• परिसीमन क्या होता है, इसे जम्मू कश्मीर में अब तक कैसे टाला गया और इससे क्या बदलेगा?

अभिनय आकाश Jun 21, 2021 17:14

परिसीमन आयोग का गठन पिछले साल रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई में किया गया। कानून मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और चार राज्यों के निर्वाचन आयुक्तों को आयोग का पदेन सदस्य बनाया गया था। उन्होंने तमाम ज़िला आयुक्तों को चिट्ठी लिख कर उनसे बुनियादी जानकारी मांगी है।

अफवाहें, अनुमान, अटकले, आशंकाएं! कश्मीर में यही चल रहा है। कश्मीर में कुछ बड़ा होने वाला है! अटकलों का बाजार गर्म है। आम लोग परेशान हैं कि उन्हें दोबारा घरों में बंद रहने की तैयारी तो नहीं करनी पड़ेगी। क्या कश्मीर को लेकर मोदी सरकार कुछ बड़ा करने वाली है? 5 अगस्त 2019 जितना बड़ा, ऐसे सवालों के बीच कश्मीर में तरह-तरह की बातें चारों तरफ चल रही है। सियासी भूचाल लाने वाले इस  फैसले के 683 दिन बाद अब जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक खामोशी तोड़ने के संकेत मिल रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कश्मीर पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार कुछ बड़ा करने वाली है। ये भी चर्चा हुई कि जम्मू-कश्मीर का एक बार फिर से पुनर्गठन हो सकता है या फिर राज्य का दर्जा देने पर बात बन सकती है। लेकिन सरकारी सूत्रों ने ऐसे सभी कयासों को खारिज करते हुए कहा है कि यह मीटिंग परिसीमन  को लेकर बुलाई गई है। केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर में परिसीमन किए जाने पर विचार कर रही है और यह बहुत बड़ी बात है। कश्मीर में लंबे समय से परिसीमन की मांग उठती रही है। जिसके बाद बीते दिनों परिसीमन आयोग के एक्शन में आने के बाद चर्चा और तेज हो गई है। परिसीमन आयोग को जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सीटों को नए सिरे से तय करना है। परिसीमन क्या होता है हम आगे आपको विस्तार से बताएंगे लेकिन आसान भाषा में समझ लीजिए कि अगर जम्मू कश्मीर में परिसीमन हुआ तो जम्मू कश्मीर की सीटों में बदलाव हो जाएगा। किसी भी चीज को समझना है तो पहले इसके बैकग्राउंड को समझना जरूरी होता है। जम्मू कश्मीर की राजनीति को करीब से जानने है तो उसके लिए थोड़ा इतिहास में जाना जरूरी है। 

26 अक्टूबर 1947, अमर पैलेस, जम्मू...

