अमेरिका को ग्रेट बनाने के लिए डॉलर को डुबोएंगे ट्रंप, 1985 के प्लाजा अकॉर्ड से अलग 2026 में कुछ तो विस्फोटक होने वाला है!

ये 1985 का मुद्रा समझौता है, जिसने वैश्विक बाजारों को नया रूप दिया। लेकिन 2026 में इससे कहीं अधिक कुछ विस्फोटक होने की चर्चा है। आज का एमआरआई एक ऐसे विषय पर करेंगे जिसमें इतिहास की चर्चा है, अर्थव्यवस्था का गणित है और जियोपॉलिटकल पॉवर का हिडेन गेम भी छुपा है। शुरुआत सबसे शुरू से करते हैं।
अमेरिका का वेनेजुएला पर अटैक, बीच समुद्र रूस के झंडे वाले जहाज पर हमला कर उसे पकड़कर अमेरिका ले आना। कभी ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए नाटो तक को धमकाना तो कभी ईरान से ट्रेड पर मनमाना टैरिफ लगाना। ट्रंप जब से अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं बीचे एक साल में उन्होंने अमेरिका को ग्रेट बनाया हो या नहीं लेकिन अपने मनमाने फैसले से दुनिया को जरूर चौंकाया है। लेकिन पुरानी कहावत है कि कभी कभी जो दिखता है वो होता नहीं जो होता है वो दिखता नहीं। पूरी दुनिया वही देख रही है, जो ट्रंप दिखाना चाह रहे हैं। लेकिन पर्दे के पीछे कुछ तो छुपाने की तैयारी है। आप सभी ने प्लाजा समझौते के बारे में सुना होगा। ये 1985 का मुद्रा समझौता है, जिसने वैश्विक बाजारों को नया रूप दिया। लेकिन 2026 में इससे कहीं अधिक कुछ विस्फोटक होने की चर्चा है। आज का एमआरआई एक ऐसे विषय पर करेंगे जिसमें इतिहास की चर्चा है, अर्थव्यवस्था का गणित है और जियोपॉलिटकल पॉवर का हिडेन गेम भी छुपा है। शुरुआत सबसे शुरू से करते हैं।
इसे भी पढ़ें: AI की जंग में China की 'ड्रैगन' छलांग, Alibaba के मॉडल से America में खलबली।
क्या था ब्रिटेन गुड्स एग्रीमेंट
आज से करीब 75 साल पहले साल था 1944। अमेरिका तब आज के चाइना की तरह मैन्युफैक्चरिंग पावर हाउस हुआ करता था। 1945 में दुनिया के 50% गुड्स अकेले यूएस में ही प्रोड्यूस होते थे। लेकिन और रिच बनने के लिए यूएस एक प्लान लाता है। जो बाद में ब्रिटेन गुड्स एग्रीमेंट बना। इसका कोर पर्पस यूएस के डॉलर को ग्लोबल करेंसी बनाने का था। इसमें अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को प्रेशर किया कि वह अपनी करेंसी की वैल्यू यूएस डॉलर के साथ पैक कर दे। इन रिटर्न यूएस ने प्रॉमिस दिया कि यह कंट्रीज डॉलर को कभी भी गोल्ड में कन्वर्ट करवा सकती है एक फिक्स रेट पर। यानी यूएस के डॉलर की वैल्यू गोल्ड जितनी रहेगी। यानी रातोंरात यूएस का यह पेपर का टुकड़ा गोल्ड की वैल्यू का हो गया। इसके कुछ ही सालों में डॉलर की डिमांड स्काई रॉकेट हो गई। क्योंकि ऑलमोस्ट सारी कंट्रीज डॉलर में ट्रेड करने लगी।
1971 तक यूएस डॉलर को मैसिव स्केल पर प्रिंट करता गया। और तब तक मार्केट में इतने डॉलर्स आ चुके थे जितने का यूएस के पास सोना भी नहीं था। जिसका मतलब ब्रिटेन वुड एग्रीमेंट का पार्ट बनी एक कंट्रीज अपने डॉलर के रिजर्व को लेकर यूएस के पास पहुंच जाती है कि यूएस अपने प्रॉमिस किया था कि डॉलर को गोल्ड में कभी भी कन्वर्ट करवा सकते हैं तो हमें हमारे डॉलर्स के बदले गोल्ड दे दो। तो यूएस सपने में भी यह प्रॉमिस पूरा नहीं कर सकता था। तब यूएस के प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन एक बड़ा कदम उठाते हैं। 15 अगस्त 1971 को यूएस डॉलर को गोल्ड में कन्वर्ट करवाने का सिस्टम ही खत्म कर देता है। लेकिन फिर भी डॉलर ग्लोबली इंपॉर्टेंट बना रहता है। अमेरिका की तरफ से दूसरे देशों को कम टैरिफ ऑफर की जाती थी। दुनिया भर में अपना कैपिटल इन्वेस्ट करता है। ये सब डॉलर के भौकाल को बनाए रखने के लिए किया जाता रहा। जहां अमेरिका ब्रिटेन वुड एग्रीमेंट से पहले ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब हुआ करता था। इन दो बड़े कदमों की वजह से यूएस का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर जो 1940 में 25% कंट्रीब्यूट करता था जीडीपी में वह अब केवल 10% ही करता है। इसका सबसे बड़ा कारण डॉलर के मजबूत होने को बताया गया।
