चुनावों में काफी अहम होती है खापों की भूमिका, साधने में जुटे सियासी दल

चुनावों में काफी अहम होती है खापों की भूमिका, साधने में जुटे सियासी दल

कहा जाता है कि चुनाव से पहले विभिन्न खापों को साधने में तमाम राजनीतिक दल जुट जाते हैं। 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जींद में एक चुनावी सभा को संबोधित किया अपने संबोधन में कहा था कि यहां अनेक क्षेत्रों के विभिन्न खापों के सरदारी मौजूद हैं।

देश में कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठनों का आंदोलन चल रहा है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब में है। माना जा रहा है कि किसान आंदोलन को अब तक बनाए रखने में खापों की भूमिका काफी अहम है। माना जा रहा है कि आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में राज्य के पश्चिमी हिस्से में खाप पंचायतों की भूमिका काफी अहम रहने वाली है। कहा जाता है कि चुनाव से पहले विभिन्न खापों को साधने में तमाम राजनीतिक दल जुट जाते हैं। 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जींद में एक चुनावी सभा को संबोधित किया अपने संबोधन में कहा था कि यहां अनेक क्षेत्रों के विभिन्न खापों के सरदारी मौजूद हैं। मुझे आशीर्वाद देने के लिए पधारे उनके सरदारी को मैं शत शत नमन करता हूं। प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य से इस बात का अनुमान तो लगाया जा सकता है कि चुनाव में हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खापों की क्या भूमिका रहती है।

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चुनाव में खापों की भूमिका

किसान आंदोलन के बीच भाजपा के लिए खापों को साधना एक बड़ी चुनौती है। कृषि कानूनों के खिलाफ हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार खाप पंचायत होते हैं और अलग-अलग प्रस्ताव इसमें पास किए जाते है। एक अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय में लोक प्रशासन के पूर्व प्रोफेसर और खाप पंचायत पर रिसर्च करने वाले राजकुमार सिवाच का कहना है कि फिलहाल सियासत में खापों की भूमिका सांकेतिक ही रह गई है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव को दिया जिसमें प्रभावी मालिकों के गठवाला खाप के चौधरी दादा बलजीत सिंह खुद चुनाव हार गए थे। इतना ही नहीं, खाप से ही जुड़ी संतोष दहिया को भी जीत नहीं मिली थी। 2000 के दशक में राजनीति में खापों का वर्चस्व हुआ करता था। इसकी सबसे बड़ी वजह  यह थी कि खाप सामाजिक मुद्दों पर मुखर हुआ करते थे। हालांकि धीरे-धीरे खाप राजनीतिक तौर पर खुद को मोड़ने लगे।

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किसान आंदोलन का प्रभाव 

खाप पंचायत से निकलने वाली हर फरमान लोगों के लिए बड़ा संदेश जरूर हुआ करती थी। लेकिन समाज में जागरूकता आने के बाद अब इसका असर कम होने लगा है। किसान आंदोलन की वजह से आप एक बार फिर से चर्चा में है। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और जाटों की बालियान खाप के मुखिया नरेश टिकैत के छोटे भाई राकेश टिकैत के आंसुओं के बाद उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कई खाप सरकार के विरोध में मुखर हो गए। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की पहली प्राथमिकता रही। राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी को हाल में ही बड़े चौधरी घोषित करने के लिए रस्में पकड़ी हुई जिसमें खापों के चौधरियों की जुटान भी हुआ। एक और विशेषज्ञ ने कहा कि चुनावी लोकतंत्र में जाति या वर्ग समूह एक कड़वा सच है। नेता हो या उम्मीदवार, उनका चयन काफी हद तक इसी आधार पर भी होता है। यही कारण है कि चुनावों में इस समूह की भूमिका को फिलहाल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 





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