिंसा?

  • जाफराबाद
  • करावलनगर
  • भजनपुरा
  • चांदबाग
  • गोकुलपुरी
  • कर्दमपुरी
  • मौजपुर
  • बाबरपुर
  • यमुना विहार
  • खजूरी खास

पुलिस की जांच में क्या सामने आया

  • सीएए-एनआरसी के नाम पर विरोध के भड़कने वाले दंगों में 53 लोगों की जान गई। 
  • 400 से ज्यादा लोग घायल हुए।
  • 327 दुकानें जलकर खाक हुई।
  • 25 हजार करोड़ की संपत्ति स्वाहा हो गई।
  • दिल्ली पुलिस ने 755 एफआईआर दर्ज किए।
  • 349 मामलों में चार्जशीट दायर हो चुकी है।
  • 406 केस में जांच चल रही है।
  • 755 मामलों में से 62 की जांच दिल्ली पुलिस की एसआईटी कर रही है और एक केस की स्पेशल सेल।
  • इसी केस में दंगों की सुनोयोजित साजिश की जांच में उमर खालिद जैसे लोगों की गिरफ्तारी हुई।
  • 1825 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 

23 फरवरी 2020 को गुजरात के अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी। एक दिन बाद अमेरिका राष्ट्रपति भारत आने वाले थे। पिछलेलकई हफ्तों से दिल्ली के शाहीन बाग में धरना चल रहा था। ऐसा ही धरना दिल्ली के मौजपुर में शुरू हुआ। मेट्रो लाइन के पास प्रदर्शनकारी बैठ गए। 22-23 फरवरी के दरमियान रात को जाफराबाद मेट्पो स्टेशन के पास भी रास्ता रोककर प्रदर्शन शुरू हो गए थे। सीएए आंदोलन के वक्त प्रदर्शन बनाम प्रदर्शन का दौर चला। सीएए के विरोध में भी रैलियां हो रही थी और पक्ष में भी। इसी तरह धरने का जवाब भी धरने से दिया जा रहा था। जाफराबाद मेट्रो के नीचे सीएए के विरोध में धरना और मौजपुर मेट्रो स्टेशन के नीचे रास्ता खुलवाने की मांग वाला प्रदर्शन जिसकी अगुवाई बीजेपी के नेता कपिल मिश्रा कर रहे थे।

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 इसी दिन सीएए समर्थकों और विरोधियों में पत्थरबाजी शुरू हुई। पहले दिन पुलिसवालों समते कई जख्मी हुए लेकिन बात सिर्फ पत्थरबाजी तक सीमित नहीं रही। अगले दिन अहमदाबाद में ट्रंप की मेहमानवाजी चल रही थी और इसके बीच देश की राजधानी में पत्थरबाजी, आगजनी और गोलियां चल रहीथीष दंगा हो रहा था। पुलिस की गाड़ियों में आग लगाई जा रही थी, पेट्रोल पंप जलाए जा रहे थे और एक दूसरे का कत्ल होरहा था। मौजपुर और जाफराबाद के अलावा दिल्ली के भजनपुरा, चांद बाद और गोकुलपुरी जैसे इलाकों में हिंसा हुई। हालात पूरी तरह से काबू करने में एक हफ्ते का वक्त लगा। 26 फरवरी को शाम के साढे चार बज रहे थे। दिल्ली के सबसे ज्यादा हिंसा प्रभावित क्षेत्र में आंखों पर काला चश्मा, काले कोट और रौबदार अंदाज में सुरक्षाकर्मियों से घिरे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की एंट्री होती है। डोभाल गाड़ी से नीचे उतरकर इलाकों में पैदल चलकर यहां के रहवासियों से मिलकर बात की उन्हें ये समझाने की कोशिश की कि सरकार हालात सामान्य करने की कोशिश में लगी है। स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए उन्होंने कमान अपने हाथों में ले ली है। पुलिस ने हालात को अपनी मुट्ठी में लिया और यूं कहे कि काबू में ले लिया और ये कब हुआ जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उन हिंसाग्रस्त इलाकों में गए और फिर अगले दिन मौजपुरा इलाके में जाकर लोगों से बातचीत की और पूरी रिपोर्ट गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंचाई। 

दंगों के पीछे पीएफआई की भूमिका

उत्तर पूर्वी दिल्ली में 23 फरवरी से 26 फरवरी के बीच हुए दंगों में दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में डो प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पेश की थी, उसमें इस बात का जिक्र  था कि दंगे में पीएउआई का भी हाथ था। इसके साथ ही पुलिस की स्पेशल सेल ने पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के सक्रिय सदस्य मोहम्मद दानिश को गिरफ्तार किया और दिल्ली हिंसा में सुनियोजित होने की बात सामने आई। गिरफ्तारी के बाद दानिश ने कई खुलासे भी किए और बताया कि कैसे वह बाहर से लोगों को लेकर आया दिल्ली में दंगे कराए। दिल्ली की हिंसा में भूमिका निभाने वाला दानिश शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों को खाना बांटता था। इसके साथ ही जांच में प्रदर्शनकारियों के बीच पैसा भी बांटने का खुलासा हुआ। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पीएफआई के अध्यक्ष परवेज और सेक्रेटरी इलियास को भी गिरफ्तार किया। इन पर दिल्ली दंगों में फंडिंग करना का आरोप लगा। 

