1989 में कश्मीरी पंडित की हत्या के मामले में जांच की याचिका खारिज

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उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह 1989 में एक कश्मीरी पंडित की हत्या के मामले में जांच के अनुरोध वाली याचिका को विचारार्थ स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है और याचिकाकर्ता राहत पाने के लिए उच्च न्यायालय में जा सकते हैं।

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह 1989 में एक कश्मीरी पंडित की हत्या के मामले में जांच के अनुरोध वाली याचिका को विचारार्थ स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है और याचिकाकर्ता राहत पाने के लिए उच्च न्यायालय में जा सकते हैं। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार की पीठ ने कहा कि उसने हाल में एक ऐसी ही याचिका पर विचार करने से मना कर दिया था। उसने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

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पीठ ने कहा, ‘‘आप इसे वापस लेना चाहें तो ले सकते हैं। हमने साफ कर दिया है कि हम दो याचिकाओं के बीच भेदभाव नहीं कर सकते।’’ याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने याचिका को इस स्वतंत्रता के साथ वापस ले लिया कि वह कानून में प्रदत्त उचित उपाय अपना सकते हैं। उन्होंने दलीलों के दौरान कहा कि याचिका एक ‘बहुत गंभीर मामले’ से जुड़ी है और उस व्यक्ति ने दायर की है जिनके पिता टी एल टपलू की 1989 में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) ने नृशंस हत्या कर दी थी। उन्होंने कहा, ‘‘वहां जो माहौल था, उसे देखते हुए मैं आज केवल न्याय चाह रहा हूं और कुछ नहीं।’’

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भाटिया ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों में शीर्ष अदालत के आदेश का जिक्र किया और कहा कि 30 साल से अधिक समय बाद कार्रवाई की गयी, आरोपपत्र दाखिल किये गये और लोग दोषी ठहराये गये। पीठ ने कहा, ‘‘हम याचिका पर विचार नहीं करना चाहते। हमें हमारे उच्च न्यायालयों पर भरोसा है।’’ भाटिया ने कहा कि हाल में शीर्ष अदालत ने जो याचिका खारिज की थी, वह एक एनजीओ की थी जबकि यह याचिका उस व्यक्ति ने दायर की है जिनके पिता की नृशंस हत्या कर दी गयी थी। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता जो दिल्ली निवासी हैं, को उनके पिता की हत्या के फौरन बाद कश्मीर छोड़ने को कहा गया था।

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