अयोध्या विवाद के स्थायी समाधान के लिए मध्यस्थता पर विचार करें पक्षकार: SC

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Feb 27 2019 8:04AM
अयोध्या विवाद के स्थायी समाधान के लिए मध्यस्थता पर विचार करें पक्षकार: SC
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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि वह रिश्तों को सुधारने की संभावना तलाश रहा है।

नयी दिल्ली। राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील अयोध्या में राम जन्म भूमि - बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को संबंधित पक्षों से कहा कि अगर ‘‘एक फीसदी भी’’ सफलता की गुंजाइश है तो वे मुद्दे के स्थायी समाधान के लिये गंभीरता से मध्यस्थता पर विचार करें। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि वह रिश्तों को सुधारने की संभावना तलाश रहा है। संविधान पीठ ने कहा कि इस मामले को न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थ को सौंपने या नहीं सौंपने के बारे में छह मार्च को आदेश दिया जायेगा।

एक अन्य दौर के मध्यस्थता के सुझाव पर दशकों पुराने इस विवाद के पक्षकारों की तरफ से मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। इस विवाद का मध्यस्थता के जरिये समाधान खोजने का सुझाव पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति एस ए बोबडे ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई के दौरान दिया। न्यायमूर्ति बोबडे ने यह सुझाव उस वक्त दिया जब इस विवाद के दोनों हिन्दू और मुस्लिम पक्षकार उप्र सरकार द्वारा अनुवाद कराने के बाद शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में दाखिल दस्तावेजों की सत्यता को लेकर उलझ रहे थे।

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इस दौरान पीठ ने कहा, ‘हम इस बारे में (मध्यस्थता) गंभीरता से सोच रहे हैं। आप सभी (पक्षकार) ने यह शब्द प्रयोग किया है कि यह मामला परस्पर विरोधी नहीं है। हम मध्यस्थता के लिये एक अवसर देना चाहते हैं, चाहे इसकी एक प्रतिशत ही संभावना हो।’ संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। पीठ ने कहा, ‘हम आपकी (दोनों पक्षों) की राय जानना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि सारी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिये कोई तीसरा पक्ष इस बारे में टिप्पणी करे।’

पीठ ने कहा, ‘हमने ऐसा आठ सप्ताह की अवधि को ध्यान में रखते हुए किया है, जो हमने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुवाद का अध्ययन करने के लिये पक्षकारों को दिया है। इसका ऊपर बताए गए तरीके से मुद्दे का समाधान करने का प्रयास करने और उसे करने में किया जा सकता है।’ पीठ ने कहा, ‘हमने पक्षकारों को सुझाव दिया है कि इस अंतराल में अदालत द्वारा नियुक्त और अदालत की निगरानी में मध्यस्थता पूरी गोपनीयता के साथ शुरू की जा सकती है ताकि मामले में उठाए गए मुददों का स्थायी समाधान निकाला जा सके।’



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पीठ ने अपने आदेश में गौर किया कि मूल वादकारों एम सिद्दीक और मोहम्मद हाशिम के कानूनी वारिसों और निर्मोही अखाड़ा का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील इस भूमि विवाद का हल खोजने के लिये न्यायालय द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति के सुझाव से सहमत हैं वहीं राम लला विराजमान सहित कुछ हिन्दू पक्षकारों ने इस पर आपत्ति करते हुये कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया पहले भी कई बार असफल हो चुकी है। पीठ ने पक्षकारों से पूछा, ‘क्या आप गंभीरता से यह समझते हैं कि इतने सालों से चल रहा यह पूरा विवाद संपत्ति के लिये है? हम सिर्फ संपत्ति के अधिकारों के बारे में निर्णय कर सकते हैं परंतु हम रिश्तों को सुधारने की संभावना पर विचार कर रहे हैं।’

