कांग्रेस की समिति से G-23 का पत्ता साफ, इंदिरा से सोनिया तक यूं बगावत पर किया काबू

कांग्रेस की समिति से G-23 का पत्ता साफ, इंदिरा से सोनिया तक यूं बगावत पर किया काबू

देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी में इन दिनों भीतरी असंतोष की चर्चा के बीच जानें की अतीत में भी विद्रोह होता रहा है। लेकिन उसे संभाल लिया गया। इस बार कहा जा रहा है कि ऐसे हालात तब बने हैं, जब इतिहास में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुज़र रही है।

''हम सिमटते गए उनमें और वो हमें भुलाते गए, हम मरते गए उनकी बेरुखी से, और वो हमें आजमाते गए''

संसद 14 सितंबर से सजेगी, हंगामा खूब सुनेंगे। मुद्दें खूब उठेंगे। इन सब के बीच संसद के मॉनसून सत्र से पहले कांग्रेस ने कई नियुक्तियां की हैं। संसद के सत्र में मोदी सरकार को घेरने के लिए पांच-पांच लोगों की टीम बनाई गई है। इसके लिए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गौरव गोगोई को लोकसभा में पार्टी का उपनेता और रवनीत सिंह बिट्टू को डिप्टी व्हिप नियुक्त किया है। वहीं, राज्यसभा की टीम में वरिष्ठ नेता अहमद पटेल और महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल को जोड़ा गया है। कांग्रेस ने जयराम रमेश को राज्‍यसभा में पार्टी का चीफ व्हिप बनाया है। गम में कुछ गम का मशगला कीजिए, दर्द की दर्द से दवा कीजिए। पूर्णकालिक एवं जमीनी स्तर पर सक्रिय अध्यक्ष बनाने और संगठन में ऊपर से लेकर नीचे तक बदलाव की मांग को लेकर सोनिया गांधी को 23 वरिष्ठ नेताओं की ओर से पत्र लिखे जाने से सोनिया गांधी बहुत आहत हुई थीं। राहुल गांधी भी बहुत आहत और क्रोधित दिखे थे। गांधी परिवार के दर्द की दवा कांग्रेस पार्टी ने पांच सदस्यों की समिति बनाए जाने से की जिसमें लेटर लिखने वाले जी-23’ नेताओं का पत्ता साफ कर दिया गया है। इससे एक बात साफ हो गया है कि कांग्रेस आलाकमान  असंतुष्ट गुट के नेताओं से न तो समझौते के लिए न ही पार्टी में स्पेस देने के लिए तैयार है।

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जब सारी दुनिया सो रही होगी तो भारत जीवन और आजादी की करवट के साथ उठेगा। 1947 में 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि में नेहरू ने आजादी के सपनों की खुश्बों इन्ही सपनों के साथ बिखेरी थी। शायद उस वक्त देश भी नेहरू के उन सपनों में भावी हिन्दुस्तान की तस्वीर देख रहा था। कांग्रेस ने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हिन्दुस्तान को देखा है। आजादी की हवा में हिन्दुस्तान को सांस लेते देखा है। संविधान को बनते देखा है। संसद को बैठते देखा। जम्हूरियत को मजबूत होते देखा। खुद को टूटते हुए देखा है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में अपने साथ दलों को जुड़ते हुए भी देखा है। सवा सौ साल से हिन्दुस्तान को देखा है। इंग्लैंड की लेबर पार्टी, जमर्नी की सोशल डेमोक्रेट पार्टी और अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी की बराबरी करते कांग्रेस ने खुद में एक इतिहास समेटा हुआ है। इतिहास 1885 के वक्त का जब मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज में कांग्रेस की बुनियाद पड़ी। कांग्रेस में समय समय पर किस तरह बगावत भड़की या मतभेदों के चलते पार्टी में खेमेबाज़ी हुई और नतीजा ये हुआ कि पार्टी किसी न किसी तरह टूटी। देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी में इन दिनों भीतरी असंतोष की चर्चा के बीच जानें की अतीत में भी विद्रोह होता रहा है। लेकिन उसे संभाल लिया गया। इस बार कहा जा रहा है कि ऐसे हालात तब बने हैं, जब इतिहास में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुज़र रही है। 

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जनवरी 1966 : जब इंदिरा बनीं पीएम

