कभी एक वोट से हारा था चुनाव, आज सुगमता से कर रहे हैं 17वीं लोकसभा का संचालन

By अभिनय आकाश | Publish Date: Jun 25 2019 1:15PM
कभी एक वोट से हारा था चुनाव, आज सुगमता से कर रहे हैं 17वीं लोकसभा का संचालन
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साल 1984 में छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए पर्चा भरने और पहला ही मुकाबला करण सिंह से महज एक वोट से हारने वाले ओम बिरला ने उस हार के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह भाजयुमो से जुड़े फिर कोटा से जयपुर आए और युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए।

सदन को सुचारू रूप से चलाना लोकसभा स्पीकर या लोकसभा अध्यक्ष की सबसे अहम और बड़ी जिमेमदारी होती है। लोकसभा अपने अब तक के 17 कार्यकाल के दौरान कई ऐसे स्पीकरों से रूबरू होती रही है जिन पर कभी सत्ता पक्ष का साथ देने के आरोप लगे तो किसी वक्त में सता पक्ष से ही स्पीकर की टकराहट का गवाह बना है सदन का पटल। 17वीं लोकसभा का नौवां दिन चल रहा है और बीते आठ दिन में सदन में शपथ से लेकर कई बिल भी पेश किए गए। बात करें लोकसभा को सुचारू ढंग से चलाने की जिम्मेदारी का निर्वहन करते अध्यक्ष ओम बिरला की तो पहले दिन से लेकर अब तक ओम बिड़ला कभी सख्त तो कभी नरम तेवर में नजर आए। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के सांसदों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने में उन्होंने कोई रियायत नहीं बरती। तीन तलाक विधेयक पेश करने को लेकर सदन में हंगामे के दौरान भी उन्होंने परंपराओं और नियमों का पूरा पालन किया। वह अध्यापक की भूमिका में नजर आए। 

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इसके अलावा उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए लोकसभा में आठवें दिन प्रश्नकाल के दौरान सदस्यों से छोटे पूरक प्रश्न पूछने पर विशेष जोर दिया जिसके कारण सदन में 9 मौखिक प्रश्न लिये जा सके। सदन में आम तौर पर प्रश्नकाल में पांच-छह मौखिक प्रश्न ही लिये जा पाते हैं। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने दसवां प्रश्न पूछने के लिए भारतीय जनता पार्टी के रामचंद्र बोहरा को आमंत्रित भी कर दिया। लेकिन इससे पहले पूछे गए प्रश्न को लेकर मंत्री के जवाब से विपक्ष संतृष्ट नहीं होने की वजह से उपजे व्यवधान की वजह से वह प्रश्न नहीं पूछ सके। जिसके बाद अध्यक्ष ने प्रश्नकाल समाप्त होने की घोषणा कर दी। 
कभी एक वोट से चुनाव हारने वाले बिरला के जीवन में 543 सदस्यों वाले सदन के संचालन जैसी बड़ी जिम्मेदारी एक दिन में आकर नहीं गिर गई। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह का भरोसा हासिल किया कि वो सुगमता से लोकसभा का संचालन कर सकते हैं। वैसे तो अमूमन स्पीकर वरिष्ठ लोगों को बनाए जाने की दलील दी जाती रही। जिसमें आठ बार की सांसद सुमित्रा महाजन और पांच बार की सांसद मीरा कुमार व सोमनाथ चैटर्जी जैसे उदारहरण पेश किए गए। लेकिन इतिहास को और बारीकी से देखें तो 1998 में दो बार के तेलगू देशम पार्टी के सांसद गति मोहन चंद्र बालयोगी 12वीं लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए थे। वहीं साल 2002 में बालयोगी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद पहली बार के शिवसेना सांसद मनोहर जोशी स्पीकर बनाए गए थे। मनोहर जोशी महाराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना की पहली सरकार में मुख्यमंत्री भी रहे थे। 
ओम बिरला को अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे मोदी 2.0 ने योग्यता, निपुणता और कार्य करने की तत्परता ही किसी व्यक्ति को दायित्व सौंपने का पैमाना होगी जैसे संदेश देने की कोशिश है। वहीं कई राजनीतिक विश्लेषक मोदी सरकार के इस कदम को ओम बिरला के वसुंधरा खेमे के नहीं माने जाने और उन्हें लोकसभा अध्यक्ष बना कर राजस्थान प्रदेश भाजपा में सक्रिय नेताओं को संदेश देने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। संगठन में कर्तव्यनिष्ठा से काम करना ही नेताओं की तरक्की का पैमाना होगी आपेतु किसी नेता के समर्थक होना नहीं। 
साल 1984 में छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए पर्चा भरने और पहला ही मुकाबला करण सिंह से महज एक वोट से हारने वाले ओम बिरला ने उस हार के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह भाजयुमो से जुड़े फिर कोटा से जयपुर आए और युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। राम मंदिर निर्माण आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण ओम बिरला को उत्तर प्रदेश में जेल भी भेजा गया था। साल 2003 में दक्षिण कोटा सीट से चुनकर वह विधानसभा पहुंचे। बिरला के पास एक छुपा हुआ गुण है कुशल प्रबंधन का जो उन्हें युवा मोर्चा में काम करते प्राप्त हुआ था। जिसके बल पर वो आगे के दो और विधानसभा चुनाव भी इसी सीट से जीत गए। 
राजस्थान विधानसभा में अच्छे प्रदर्शन वाले विधायकों के नाम ‘सदन के सितारे’ सूची में शामिल किया जाता है जिसमें बिरला का नाम इस सूची में 6 बार आया है। नरेंद्र मोदी ने ओम बिरला को इस वजह से लोकसभा अध्यक्ष बनाया, जैसे कई तथ्य और इतिहास को आधार बनाकर इस औचित्य को साबित करने की अलग-अलग कोशिश विश्लेषक कर रहे हैं। बहरहाल, नरेंद्र मोदी की सियासत का अनोखा अंदाज है कि वो आखिर तक पत्ते अपने सीने के करीब रखते हैं और क्यों और कब कोई दांव खेल दें इसका पता लगा पाना और समझ पाना सियासी पंडितों के लिए मुश्किल है।

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