तीन बार में रेपो रेट 1.40 हाई, फिर बढ़ेगी आपके लोन की EMI, ब्याज दरें बढ़ने का दौर लौटा

Repo rate
prabhasakshi
अभिनय आकाश । Aug 05, 2022 4:56PM
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने खुदरा महंगाई को काबू में लाने के लिये नीतिगत दर रेपो को 0.5 प्रतिशत बढ़ाकर 5.4 प्रतिशत कर दिया है। इससे कर्ज की मासिक किस्त बढ़ने के साथ बैंकों से ऋण लेना महंगा होगा।

आरबीआई की तरफ से रेपो रेट में इजाफा किया गया है। पहले 4.9 फीसदी रेपो रेट थी अब उसे बढ़ाकर 5.40 कर दिया गया है। इससे कर्ज की मासिक किस्त बढ़ने के साथ बैंकों से ऋण लेना महंगा होगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने खुदरा महंगाई को काबू में लाने के लिये नीतिगत दर रेपो को 0.5 प्रतिशत बढ़ाकर 5.4 प्रतिशत कर दिया है। इससे कर्ज की मासिक किस्त बढ़ने के साथ बैंकों से ऋण लेना महंगा होगा। चालू वित्त वर्ष की चौथी मौद्रिक नीति समीक्षा में लगातार तीसरी बार नीतिगत दर बढ़ाई गई है। कुल मिलाकर 2022-23 में अबतक रेपो दर में 1.4 प्रतिशत की वृद्धि की जा चुकी है। इसके साथ ही प्रमुख नीतिगत दर महामारी-पूर्व के स्तर पर पहुंच गई है। रेपो रेट में शुरू में हुई  बढ़ोतरी का असर बैंकों, नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों पर भी होने लगा है। पिछले 2-3 महीने के दौरान लगभग सारे बैंक, एनबीएफसी और एचएफसी ब्याज दरें बढ़ा चुके हैं। रेपो रेट में हालिया बढ़ोतरी के बाद ब्याज दरें और बढ़ने की आशंका मजबूत हो गई है।

इसे भी पढ़ें: 'हमारे पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार', रघुराम राजन बोले- हमारे यहां श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी समस्या नहीं

फिर बढ़ेगी आपके लोन की EMI

कोरोना महामारी के बाद रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए लगातार रेपो रेट को कम किया था। रेपो रेट कम होने लगा तो बैकों ने भी ब्याज दरें कम की थी। इस तरह ब्याज दरें कई दशक के सबसे निचले स्तर पर आ गई थीं। करीब दो साल तक रेपो रेट 4 फीसदी पर स्थिर रहा और इस कारण दो साल तक लोगों को सस्ते में कर्ज मिलता रहा। हालांकि महंगाई ने सस्ते कर्ज का दौर समाप्त कर दिया। पहली बार मई में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 0.40 फीसदी बढ़ाकर 4.40 फीसदी किया था। जून की बैठक में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 0.50 फीसदी बढ़ाया है। अगस्त में फिर से रेपो रेट को 0.50 फीसदी बढ़ाया गया। इस तरह तीन बार में रेपो रेट को 1.40 फीसदी बढ़ाया जा चुका है। 

रिजर्व बैंक को आप बोलचाल की भाषा में समझें तो वो देश के सभी बैंकों का प्रधानमंत्री है। देश में जितने भी सरकारी या गैर-सरकारी बैंक हैं इनकी निगरानी करना रिजर्व बैंक का काम है। रिजर्व बैंक एक पॉलिसी बनाकर इन बैकों को देती है जिसके आधार पर बैंकों को अपना काम करना होता है।

इसे भी पढ़ें: RupeeVSDollar: रुपया 46 पैसे की बढ़त के साथ 78.94 प्रति डॉलर पर पहुंचा

रेपो रेट क्या होते हैं?

रिजर्व बैंक का काम होता है नीतिगत दरों पर फैसला करना। नीतिगत दर जिनके आधार पर रिजर्व बैंक और दूसरे कमर्शिल बैंकों के बीच लेन-देन होता है। बाकी सारे बैंक लोन लेते हैं रिजर्व बैंक से कम समय के लिए। वो लोन जिस दर पर लिया जाता है उसे रेपो रेट कहते हैं। रेपो मतलब रिजर्व बैंक दूसरे बैंकों को कितने ब्याज पर पैसा दे रहा है।

रिवर्स रेपो रेट

इससे उलट जब बैंक को अपना पैसा रिजर्व बैंक में जमा करना होता है तो उसे ब्याज मिलता है। ब्याज की इस दर को कहा जाता है रिवर्स रेपो रेट। रिवर्स रेपो रेट मतलब वो दूसरे बैंक अपना पैसा रिजर्व बैंक में जमा कर रहे हैं तो उनको कितना ब्याज मिल रहा है। 

इसे भी पढ़ें: बैंक से लेकर रसोई गैस की कीमतों तक, जानिए 1 अगस्त से होने वाले ये 4 बड़े बदलाव

रेपो रेट के कम या ज्यादा होने से आम जनता पर असर

लोन लेने के लिए बैंको को रिजर्व बैंक के पास सरकारी बांड गिरवी रखनी होती है। ये लोन जिस ब्याज रेट पर मिलता है उसे रेपो रेट कहते हैं। आपके लिए अच्छा तब रहेगा जब बैंको को कम ब्याज दर पर लोन मिले । रेपो रेट जितना कम उतना देश की आम जनता को फायदा होता है। यानी बैंक आपसे भी कम ब्याज लेगा। लोन सस्ते होंगे और अच्छी स्कीम होगी। जिनके लोन पहले से चल रहे हैं उन्हें भी राहत मिलेगी क्योंकि उन्हें महीने की किस्त कम देनी पड़ेगी। लॉकडाउन की वजह से नए कर्ज लेने वालों की संख्या बढ़ने के आसार तो नहीं हैं। लेकिन, रेपो रेट से जुड़े कर्ज वाले मौजूदा ग्राहकों की ईएमआई कम हो जाएगी। - अभिनय आकाश

अन्य न्यूज़