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे, लेकिन करीब दो साल के भीतर ही ताशकंद में ऐतिहासिक समझौते के बाद उनकी भी मृत्यु हुई। तब पार्टी में शीर्ष नेतृत्व को लेकर सवाल खड़ा हुआ। प्रधानमंत्री पद के लिए शास्त्री के बरक्स उम्मीदवार रह चुके मोरारजी देसाई का नाम सबसे आगे था। लेकिन, उस समय पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी का नाम आगे किया और नेहरू परिवार को तवज्जो दिए जाने की परंपरा शुरू हुई। इंदिरा को पीएम बनाए जाने के लिए समर्थन जुटाने में के कामराज की प्रमुख भूमिका रही और कांग्रेस के भीतर इंदिरा 180 वोटों से देसाई से जीत गई।

नवंबर 1969 : पार्टी प्रमुख थे एस निजलिंगप्पा 

उस साल के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान वरिष्ठ नेता और इंदिरा गांधी के मतभेद खुलकर सामने आए। पीएम होने के बावजूद इंदिरा को पार्टी से निकाला गया। तत्कालीन कांग्रेस पार्टी प्रमुख निजालिंगप्पा ने इंदिरा गांधी को पार्टी से 'गूंगी गुड़िया' कहकर निर्वासित कर दिया। फिर, कांग्रेस अलग और इंदिरा के कांग्रेस पार्टी अलग।

1975-77: पार्टी प्रमुख थे डीके बरुआ 

इमरजेंसी के विरोध में जगजीवन राम, बहुगुणा और सतपति जैसे कद्दावर नेता इंदिरा के कांग्रेस से अलग हुए और नई पार्टी बनी कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी जो बाद में जनता पार्टी में विलय हुई। इमरजेंसी के बाद चुनाव हुए और पार्टी प्रमुख के वी रेड्डी और संसदीय नेता यशवंत जी चौहान इंदिरा के खिलाफ हुए और कांग्रेस फिर टूटी।

1987: पार्टी प्रमुख थे राजीव गांधी 

राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे पी पी सिंह ने भ्रष्टाचार को लेकर सवाल खड़े किए। सिंह को कांग्रेस से निकाला गया तो उन्होंने अन्य कांग्रेसियों के साथ मिलकर जनमोर्चा बनाया। शाह बानो केस के कारण इस्तीफा दे चुके कांग्रेस के पूर्व मंत्री आरिफ मोहम्मद खान समेत ओडिशा के बीजू पटनायक, कर्नाटक के रामकृष्ण हेगड़े जैसे राज्य के बड़े नेता भी सिंह की पार्टी से जुड़े।

1995: पार्टी प्रमुख थे पीवी नरसिम्हा राव 

1996 के चुनाव के मद्देनजर अर्जुन सिंह और एन डी तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस का एक धड़ा बन गया। नतीजतन चुनाव में कांग्रेस की सत्ता गई। इसके लिए नरसिम्हा राव को जिम्मेदार माना गया और फिर सीताराम केसरी ने राव की जगह ली।

1998: पार्टी प्रमुख थे सीताराम केसरी 

सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में एंट्री का फैसला किया तो केसरी के ना चाहते हुए भी पार्टी ने सोनिया को पार्टी प्रमुख बना दिया। इसकी भी एक दिल्चस्प कहानी है जब 1997 के आखिर में सोनिया गांधी ने घोषणा की कि वो कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी। तब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सोनिया को कांग्रेस के लिए 'तारणहार' बताते हुए पार्टी में उनका स्वागत तो किया। लेकिन जब सोनिया को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की मांग उठी, तब केसरी ने हिचकिचाहट ज़ाहिर की। कहते हैं जिस दिन सोनिया पार्टी अध्यक्ष चुनी गई केसरी को जबरन पार्टी दफ्तर में नजरबंद रखा गया। 

1999: पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी 

शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी होने के कारण सोनिया को पीएम के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किए जाने का विरोध किया तो सोनिया ने पार्टी प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया। तीनों बागियों को कांग्रेस से निकाले जाने के बाद सोनिया ने इस्तीफा वापस लिया।

2020: पार्टी अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी

कांग्रेस के सांसद और पूर्व मंत्रियों सहित 23 कांग्रेस नेताओं द्वारा अंतरिम पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी को लिखे गए पत्र में व्यापक सुधार, निष्पक्ष आंतरिक चुनाव, सामूहिक निर्णय लेने और पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग की। 

