झारखंड के खतरे को बनिये शाह ने किया महसूस, कार्यकर्ताओं को बेवकूफ न बनाने की दी हिदायत

झारखंड के खतरे को बनिये शाह ने किया महसूस, कार्यकर्ताओं को बेवकूफ न बनाने की दी हिदायत

बीजेपी के आक्रामक प्रचार की कमान अमित शाह ने खुद अपने हाथों में ली है और 21 नवंबर से चुनाव प्रचार की शुरुआत भी कर दी है। बीते दिनों भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने झारखंड के चतरा में एक चुनावी सभा में कहा भी कि इतनी भीड़ से चुनाव कैसे जीत पाएंगे। आप मुझे बेवकूफ मत बनाओ, मैं भी बनिया हूं।

लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व सफलता हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मोदी रथ पर सवार दो राज्यों के विधानसभा चुनाव में उतरी। मोदी लहर और पक्ष में माकूल हवा के एहसास को बीजेपी तो महसूस कर रही थी लेकिन वोटरों ने कमल का बटन दबाने में पिछले चुनाव जैसी उत्सुकता नहीं दिखाई। नतीजतन हरियाणा में जैसे-तैसे जननायक जनता पार्टी के सहारे बीजेपी ने मनोहर सरकार बना ली। लेकिन महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य के सियासी घटनाक्रम ने पार्टी को बुरी तरह झकझोड़कर रख दिया। पिछली बार के विधानसभा चुनाव में 122 सीटें जीतने वाली बीजेपी 105 के आंकड़े पर सिमट गई और मौके की नजाकत को देखते हुए 25 साल पुरानी सहयोगी ने भी पाला बदल लिया। इन सब के बीच बीजेपी के लिए आगामी चुनाव साख का प्रश्न बन गया है। झारखंड में चुनावी रणभेरी बजने के साथ ही सभी राजनीतिक दलों ने संग्राम के लिए राजनीतिक 'योद्धाओं' की तलाश तेज कर दी है। अभी तक जो स्थिति उभरी है, उसमें यह माना जा रहा है कि बीजेपी और कांग्रेस-झामुमो गठबंधन के बीच आमने-सामने की लड़ाई होगी। सहयोगी पार्टी ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) ने बीजेपी का साथ छो़ड़ दिया वहीं लोजपा और नीतीश की जदयू भी झारखंड में एकला चलो रे कि राह पर है। 

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महाराष्ट्र और हरियाणा के बुरे अनुभव के बाद बीजेपी झारखंड को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। दोनों राज्यों में राष्ट्रवाद का मुद्दा तकरीबन रिजेक्ट हो जाने के चलते बीजेपी चुनाव जिताने वाले कुछ और कारगर उपायों को तलाश रही है। सत्ता विरोधी फैक्टर झारखंड में भी बीजेपी की रघुवर दास सरकार पर वैसे ही लागू होता है, जैसे महाराष्ट्र और हरियाणा की हालत रही। क्योंकि राजग की मजबूती कायम रखने के लिहाज से भी झारखंड विधानसभा का चुनाव बीजेपी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। पार्टी अगर इस सूबे में अपनी सत्ता बरकरार नहीं रख पाई तो राजग के कुनबे में खटपट बढने की संभावना है। सहयोगी दल भाजपा पर दबाव बढ़ाने का मौका नहीं गंवाएंगे। राज्य में पांच चरण में चुनाव होने हैं। ऐेसे में बीजेपी के आक्रामक प्रचार की कमान अमित शाह ने खुद अपने हाथों में ली है और 21 नवंबर से चुनाव प्रचार की शुरुआत भी कर दी है। बीते दिनों भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने झारखंड के चतरा में एक चुनावी सभा में कहा भी कि इतनी भीड़ से चुनाव कैसे जीत पाएंगे। आप मुझे बेवकूफ मत बनाओ, मैं भी बनिया हूं। यहां से घर जाकर 25-25 लोगों को फोन करें और भाजपा को वोट देने की अपील करें। शाह ने सभा में उपस्थित भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि जिनके पास मोबाइल है, वे हाथ उठाएं। उन्‍होंने 10-15 हजार लोगों को भाजपा की जीत का रास्‍ता बताते हुए कहा कि गणित मुझे भी आता है। आप सब मिलकर कमल निशान पर बटन दबाने की अपील करो। मतलब साफ है कि रैली में भीड़ आना एक बात है और वोट देना और। शाह इस बात को भली-भांति जानते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बीजेपी झारखंड में पिछले बार के प्रदर्शन को दोहराने को लेकर आशंकित है। वहीं बीजेपी महाराष्ट्र और हरियाणा के मुकाबले मोदी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की पक्षधर है। लेकिन सूत्रों के अनुसार मोदी ने झारखंड में अधिकतम 5 दिन ही देने का फैसला किया है। इससे अधिक दिन देने की मांग उन्होंने खारिज कर दी है। यानी पांच दिन में उनकी 10 सभाएं कराने की तैयारी है। 

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भौगोलिक रूप से झारखंड तीन से चार हिस्सों में बंटा है। इनमें एक संथाल परगना है। ये क्षेत्र पश्चिम बंगाल से लगा हुआ है। यहां पर झारखंड मुक्ति मोर्चा का वर्चस्व है। जमशेदपुर के आसपास का इलाका कोलहन है। वहीं झारखंड मध्‍य का हिस्‍सा छोटा नागपुर के रूप में प्रचलित है। यहां पर कुर्मी वोटरों का प्रभाव है। आजसू के सुदेश महतो का प्रभाव यहीं पर है। वहीं बात बाबूलाल मरांडी की पार्टी झेवीएम की करें तो कोडरमा, गोड्डा और जमेशदपुर में कुछ हद तक है। झामुमो के अलावा कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी प्रमुख खिलाड़ी हैं। कांग्रेस राज्य के गैरसंथाल आदिवासियों के बीच काफ़ी मजबूत है जबकि राजद का आधार उत्तरी झारखंड के ग़ैर-आदिवासियों इलाकों जैसे पलामू, चतरा आदि में है। वहीं सूबे में काबिज बीजेपी की बात करें तो उसकी पहुंच वैसे पूरे प्रदेश यानी इसके तीनों क्षेत्रों में है लेकिन यहां पर बीजेपी हरियाणा के फार्मूले पर काम कर रही है। यानी कि जैसे हरियाणा में सभी पार्टियों का ध्यान जाट वोटरों पर था तो बीजेपी ने गैर-जाट वोटरों पर अपना फोकस किया था। उसी तर्ज पर बीजेपी झारखंड में गैर-आदिवासी वोटरों पर फोकस कर रही है। जिसकी झलक टिकट वितरण में भी देखने को मिल रही है।

 

 

 





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