सुनवाई के दौरान मूल वादी एम सिद्दीक के कानूनी उत्तराधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि वह मध्यस्थता के इस ‘‘बेहद महत्वपूर्ण सुझाव’’ के लिये राजी है परंतु न्यायालय को मध्यस्थता के लिये समय सीमा निर्धारित करनी चाहिए क्योंकि यह पेचीदा मुद्दा है। पीठ ने कहा, ‘हमें मध्यस्थ से बातचीत के बाद ही समय सीमा निर्धारित करनी होगी।’ राम लला विराजमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने कहा कि वह किसी भी तरह की मध्यस्थता के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा, ‘हम मध्यस्थता का दूसरा दौर नहीं चाहते।’

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उन्होंने कहा, ‘पहले मध्यस्थता के दौरान यह स्वीकार किया गया था कि राम लला का जन्म अयोध्या में हुआ था परंतु इस (विवादित) स्थान पर नहीं। मध्यस्थता के प्रयास एक बार नहीं बल्कि कई बार किये गये हैं।’ एक अन्य पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने कहा कि मध्यस्थता के पहले दौर में बात नहीं बनी थी और सभी चाहते थे कि इस मामले का फैसला शीर्ष अदालत ही करे। उन्होंने कहा, ‘मध्यस्थता संभव नहीं है, अत: न्यायालय को ही इस मामले का निर्णय करना चाहिए।’ धवन 1991-93 के दौरान हुये मध्यस्थता का जिक्र करते हुये कहा कि व्यापक जनहित में यह न्यायालय एक बार फिर (मध्यस्थता) के लिये (मध्यस्थता) कह रहा है। हमारी तरफ से, हम तैयार हैं।

इससे पहले, सुनवाई शुरू होते ही पीठ ने कहा कि अगर अनूदित दस्तावेजों की सत्यता के संबंध में आम सहमति है तो वह आगे की सुनवाई शुरू कर सकती है। पीठ ने कहा, ‘यदि अनूदित दस्तावेज सभी को स्वीकार्य हैं,कोई भी पक्षकार सुनवाई शुरू होने के बाद अनुवाद पर सवाल नही उठा सकता है।’ पीठ ने इस मामले में दस्तावेजों की स्थिति और सीलबंद रिकार्ड के बारे में शीर्ष अदालत के सेक्रेटरी जनरल की रिपोर्ट की प्रतियों का जिक्र किया और प्रधान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों के वकीलों से कहा कि वे इनका अवलोकन कर लें। उन्होंने कहा, ‘‘इस रिकार्ड में 38,147 पृष्ठ हैं जिसमें 12,814 पन्ने हिन्दी में, 18,607 पेज अंग्रेजी में, 501 पेज उर्दू में, 97 पेज गुरूमुखी में, 21 पेज संस्कृत में, 86 पेज दूसरी भाषा की लिपियों में हैं। इसके 14 पन्नों में तस्वीरें हैं और 1,729 पृष्ठों में एक से अधिक भाषा की लिपि में हैं।



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पक्षकारों के साथ साझा की गयी रिपोर्ट के अनुसार 11,479 पन्नों का अनुवाद करने की जरूरत है और अगर शीर्ष अदालत के सभी आठ अनुवादकों को यह काम करने के लिये कहा जाये तो भी यह मामला पूरी तरह सुनवाई के लिये तैयार होने हेतु करीब 120 दिन लगेंगे। हालांकि, वैद्यनाथन ने कहा कि अनुवाद करने की कवायद पहले ही हो चुकी है और इसकी सत्यता पर पक्षकारों ने कोई आपत्ति नहीं की थी। उन्होंने कहा कि दिसंबर, 2017 में सभी पक्षों द्वारा इसे स्वीकार करने के बाद अब दूसरे पक्ष द्वारा अनुदित दस्तावेजों की सत्यता को मुद्दा बनाना उचित नहीं है। इस पर धवन ने कहा कि उन्हें अनूदित दस्तावेजों को अभी देखना है और उन्हें दस्तावेजों के अनुवाद की सत्यता को भी परखना है।

पीठ ने कहा कि वह यह नहीं चाहती कि सुनवाई शुरू होने के बाद इन दस्तावेजों की सत्यता पर कोई पक्ष आपत्ति करे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में कुल 14 अपील दायर की गयी हैं। उच्च न्यायालय ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन हिस्सों में सुन्नी वक्फ बोर्ड, राम लला और निर्मोही अखाड़े के बीच बांटने का आदेश दिया था।

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