"मैं महाराजा हरि सिंह जम्मू और कश्मीर को हिंदुस्तान में शामिल होने का ऐलान करता हूं।" इन लफ्जों के साथ महाराजा ने अपनी रियासत को हिंदुस्तान में शामिल होने के लिए एग्रीमेंट पर साइन कर दिया। इन शब्दों के साथ ही जम्मू और कश्मीर का मसला हमेशा के लिए खत्म हो जाना चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और ऐसा क्यों नहीं हुआ? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? कुछ लोग कहते हैं महाराजा हरि सिंह ने देर कर दी, इसलिए हम लोग कश्मीर समस्या को आज तक सुलझा नहीं पाए। कुछ लोग कहते हैं पंडित नेहरू यूएन चले गए, इसलिए आज तक हमारे सामने यह समस्या है तो कुछ लोग कहते हैं कि यह समस्या पाकिस्तान ने बनाई है। जून 1947 का दौर जब न केवल ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे बल्कि भारत में भी नई व्यवस्था तैयार हो रही थी। हरि सिंह जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान से जोड़ना नहीं चाहते थे। महाराजा को अब भारत में अंग्रेजों से नहीं बल्कि पंडित नेहरू के साथ संबंध जोड़ना था और उनकी छत्रछाया में रहना था। दूसरी तरफ नेहरू महाराजा के फैसले लेने के अख्तियार पर ही सवाल उठा रहे थे। उनकी नजर में शेख अब्दुल्लाह ही जम्मू-कश्मीर के भविष्य का फैसला कर सकते थे, जिन्हें महाराजा हरि सिंह ने जेल में बंद करवा रखा था। बता दें कि शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरी सिंह के खिलाफ "क्विट कश्मीर" आंदोलन चलाया जिसके बाद महाराजा हरि सिंह ने 1946 में शेख अब्दुल्ला को जेल में बंद कर दिया था। शेख अब्दुल्ला के दादा कपड़े बुनने का काम करते थे और बाद में उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया। 1921 में शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम कॉन्फ्रेंस बनाई, 1931 में यह नेशनल कॉन्फ्रेंस हो गई। शेख अब्दुल्ला के परिवार को हमेशा से गांधी परिवार का समर्थन मिलता रहा। अब्दुल्ला परिवार कश्मीर की राजनीति का सबसे सुखी परिवार माना जाता है। इन्होंने दुनिया के जन्नत पर 1952 के बाद सबसे ज्यादा वक्त तक राज किया है। कश्मीर हमेशा ही पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए एक भावनात्मक प्रश्न था। कश्मीर पंडित नेहरू के दिल के करीब था इसलिए कश्मीर के नेताओं को भी पंडित नेहरू ने हमेशा अपने दिल के करीब रखा। शेख अब्दुल्ला कश्मीर के लोकप्रिय नेता थे और पंडित नेहरू से भी उनके रिश्ते थे। लेकिन जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती का बदला मिजाज शेख अब्दुल्ला की राजनीति को रास नहीं आ रहा था। कश्मीर के मामले में जवाहरलाल नेहरू की कुछ गलतियों की वजह से कश्मीर में शेख अब्दुल्ला का कद लगातार बढ़ता रहा। शेख वर्ष 1948 में जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री बन गए। शुरुआती दौर में नेहरू ने शेख अब्दुल्लाह का समर्थन किया। वर्ष 1953 में कई आरोपों के बाद शेख अब्दुल्ला को उनके पद से हटा दिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ विद्वानों का मानना है कि इसी घटना के बाद शेख अब्दुल्ला ने खुलकर भारत विरोध शुरू कर दिया। वर्ष 1964 में पंडित नेहरू के द्वारा शेख अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया यह बड़ी भूल थी क्योंकि 11 वर्षों की जेल की वजह से वह कश्मीर की जनता के बीच हीरो बन चुके थे। उनके विचार बदल चुके थे। 26 फरवरी 1975 को शेख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। शेख अब्दुल्ला के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला भी जम्मू कश्मीर के सीएम रहे। अब्दुल्ला परिवार ने कश्मीर पर लंबे वक्त तक राज किया। अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी ने भी कश्मीर पर राज किया। लेकिन इसी लंबे वक्त में कश्मीर सुलगता रहा और इस आग को जानबूझकर भड़काया जाता रहा अपनी राजनीति की खातिर। अब्दुल्ला परिवार कश्मीर पर बार-बार अपना स्टैंड बदलता रहा। कश्मीर के लोगों के सामने कुछ और तरह की बातें कही जाती रही और लोगों की भावनाओं को भड़काने का काम किया जाता रहा। लेकिन दिल्ली में उनके बयान और भूमिकाएं हमेशा बदलती रहीं। फारूक अब्दुल्ला हमेशा से परिसीमन को टालने की कोशिश करते रहे क्योंकि उन्हें पता था कि परिसीमन हो गया तो सत्ता उनके हाथ से निकल जाएगी। 

इसे भी पढ़ें: डेथ कमीशन वाले कट्टर मौलाना को ईरान का ताज, भारत के साथ रिश्तों पर गिरेगी गाज?

