Jan Gan Man: जिस केस पर सुनवाई चल रही है, क्या उस पर कोर्ट से बाहर जज दे सकते हैं बयान? Justice Ujjal Bhuyan के बयान पर उठा Judicial Propriety का सवाल

जस्टिस बी.आर. गवई का उत्तर एकदम स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि जिस मुद्दे पर अदालत में सुनवाई चल रही हो, उस पर किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश का सार्वजनिक रूप से बोलना न्यायिक अनुशासन और मर्यादा के अनुरूप नहीं है।
न्यायपालिका की ताकत केवल उसके फैसलों में नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत मर्यादा और निष्पक्षता में भी निहित होती है। यही वजह है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की सार्वजनिक टिप्पणी पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की आपत्ति को महज दो न्यायाधीशों के बीच मतभेद के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि जब कोई विषय अदालत के सामने विचाराधीन हो, तब क्या उसी अदालत का कोई वर्तमान न्यायाधीश सार्वजनिक मंच से उस विषय पर ऐसी टिप्पणी कर सकता है, जिससे मामले के गुण-दोष पर उसकी राय पहले से स्पष्ट होती हुई दिखाई दे?
जस्टिस गवई का उत्तर स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि जिस मुद्दे पर अदालत में सुनवाई चल रही हो, उस पर किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश का सार्वजनिक रूप से बोलना न्यायिक अनुशासन और मर्यादा के अनुरूप नहीं है। उनका कहना था कि ''न्यायिक अनुशासन और न्यायिक मर्यादा'' किसी भी न्यायाधीश को ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने से रोकती है जो सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट या किसी अन्य अदालत के समक्ष लंबित हों।
इस आपत्ति की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि जस्टिस भुइयां ने केवल लोकतंत्र में मताधिकार के सामान्य महत्व की बात नहीं की। उन्होंने SIR की उस प्रक्रिया के संदर्भ में कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित करती है तो वह “मूलतः मनमानी'' है और संविधान के मूल ढांचे के लिए गंभीर चुनौती है। उन्होंने इसे अनुच्छेद 14 और 326 के संदर्भ में भी रखा और कहा कि संविधान नागरिकों को मतदान के अधिकार के आधार पर दो वर्गों में विभाजित नहीं करता।
देखा जाये तो निश्चित तौर पर मताधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का केंद्रीय तत्व है और मतदाता सूची में वास्तविक पात्र नागरिक का नाम न रह जाना गंभीर विषय है। लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा कि किसी प्रक्रिया से संभावित रूप से गलत तरीके से नाम हटने की आशंका और पूरी प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से मनमाना घोषित करने के बीच काफी दूरी है। पहला सवाल तथ्य और प्रक्रिया का है, जबकि दूसरा न्यायिक निष्कर्ष का है। जब दूसरा सवाल उसी समय अदालत के सामने विचाराधीन हो, तब सार्वजनिक मंच से उसके बारे में कठोर संवैधानिक निष्कर्ष देना न्यायिक निष्पक्षता की धारणा को प्रभावित कर सकता है।
यही बात सेवानिवृत्त दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश एसएन ढींगरा और आरएस सोढ़ी की प्रतिक्रियाओं में भी दिखाई देती है। जस्टिस ढींगरा ने कहा कि किसी लंबित मामले पर सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए थी और टिप्पणी करने से पहले न्यायिक पद की मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए था। जस्टिस सोढ़ी ने एक दूसरे महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि मत देने का अधिकार कानून और निर्धारित वैधानिक पात्रता के ढांचे से संचालित होता है। यानी मतदाता सूची में नाम होना केवल भावनात्मक या राजनीतिक प्रश्न नहीं, बल्कि कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और पात्रता से जुड़ा विषय भी है।
दरअसल, SIR पर सुप्रीम कोर्ट का अपना रिकॉर्ड भी बताता है कि मामला उतना सरल नहीं है जितना “मताधिकार बनाम मताधिकार-विरोध” की दो ध्रुवीय बहस में दिखाई देता है। बिहार में SIR की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था और इसे जनप्रतिनिधित्व कानून तथा संविधान के अनुच्छेद 324 से जुड़ी शक्तियों के दायरे में माना था। अदालत ने प्रक्रिया में कई सुरक्षा उपायों पर भी जोर दिया। पश्चिम बंगाल से संबंधित कार्यवाही में भी सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की सहायता, दावों की जांच और अपील की व्यवस्था जैसे उपायों पर निर्देश दिए। अदालत के रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में दावों और आपत्तियों के निपटारे का भी उल्लेख है।
इसलिए जस्टिस भुइयां की चिंता को लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन जस्टिस गवई की आपत्ति को भी उतनी ही गंभीरता से समझना होगा। देखा जाये तो न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियां सामान्य सार्वजनिक बहस का हिस्सा नहीं होतीं। न्यायाधीश के शब्दों का वजन उसके पद से आता है। यदि वही न्यायाधीश किसी ऐसे विवाद पर सार्वजनिक मंच से तीखी संवैधानिक राय व्यक्त करे, जिस पर अदालत को सुनवाई करनी है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि क्या बाद की न्यायिक प्रक्रिया उस सार्वजनिक धारणा से पूरी तरह अलग रह पाएगी?
यहां जस्टिस गवई की बात का महत्व सामने आता है। न्यायपालिका को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि उसे निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। न्यायिक मर्यादा इसी दिखाई देने वाली निष्पक्षता की रक्षा करती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि जस्टिस भुइयां का यह सार्वजनिक रूप से संवैधानिक मुद्दों पर मुखर होने का पहला उदाहरण नहीं है। हाल के महीनों में उन्होंने आपराधिक न्याय व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े कई विषयों पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपने विचार रखे हैं। सितंबर में उन्होंने बड़ी संख्या में लंबित आपराधिक मामलों के बीच निरर्थक मुकदमों पर भी चिंता जताई थी। NALSAR में उन्होंने उन छात्रों की भी प्रशंसा की जिन्होंने संस्थागत मुद्दों पर अपनी असहमति मुखरता से रखी। लेकिन कानून के विद्यार्थियों को संस्थाओं पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करना और किसी लंबित न्यायिक विवाद के गुण-दोष पर वर्तमान न्यायाधीश की सार्वजनिक राय रखना, दो अलग बातें हैं।
बहरहाल, मतदाता के अधिकार की रक्षा और न्यायिक मर्यादा, दोनों संविधान के ही हिस्से हैं। SIR से यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटता है तो उसका उपचार न्यायिक और वैधानिक प्रक्रिया में होना चाहिए। लेकिन उस प्रक्रिया का अंतिम संवैधानिक मूल्यांकन अदालत के भीतर होना चाहिए, किसी अन्य मंच से नहीं। जस्टिस गवई की आपत्ति इसी संस्थागत सीमा की याद दिलाती है। शायद यही लोकतंत्र में न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति भी है कि फैसला सुनाने से पहले फैसला सुनाने से बचना।
-नीरज कुमार दुबे
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