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 हालांकि अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस में चल रही कलह आखिरकार इस निष्कर्ष के साथ समाप्त हो गई कि सोनिया गांधी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। CWC की करीब 7 घंटे बैठक चली और तमाम विवादों की खबरें भी सामने आती रही। पहले राहुल द्वारा बीजेपी से सांठगांठ के आरोपों वाली और फिर राहुल के आरोपों से गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल के आहत होने वाली। लेकिन शाम होते-होते मौसम के तापमान के साथ ही कांग्रेस मुख्यालय का तापमान भी खुशनुमार शांत और सौम्य सा हो गया। पहले तो कपिल सिब्बल ने ट्वीट किया, ‘‘राहुल गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर मुझे सूचित किया कि उन्होंने वो कभी नहीं कहा था जो उनके हवाले से बताया गया है। ऐसे में मैं अपना पहले का ट्वीट वापस लेता हूं। फिर राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष ने ट्वीट किया, मीडिया के एक हिस्से में यह गलत कहा जा रहा है कि मैंने सीडब्ल्यूसी की बैठक में राहुल गांधी से कहा कि वह भाजपा के साथ सांठगांठ के जरिए हम लोगों की ओर से पत्र लिखे जाने की बात साबित करें। जिसके बाद लगने लगा कि कांग्रेस में आल इज वेल। लेकिन शाम में पहले तो गुलान नबी आजाद के घर पर कांग्रेस के पत्र लिखने वाले जी-23 के नेताओं की बैठक होती है और सवेरा होते-होते कपिल सिब्बल का एक और ट्वीट आ जाता है। कपिल सिब्बल ने अपने ट्वीट में लिखा, 'यह किसी पद के बारे में नहीं, यह मेरे देश के बारे में जो सबसे अहम है। जिसके बाद सिब्बल ने उत्तर प्रदेश की लखीमपुरी की जिला कांग्रेस कमेटी की ओर से जितिन प्रसाद के खिलाफ कार्रवाई की मांग से जुड़ी खबर की पृष्ठभूमि में बयान दिया कि पार्टी को अपने लोगों पर नहीं, बल्कि भाजपा को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से निशाना बनाने की जरूरत है। वहीं गुलाम नबी आजाद ने तो कांग्रेस में प्रमुख पदों पर चुनाव नहीं हुए तो 50 साल तक विपक्ष में ही बैठे रहने की बात तक कह डाली।

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कांग्रेस पार्टी में लेटर बम के जरिए घमासान मचाने के बाद खुलकर अपने पक्ष रखने वाले नेताओं के बारे में भी संक्षिप्त में आपको बता देते हैं। 

मुफ्त में लड़ते हैं कांग्रेस पार्टी के मुकदमे

कपिल सिब्बल जाने माने भारतीय राजनीतिज्ञ और वकील हैं, जो मनमोहन सिंह के प्रधानमन्त्री कार्यकाल के दौरान कैबिनेट मंत्रिमंडल में संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रहे। इससे पहले कपिल सिब्बल मानव संसाधन मंत्री भी रह चुके हैं। कपिल सिब्बल पहली बार 1998 में राज्यसभा के जरिए राजनीति में आए थे। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री होने के साथ ही अधिवक्ता के तौर पर भी वह पार्टी की खासी मदद करते रहे हैं। यहां तक कि पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस से जुड़े मसलों की पैरवी के लिए वह कोई चार्ज नहीं लेते, जबकि सुप्रीम कोर्ट में एक दिन की सुनवाई का वह 8 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक चार्ज करते हैं।

राज्य सभा में कांग्रेस की दमदार आवाज

गुलाम नबी आजाद राज्य सभा में विपक्ष के नेता के साथ संसद में कांग्रेस की दमदार आवाज भी हैं। इससे पहले वे जम्मू और कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं।

शशि थरूर

शशि थरूर भारतीय राजनीतिज्ञ और पूर्व राजनयिक है, केरल के तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सांसद हैं। वे भारत सरकार के 2009-2010 तक विदेश मन्त्रालय के और 2012-2014 तक मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के राज्य मन्त्री रह चुके हैं। 2007 तक, वे संयुक्त राष्ट्र के करियर अधिकारी थे। संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने महासचिव पद के लिए (2006) चुनाव में, बान की मून की तुलना में दूसरे स्थान पर आने के बाद, संयुक्त राष्ट्र से प्रस्थान किया। 

जी-23’ में शामिल नेता

गांधी परिवार के खिलाफ चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वालों में इसके अलावा मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, पीजे कुरियन, रेणुका चौधरी, मिलिंद देवड़ा, अजय सिंह, सांसद विवेक तन्खा, मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, राजेंद्र कौर भट्ठल, एम वीरप्पा मोइली, पृथ्वीराज चव्हाण, राज बब्बर, अरविंदर सिंह लवली, कौल सिंह ठाकुर, अखिलेश सिंह, कुलदीप शर्मा, योगानंद शास्त्री, पूर्व सांसद संदीप दीक्षित शामिल हैं। - अभिनय आकाश






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