परिसीमन का अर्थ

भारत में हर राज्य की अपनी अलग खूबसूरती है। हर प्रांत की अपनी अलग चमक है। रंग-बिरंगे इस देश की आबादी में भी लगातार इजाफा हो रहा है। बढ़ती जनसंख्या के कारण राज्य से लेकर गांव तक का गणित हर लिहाज में बदलता रहता है। लोग पलायन करते हैं तो संख्या की अनिश्चितता लगातार बनी रहती है। आजादी के बाद से भारत में चुनाव हो रहे हैं और इन चुनावों में सीटों के बंटवारे में सीमाओं का अपना महत्व है। क्योंकि यह सीमाएं आबादी के हिसाब से तय होनी जरूरी है। तभी सही मायने में एक निश्चित आबादी के लिए एक निश्चित प्रतिनिधि का चुनाव कर सकेंगे। इसी संविधान के अनुच्छेद 82 में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं के निर्धारण के लिए हर 10 साल में एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है। जिसे भारतीय सीमा आयोग भी कहा जाता है। ये आयोग सीटों की संख्या में तब्दीली नहीं कर सकता। बल्की ये जनगणना के बाद सही आंकड़ों से सीटों की सीमाएं और अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए भी सीटों की संख्या आरक्षित करता है। परिसीमन आयोग की सिफारिशें लोकसभा और विधानसभाओं के सामने पेश की जाती हैं। लेकिन उनमें किसी तरह के संशोधन की अनुमति नहीं होती। क्योंकि इस संबंध में सूचना राष्ट्रपति की ओर से जारी की जाती है। परिसीमन आयोग के फैसलों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 

परिसीमन का इतिहास 

आजाद भारत में सबसे पहले साल 1952 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। इसके बाद साल 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग गठित किए जा चुके हैं। भारत में साल 2002 के बाद परिसीमन आयोग का गठन नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में 12 जुलाई 2002 को परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने सिफारिशों को 2007 में केंद्र को सौंपा था लेकिन सिफारिशों को केंद्र सरकार द्वारा दरकिनार कर दिया जाता रहा। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद 2008 में इसे लागू किया गया। आयोग ने साल 2001 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया था। 

इसे भी पढ़ें: चुनाव परिणाम को चुनौती देने वाली जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-123, जिसकी वजह से इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया

परिसीमन आयोग का गठन

परिसीमन आयोग का गठन पिछले साल रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई में किया गया। कानून मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और चार राज्यों के निर्वाचन आयुक्तों को आयोग का पदेन सदस्य बनाया गया था। उन्होंने तमाम ज़िला आयुक्तों को चिट्ठी लिख कर उनसे बुनियादी जानकारी मांगी है। परिसीमन आयोग को जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सीटों को नए सिरे से तय करना है। परिसीमन अधिनियम 2002 की धारा 3 के तहत निहित शक्तियों से ही केंद्र सरकार ने परिसीमन आयोग का गठन किया। परिसीमन आयोग जम्मू कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 के प्रावधानाों के तहत जम्मू कश्मीर में लोकसभा और विधानसभा का परिसीमन का जिम्मा सौंपा। जम्मू कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 की धारा 60 के अनुसार परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या 107 से बढ़कर 114 की जाएगी। इसके पूर्व जम्मू कश्मीर की विधानसभा में 111 सीटें थी, जिसमें से 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर(POK) में पड़ती हैं।  राज्य के पुनर्गठन के बाद जम्मू कश्मीर में लोकसभा की 5 सीटें होंगी जबकि लद्दाख में 1 सीट।

किस आधार पर परिसीमन निर्धारित किया जाता है?