ताहिर हुसैन को भला कौन भूल सकता है

दिल्ली का खजूरी खास इलाका जहां ताहिर हुसैन का घर है। उन दिनों उसका घर दंगाईयों का अड्डा बन गया था। दिल्ली दंगों का उसे मास्टरमाइंड माना जाता है। इस वक्त वो जेल की सलाखों के पीछे है। उसके घर से पेट्रोल बम, बड़े-बड़े पत्थर, पत्थर फेंकने वाली बड़ी गुलेल मिले थे। पुलिस की चार्जशीट में ताहिर पर आरोप है कि जनवरी के दूसरे हफ्ते में 1.1 करोड़ रुपये शेल कंपनियों में ट्रांसफर करवाए फिर बाद में उन पैसों को कैश में ले लिया। ताहिर ने दंगे सिर्फ एक दिन पहले खजूरी खास थाने में जमा अपनी पिस्टल निकलवाई थी। ऐसा क्यों किया इसका ताहिर के पास जवाब नहीं मिला। पुलिस का दावा है कि खजूरी खास इलाके में रहने वाले ताहिर नॉर्थ ईस्ट दंगों के मास्टरमाइंड में से एक है। 

रतन लाल ड्यूटी पर थे और अंकित शर्मा ड्यूटी से लौट रहे थे...

तत्कालीन विंग कमांडर अभिनन्दन की तरह मूँछें रखने वाले हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल को पीट-पीट कर मार डाला गया था। रतनलाल को उन्मादी भीड़ द्वारा उस समय बेरहमी से मारा गया था, जब वह चाँद बाग के वजीराबाद रोड पर अपनी ड्यूटी कर रहे थे। हेड कॉन्सटेबल रतन लाल की पत्नी पूनम फिलहाल अपने तीन बच्चों के साथ जयपुर में रह रही हैं। बीबीसी ने उनसे बात की जिसमें रतन लाल की पत्नी ने घटना वाले दिन को याद करते हुए कहा कि उस समय बच्चों की परीक्षा चल रही थी तो बच्चे जल्दी उठकर तैयार हो गए थे। पूनम बताती हैं कि वो सोमवार का दिन था तो उनका व्रत भी था, सेब काटकर दिये और वो सिर्फ सेब खाकर ही ड्यूटी पर चल गए। बाद में पूनम को रतनलाल के मारे जाने की खबर पड़ोसियों से लगी। 

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जब-जब फरवरी आएगी, आएंगे तीज-त्यौहार अपने बेटे को याद कर अंकित की मां रोएंगी। क्योंकि उनका बेटा हाथों से एक झटके में पिसल गया। कहकर गया था कि अभी लौट आऊंगा। लेकिन लौटा नहीं। लौटी तो वो खबर जो जिंदगी भर टीस बनकर सीनों में उभरती रहेगी। नौजवान की ऐसी नृशंस हत्या के लिए कहां से आई इतनी नफरत की अंकित के जिस्म को चाकुओँ से इतनी बार गोदा गया कि दरिंदगी की सारी हदें पार हो गईं। अंकित का परिवार छह महीने पहले खजूरी खास से गाजियाबाद इलाके में शिफ्ट हो चुका है। बीबीसी से बात करते हुए अंकित के भाई अंकुर शर्मा ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि कोई सोच भी नहीं सकता है कि कैसा लगता था जब हम घर से बाहर निकलते थे और वो नाला पार करते थे। हर बार अंकित याद आता था। 

कितना बदला इलाका

पत्थर जिस्मों पर ज्यादा पड़े या अक्ल पर, आग दुकानों में ज्यादा लगे या दिलों पर। नुकसान संपत्ति का ज्यादा हुआ या भाई चारे का। जख्म जिस्मों पर ज्यादा लगे या मुल्क की रूह पर। दंगों की हिंसा के निशान तो शायद वक्त के साथ मिट भी जाएं लेकिन कलंक के वो दाग कैसे मिटेंगे जो दंगाईयों ने दिल्ली के माथे पर लगा दिए। पटरी से उतरी जिंदगी धीरे-धीरे वापस पटरी पर लौट रही है। लेकिन ये जवाब कौन देगा कि क्या वो लोग भी वापस घरों को लौटेंगे जो इन दंगों की भेंट चढ़ गए। 

सामानों से बाजार फिर सज जाएंगे, त्यौहार आएंगे तो रौनकों चहल पहल से गलियां फिर गुलजार हो जाएगी। लेकिन जिन लोगों की मौत दंगों में हुई उनके परिवार के जख्म एक साल बाद भी नहीं भर पाए। ज्यादातर के परिवार वालों ने वह जगह छोड़ दी है। वहीं एक साल बाद भी नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में एक साल बाद भी गलियों में हल्का सा शोर सुनाई देने पर लोगों के चेहरों पर दहशत की रेखाएं आज भी देखी जा सकती है। सबसे अधिक शिव विहार में ही मकानों और दुकानों को दंगाइयों ने आग के हवाले किया। यहां कि स्थिति ऐसी है कि लोग तो लौट आएं लेकिन काफी लोग हमेशा के लिए अपना मकान ही छोड़कर चले गए। भजनपुरा, मौजपुर, मुस्तफाबाद आदि इलाकों में अब लोहे के गेटों से लैस हो गई है। 

अंदेशों के अंधेरों से निकलर लोग तलाश रहे हैं सुरंग पार की रोशनी और देखने की कोशिश कर रहे हैं नए ख्वाब। मिटी हुई लकीरों पर फिर से विश्वास के महल खड़े करने को कोशिशें जारी हैं। लेकिन जो गुजरी है उसके अहसास के गुजरने में बरसों लगेंगे। कहने को कुछ भी कह ले हम और कुछ भी कह ले आप लेकिन वक्त लगेगा। जो बीता है उसे भरने में अभी लंबा वक्त लगेगा...अभिनय आकाश






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