Climate Change से भारतीय खेती को झटका, 2030 तक अनुकूलन के लिए 56 लाख करोड़ की दरकार

अक्टूबर के महीने में भी असामान्य गर्मी के कारण फसलों और फलों की पैदावार पर बुरा असर पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलनों में पेश आंकड़ों के अनुसार भारत को 2030 तक जलवायु अनुकूलन तंत्र खड़ा करने के लिए 56.68 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। वहीं वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों को अनुकूलन मद में बेहद सीमित अंतरराष्ट्रीय वित्त मिल पा रहा है।
(अपर्णा बोस) नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर अक्टूबर तक भले ही भीषण गर्मी का असर काफी हद तक कम हो गया है, लेकिन खेतों में इसका असर अब भी बना हुआ है। यहां तापमान असामान्य रूप से अधिक होने के कारण फलों का विकास रुक रहा है, सब्जियों के अंकुरण में बाधा आ रही है और फसल चक्र बिगड़ रहा है। ऐसे में, जब मौसम ठंडा होने का समय आ गया है, किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
यह समस्या चरम मौसम के लिए कृषि प्रणालियों की तैयारियों को लेकर व्यापक चिंताओं के बीच सामने आई है; कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जलवायु घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि ज़मीनी स्तर पर प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने बताया कि ‘अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त’ की कमी के कारण यह चुनौती और भी गंभीर हो गई है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ‘एडैप्टेशन गैप रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, 2023 में विकासशील देशों को अनुकूलन के लिए केवल 26 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि मिली।
वर्ष 2023 वह अंतिम वर्ष है, जिसके लिए विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध हैं। साल 2023 में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन (सीओपी28) में सौंपे गए भारत के प्रथम ‘अनुकूलन संचार’ के मुताबिक, देश में जलवायु अनुकूलन संबंधी बुनियादी ढांचे और उपायों को तैयार करने के लिए वर्ष 2030 तक संचयी रूप से 56.68 लाख करोड़ रुपये के व्यय की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। जलवायु अनुकूलन वित्त से तात्पर्य उस धन से है, जिसे समुदायों को जलवायु परिवर्तन के अपरिहार्य प्रभावों के लिए तैयार करने और उनसे सुरक्षित बचे रहने में मदद करने के वास्ते खर्च किया जाता है।
आंध्र प्रदेश के गुंटूर क्षेत्र निवासी 54-वर्षीय किसान एवं किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) से जुड़े साम्बी रेड्डी वुय्युरु ने ‘पीटीआई-वीडियो’ से कहा, ‘‘कृषि में अपने एक दशक के लंबे अनुभव में, मैंने पहले कभी इस तरह की जलवायु नहीं देखी।’’ उन्होंने कहा कि केले की वृद्धि और उपज में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिससे फल पहले की तुलना में बहुत छोटे रह गए हैं और किसान सामान्य छह या सात के बजाय केवल चार से पांच गुच्छों की ही कटाई कर पा रहे हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) में एशिया और प्रशांत क्षेत्र के क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक बेन चर्चिल के अनुसार, 2026 में आया ‘सुपर अल नीनो’ अभूतपूर्व है और पिछले 40 वर्षों में दर्ज किया गया सबसे शक्तिशाली अल नीनो है। चर्चिल ने कहा, ‘‘हम कई महीनों से जानते थे कि अल नीनो सक्रिय है।
प्रशांत महासागर के गर्म होने के आंकड़ों का विश्लेषण कर इस घटना का बहुत पहले ही पता लगा लेना, डब्ल्यूएमओ और उसके सहयोगियों की ताकत है। हमारे 12 वैश्विक डेटा केंद्रों ने पुष्टि की है कि यह ‘सुपर अल नीनो’ उम्मीदों से कहीं परे और अभूतपूर्व है; यह पिछले 40 वर्षों में देखा गया सबसे शक्तिशाली अल नीनो है।’’ उन्होंने रेखांकित किया कि जब तक विज्ञान, आधुनिक उपकरणों, उन्नत तकनीक और मौसम के पूर्वानुमानों को जमीनी स्तर पर ठोस और वास्तविक कदम उठाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता, तब तक इनका कोई बड़ा फायदा नहीं होगा।
अन्य न्यूज़