परिसीमन के निर्धारण में 5 फैक्टर्स को ध्यान में रखा जाता है-

1. क्षेत्रफल

2. जनसंख्या

3. क्षेत्र की प्रकृति

4. संचार सुविधा

5. अन्य कारण

परिसीमन क्यों जरूरी

2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू संभाग की जनसंख्या लगभग 54 लाख के आसपास है जो पूरे केंद्र शासित प्रदेश की आबादी का 43 फीसद है। जम्मू संभाग 26 हजार 200 वर्ग किलोमीटर में फैला है यानि कि पूरे इलाके का 26 फीसदी जम्मू के अंदर आता है। जबकि विधानसभा कि 37 सीटें इसके हिस्से में थी। वहीं कश्मीर संभाग की जनसंख्या 68.88 लाख है जो पूरे प्रदेश की कुल जनसंख्या का 55 फिसदी हिस्सा है। कश्मीर संभाग का क्षेत्रफल केंद्र शासित प्रदेश के क्षेत्रफल का लगभग 16 फीसदी है। जबकि इस क्षेत्र से 46 विधायक चुने जाते रहे। कश्मीर में 349 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक विधानसभा है, जबकि जम्मू में 710 वर्ग किलोमीटर पर। इसके अलावा राज्य के 58.33% क्षेत्रफल वाले लद्दाख संभाग में केवल 4 विधानसभा सीटें हैं हालाँकि अब यह एक केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। ऊपर के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि राज्य में जनसँख्या और क्षेत्रफल के आधार पर सीटों का बंटवारा असंतुलित है। 

इसे भी पढ़ें: पंजाब में प्रशांत किशोर की नकल करने वाले गिरोह ने कांग्रेस नेताओं को ठगा, टिकट दिलाने का भी किया दावा !

जम्मू कश्मीर में परिसीमन को कैसे टाला गया?

नए परिसीमन में सबसे बड़ी रुकावट फारूक अब्दुल्ला ने हीं पैदा की थी। वर्ष 2002 में नेशनल कांफ्रेंस की सरकार ने परिसीमन को वर्ष 2026 तक रोक दिया था। इसके लिए अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू एंड कश्मीर रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1957 जम्मू कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47 (3) में बदलाव किया था। सेक्शन 47(3) में हुए बदलाव के मुताबिक वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते विधानसभा की सीटों में बदलाव करना जरूरी नहीं है। वर्ष 2026 के बाद जनगणना के आंकड़े वर्ष 2031 में गिने जाएंगे। फारूक अब्दुल्ला सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई थी। लेकिन 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। फारूक अब्दुल्ला के इस फैसले के खिलाफ पैंथर्स पार्टी के भीम सिंह ने याचिका दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रिजेक्ट कर दिया था।

जम्मू कश्मीर के नेताओं को निमंत्रण

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जिन 14 नेताओं को बातचीत का निमंत्रण दिया गया है। उनमें पीडीपी की महबूबा मुफ़्ती के अलावा, नेशनल कॉन्फ़्रेंस के फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला, पीपल्स कॉन्फ़्रेंस के सज्जाद लोन और मुज़फ़्फ़र हुसैन बेग, सीपीएम के एमवाई तारिगामी, कांग्रेस के जीए मीर और ग़ुलाम नबी आज़ाद, जेके अपनी पार्टी के अल्ताफ़ बुख़ारी शामिल हैं। जम्मू के नेताओं को भी इस बैठक में शामिल होने का न्योता दिया गया है, जिनमें निर्मल सिंह, रविंद्र रैना, भीम सिंह, कविंद्र गुप्ता और तारा चंद शामिल हैं।

पाक विदेश मंत्री ने UN के शीर्ष अधिकारियों को पत्र लिखकर कश्मीर मुद्दे का किया उल्लेख

पाकिस्तान ने इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को पत्र लिखकर 'विवादित क्षेत्र को बाँटने और जनसांख्यिकीय परिवर्तन की आ रही रिपोर्ट को लेकर चिंता जताई थी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों को एक और पत्र लिखा है जिसमें कश्मीर मुद्दे का उल्लेख किया गया है। पाकिस्तान ने अपने नवीनतम पत्र में आरोप लगाया है कि भारत फर्जी अधिवास प्रमाणपत्र जारी करके और अन्य उपायों के माध्यम से कश्मीर की जनसांख्यिकीय संरचना को बदल रहा है।पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत को पांच अगस्त 2019 की कार्रवाई के बाद कश्मीर में कोई और अवैध कदम उठाने से बचना चाहिए। कुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान ने भारत के पांच अगस्त 2019 के कदम का पूरी तरह से विरोध किया है और इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान भारत के ऐसे किसी भी कदम का विरोध करने का प्रण लेता है जो क्षेत्र की जनसांख्यिकी को बदलने के लिए जम्मू कश्मीर को विभाजित करने वाले हो। कुरैशी ने कहा कि उन्होंने सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र महासचिव को भारत के संभावित कदम से अवगत करा दिया है।- अभिनय आकाश