कभी RSS के सदस्य रहे दिलीप घोष के कंधों पर हैं भाजपा की सरकार बनाने की जिम्मेदारी, दिग्गज नेता को मात देकर पहुंचे थे विधानसभा

  •  अनुराग गुप्ता
  •  फरवरी 16, 2021   11:18
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कभी RSS के सदस्य रहे दिलीप घोष के कंधों पर हैं भाजपा की सरकार बनाने की जिम्मेदारी, दिग्गज नेता को मात देकर पहुंचे थे विधानसभा

बताया जाता है कि दिलीप घोष ने अंडमान और निकोबर द्वीप समूह में आरएसएस के प्रभारी भी रहे और उन्होंने पूर्व संघ प्रमुख केएस सुदर्शन के सहायक के तौर पर भी काम किया है।

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संगठन को मजूबत करने में वहां के पार्टी अध्यक्ष दिलीप घोष का भी हाथ है। दिलीप घोष ने न सिर्फ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ हवा बनाई बल्कि हर मोर्चे पर उनका डट कर सामना भी किया। पश्चिम बंगाल में जन्में दिलीप घोष राजनेता बनने से पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) के लिए काम करते थे। बताया जाता है कि दिलीप घोष ने अंडमान और निकोबर द्वीप समूह में आरएसएस के प्रभारी भी रहे और उन्होंने पूर्व संघ प्रमुख केएस सुदर्शन के सहायक के तौर पर भी काम किया है। 

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भाजपा में हुए शामिल

जवानी के दिनों में दिलीप घोष ने स्वयंसेवकों के साथ रहकर राष्ट्र की सेवा करने का निर्णय लिया और लगातार देश की सेवा में लगे रहे। दृढ़ संकल्प और मजबूत इरादे वाले दिलीप घोष ने साल 2014 में भाजपा की सदस्यता ली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बंगाल का किला भेदने की रणनीति तैयार करने लगे। इसी दौरान पार्टी ने उन्हें महासचिव नियुक्त कर दिया। हालांकि पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और उनके कार्यों को देखते हुए साल 2015 में उन्हें भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया।

जब जीता था चुनाव

पश्चिमी मेदिनीपुर जिले में 1 अगस्त, 1964 को पैदा हुए दिलीप घोष ने बंगाल में ही शिक्षा-दीक्षा ली और उन्होंने साल 2016 में वो कारनामा कर दिखाया जो लगभग नामुमकिन था। क्योंकि घोष ने 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उस दिग्गज नेता को हराया था जिसके बारे में कहा जाता था कि वह कभी हार ही नहीं सकता। 

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पश्चिम मेदिनीपुर सीट से कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्ञानसिंह सोहनपाल को दिलीप घोष ने मात दे दी और पहला चुनाव जीतने के साथ ही वह हर किसी की जुबां छा गए। ज्ञानसिंह सोहनपाल 1982 से 2011 तक लगातार सात बार विधायक रहे हैं और उन्हें हराने वाला भी अगर किसी पहचान का मोहताज रह जाता तो यह गलत होता। क्योंकि राजनीति में कुछ भी परमानेंट नहीं होता... हां दिग्गज नेताओं के मामले में यह जरूर कह सकते हैं कि वह परमानेंट टेम्परेरी होते हैं।

दिलीप घोष 2016 में पहली बार विधानसभा पहुंचे और फिर 2019 में उन्होंने लोकसभा में अपनी किस्मत आजमाई और विजयी भी हुए।





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