Prabhasakshi Newsroom। क्या खुद को बदलना नहीं चाहती है कांग्रेस ? महंगाई पर सरकार को घेरने में जुटी

Prabhasakshi Newsroom। क्या खुद को बदलना नहीं चाहती है कांग्रेस ? महंगाई पर सरकार को घेरने में जुटी
प्रतिरूप फोटो

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि पिछले 10 दिन में 9 बार पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ाए गए हैं और इसका परिणाम मध्यम वर्ग और गरीब लोगों पर पड़ता है। हमारी मांग है कि सरकार पेट्रोल-डीज़ल के दाम को बढ़ाना बंद करें। पूरे देश में हमारा प्रदर्शन चलेगा और काफी दिनों तक चलेगा।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी के कई अन्य सांसदों ने पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और सीएनजी की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के खिलाफ विजट चौक पर प्रदर्शन किया। इसमें राहुल गांधी के अलावा लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, शशि थरूर और कई अन्य सांसद शामिल हुए। 

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इसी बीच राहुल गांधी ने कहा कि पिछले 10 दिन में 9 बार पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ाए गए हैं और इसका परिणाम मध्यम वर्ग और गरीब लोगों पर पड़ता है। हमारी मांग है कि सरकार पेट्रोल-डीज़ल के दाम को बढ़ाना बंद करें। पूरे देश में हमारा प्रदर्शन चलेगा और काफी दिनों तक चलेगा।

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि मोदी सरकार जैसे आम लोगों की जेबों में डाका डाल रहे हैं उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। 10 दिनों में 9 बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने से मोदी जी ने एक इतिहास बना दिया। 137 दिनों बाद धड़ल्ले से दाम बढ़ रहे हैं। हमारी मांग है कि यह दाम सरकार वापस ले।

जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि हर दिन पेट्रोल-डीजल और अन्य चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं और इसका परिणाम आवश्यक वस्तुओं पर हो रहा है इसलिए आज हम राहुल गांधी के नेतृत्व में प्रदर्शन कर रहे हैं। कांग्रेस की मांग है कि यूपीए सरकार के दौरान जो कीमतें थी उसे लागू की जानी चाहिए।

हाल ही में कांग्रेस के महासचिवों एवं प्रदेश प्रभारियों की एक बैठक हुई थी जिसमें फैसला लिया गया था कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और कई खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर सरकार को घेरने के लिए पार्टी 31 मार्च से 3 चरणों में महंगाई मुक्त भारत अभियान चलाएगी। 

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रणनीतियां बनाने का काम शुरू

जी-23 में शामिल आनंद शर्मा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। बताया जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच में हिमाचल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई। आनंद शर्मा दो अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक राहुल गांधी ने राज्यसभा में पार्टी के उपनेता के रूप में आनंद शर्मा की भूमिका की सराहना की और हिमाचल चुनावों पर भी चर्चा हुई।

आपको बता दें कि आनंद शर्मा हिमाचल प्रदेश के निवासी हैं और वर्तमान में राज्य से राज्यसभा सदस्य हैं। आनंद शर्मा लंबे समय से सांसद हैं और कई वर्षों तक पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हैं तथा उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव है।

खैर कांग्रेस को अपना प्रदर्शन सुधारने की जरूरत है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन पहले की तुलना में और भी ज्यादा खराब हुआ है। पार्टी ने पंजाब को गंवा दिया और उत्तराखंड में सरकार भी नहीं बना पाई, जहां माना जाता था कि हर पांच साल में सत्ता बदलती है लेकिन भाजपा ने इस मिथक को भी तोड़ दिया।

कांग्रेस की हालत कुछ ऐसी हो गई है कि वो राज्य दर राज्य गंवाती जा रही है और भाजपा और भी ज्यादा भगवामयी होती जा रही है। हिन्दुस्तान के नक्शे से अब भगवा छा गया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में फैसले कांग्रेस वर्किंग कमेटी लेती है जबकि भाजपा संसदीय दल की बैठक में सत्तारूढ़ पार्टी के फैसले होते हैं। भाजपा में संगठनात्मक चुनाव होते रहते हैं लेकिन कांग्रेस में तो जमाने से चुनाव ही नहीं हुए। 

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अपनी रणनीतियों को बदले कांग्रेस !

नेतृत्व को मजबूत करने की बात करने वाले नेताओं को दरकिनार कर दिया जाता था, उनसे फिर सलाह तक नहीं ली जाती है और अंतत: सोनिया गांधी ही पार्टी को संभालती हैं। 90 के दशक के बाद भाजपा में कई परिवर्तन हुए लेकिन कांग्रेस आगे बढ़ने के स्थान पर पीछे जाती जा रही है। कांग्रेस अपने नेतृत्व में युवाओं को शामिल नहीं कर रही है। राहुल गांधी जब अध्यक्ष थे तब जरूर युवाओं को आगे बढ़ाने का काम किया था लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद राहुल ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और फिर युवाओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला तेज हो गए। राहुल के करीबी या तो चले गए या फिर उन्हें साइड लाइन कर दिया गया।

कभी राहुल गांधी के करीबी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, अशोक तंवर, प्रियंका चतुर्वेदी समेत कई नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया और दूसरी पार्टियों में अपने बेहतर भविष्य को देखते हुए शामिल हो गए।





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