इसे भी पढ़ें: 20 मिनट में डूबेगा अमेरिका का जंगी बेरा! IRGC का 'वो' प्लान, जिससे सऊदी भी डरा
1985 का प्लाजा अकॉर्ड
अमेरिका फ्रांस, जर्मनी, जापान और ब्रिटेन ने मिलकर वैश्विक असंतुलन को ठीक करने के लिए डॉलर को कमजोर करने पर सहमति जताई थी। ट्रंप का ये आइडिया उसी का आधुनिक संस्करण बताया जा रहा है। दरअसल, 1985 का प्लाज़ा समझौता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए टर्निंग फैक्टर साबित हुआ था। जिसमें अमेरिका सहित G5 देशों ने मिलकर डॉलर को जानबूझकर कमजोर किया था। सेंट्रल बैंकों की संयुक्त कार्रवाई से डॉलर एक ही दिन में 4% तक नीचे लुढ़क गया था। आगामी दो साल में लगभग 50% तक टूट गया, जिससे अमेरिकी निर्यात सस्ता हुआ और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को फायदा मिला। लेकिन वहीं आम अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए विदेशी सामान महंगा हो गया, जिसे ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेमेशन ’ कहा गया। शेयर बाजार में तेज उछाल दिखा, मगर ग्रोथ रेट नहीं बल्कि कमजोर डॉलर का असर था। दूसरी ओर, जापान में येन के मजबूत होने से शेयर मार्केट और रियल एस्टेट सेक्टर में बूस्ट देखने को मिला। कुल मिलाकर, यह समझौता सिर्फ आर्थिक नीति नहीं था बल्कि अमेरिका की रणनीति थी अपने कर्ज की वास्तविक कीमत घटाने की, जिसका बोझ वैश्विक निवेशकों और बचतकर्ताओं पर पड़ा।
इसे भी पढ़ें: America Iran Attack Plan: हो सकता है किसी भी वक्त हमला! ईरान में अब्राहिम का खौफ
क्या है ट्रंप का मार-ए-लागो प्लान
ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के प्लान का नाम मार ए लागो प्लान है, जिसको मेगा प्लान भी कहा जा रहा है। इसका पहला स्टेप टैरिफ है। पहले हर देश पर रेसिप्रोकल टेरिफ्स लगाए जाएंगे। चाहे वो अमेरिका के दोस्त हो या दुश्मन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और ऐसा ही कुछ देखने को भी मिला। हालांकि ये टैरिफ फौरी तौर पर लगाए जा रहे हैं और थ्योरी के अनुसार इसका मुख्य मकसद देशों को बातचीत की टेबल पर लाना है। फिर प्रेशर बनाकर नेगोशिएशन करना है। जैसे ही देश नेगोशिएशन टेबल पर आ जाएंगे अमेरिका की तरफ से अपना मार ए लागो अकॉर्ड प्रपोज कर दिया जाएगा। फिलहाल चल रहे वर्ल्ड ऑर्डर को चेंज कर एक न्यू वर्ल्ड ऑर्डर क्रिएट करना होगा। जैसे ब्रिटेन वुड्स एग्रीमेंट ने करा था। इसमें कंट्रीज को ट्रेड बैरियर रिमूव करने के लिए प्रेशर किया जाएगा ताकि यूएस के गुड्स आसानी से दूसरे देशों में कॉम्पिटिटिव प्राइस पर पहुंच सके। वहीं डॉलर की वैल्यू को कमजोर किया जाए जिससे कि यूएस में ही मैन्युफैक्चरिंग करना कारगर रहे।
डॉलर को कमजोर करने से क्या होगा
डॉलर का गिरना कोई दुर्घटना नहीं बल्कि अमेरिका की सोची-समझी रणनीति है, जिसे सॉफ्ट डिफॉल्ट कहा जा रहा है। इसका मकसद सरकार और बैंकिंग सिस्टम को टूटने से बचाना है। हर साल 1.8 ट्रिलियन डॉलर के घाटे और 36 ट्रिलियन के कर्ज़ से जूझ रही अमेरिकी सरकार डॉलर की कीमत 30–50% तक गिराकर कर्ज़ का असली बोझ हल्का कर देना चाहती है, यानी वही पैसा लौटाया जाएगा लेकिन कमजोर डॉलर में। यानी सरकार को बचाने के लिए मिडिल क्लास की क्रय-शक्ति की बलि दे दी जाएगी।
अन्य न्यूज़













