पूरा ट्रांसपोर्ट बंद नहीं कर सकते, मेट्रो और ट्रेन रद्द करने पर दोबारा करें विचार, CJP प्रोटेस्ट से पहले पाबंदियों पर सरकार को SC का निर्देश

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ANI
अभिनय आकाश । Oct 9 2026 3:56PM

सुप्रीम कोर्ट ने एक विरोध रैली से पहले दिल्ली पुलिस द्वारा 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के निर्देश पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि नागरिकों के विरोध करने के अधिकार और आम जनता की बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच के बीच संतुलन होना आवश्यक है। बेंच ने पुलिस की इस कार्रवाई को ज़रूरत से ज़्यादा बताया।


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के उस फ़ैसले पर गंभीर चिंता जताई, जिसमें उसने दिल्ली मेट्रो को शनिवार को 57 स्टेशन बंद करने का निर्देश दिया था। शनिवार को ही राजधानी में CJP की एक रैली होनी है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इस कदम से उन नागरिकों के अधिकारों पर असर पड़ेगा जो इन सेवाओं का इस्तेमाल करने के हकदार हैं। सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध करने के अधिकार और दूसरे नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कई सीनियर वकीलों - जिनमें कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर शामिल थे - की दलीलें सुनीं। इन वकीलों ने शनिवार के विरोध प्रदर्शन से पहले पुलिस द्वारा लगाई गई कड़ी पाबंदियों पर सवाल उठाए।'

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वकीलों ने मेट्रो स्टेशन बंद करने, ट्रेनें रद्द करने, आवाजाही पर रोक लगाने और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) व होटलों को दिए गए उन निर्देशों पर चिंता जताई, जिनसे लोगों को इकट्ठा होने या दिल्ली आने से रोका जा सकता था। सिब्बल ने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय राजधानी में ऐसी पाबंदियां कैसे लगाई जा सकती हैं, जबकि सिंघवी ने तर्क दिया कि जब कोई घटना ही नहीं हुई है, तो इतने बड़े पैमाने पर एहतियाती कदम उठाने को सही नहीं ठहराया जा सकता। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन कदमों का बचाव करते हुए कहा कि इनका मकसद कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। बेंच ने कहा कि इन पाबंदियों से आम नागरिकों के अधिकारों को लेकर चिंताएं पैदा हुई हैं और इस बात पर ज़ोर दिया कि विरोध करने के अधिकार और ज़रूरी सुविधाओं तक आम लोगों की पहुँच के बीच संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत है।

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जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा हमें विरोध करने के इच्छुक नागरिकों के अधिकारों और आम जनता के बुनियादी सुविधाओं तक पहुँचने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत है।" उन्होंने यह भी कहा कि अदालत के सामने पेश किए गए तथ्यों के आधार पर पुलिस की कार्रवाई ज़रूरत से ज़्यादा (disproportionate) लग रही थी।

कोर्ट ने सभी तरह की पाबंदियों पर सवाल उठाए

सुनवाई के दौरान, वकीलों ने तर्क दिया कि पाबंदियां विरोध-प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी हद से ज़्यादा थीं। उन्होंने ट्रेनों के रद्द होने, मेट्रो बंद होने, दिल्ली की सीमाओं पर जांच और होटलों को नई बुकिंग न लेने के निर्देशों का हवाला दिया।

सीनियर वकील गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि मेट्रो स्टेशनों के बंद होने और ट्रेनों के रद्द होने से लाखों यात्रियों पर असर पड़ेगा, न कि सिर्फ़ उन लोगों पर जो विरोध-प्रदर्शन में शामिल होना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों को आने-जाने की आज़ादी और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने का अधिकार है। वकीलों ने पुलिस की उन सलाहों पर भी चिंता जताई जिनमें लोगों से बाहर न निकलने या सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा न होने के लिए कहा गया था। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि क्या होटलों और पेइंग गेस्ट आवासों में पुलिस के जाने और पूछताछ करने के दावों को रिकॉर्ड पर रखा गया है।

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