संभल मस्जिद विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट को आगे नहीं बढ़ना चाहिए था, सुप्रीम कोर्ट में दी गई दलील

संभल की शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट को दिसंबर 2024 के शीर्ष अदालत के आदेश के बाद आगे नहीं बढ़ना चाहिए था। मस्जिद समिति की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी ने यह दलील दी। इस मामले में अगली सुनवाई चार अगस्त को होगी।
नयी दिल्ली, 28 जुलाई उच्चतम न्यायालय को मंगलवार को बताया गया कि संभल की एक अदालत द्वारा शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर विवाद में सर्वे का आदेश दिए जाने के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को शीर्ष अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश की पृष्ठभूमि में आगे बढ़ना ही नहीं चाहिए था। उच्चतम न्यायालय ने 12 दिसंबर 2024 को दिए गए एक महत्वपूर्ण आदेश में देश की सभी अदालतों को अगले आदेश तक नए मुकदमे दर्ज करने और लंबित मामलों में कोई प्रभावी अंतरिम या अंतिम आदेश देने से रोक दिया था। ये मामले खासतौर पर धार्मिक स्थलों, विशेषकर मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े थे।
न्यायालय ने यह आदेश उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया था। साल 1991 के इस कानून के तहत किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक लगी है और प्रावधान है कि किसी उपासना स्थल का 15 अगस्त 1947 तक जो धार्मिक स्वरूप था, उसे बरकरार रखा जाए। हालांकि, अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।
संभल की जामा मस्जिद प्रबंधन समिति की ओर से दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई हुई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 19 मई 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली इन याचिकाओं पर न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई की। उच्च न्यायालय ने शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में संभल की अदालत द्वारा दिए गए सर्वे के आदेश के खिलाफ मस्जिद समिति की याचिका खारिज कर दी थी और निचली अदालत के सर्वे के आदेश को बरकरार रखा था।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि ‘कोर्ट कमिश्नर’ नियुक्त करने का आदेश और मुकदमा दोनों सुनवाई योग्य हैं। मस्जिद समिति की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी ने न्यायालय में दलील दी कि पहला सवाल यह है कि दिसंबर 2024 के उच्चतम न्यायालय के आदेश को देखते हुए उच्च न्यायालय इस मामले में आगे कैसे बढ़ सकता था। अहमदी ने कहा, “इस आदेश को देखते हुए उच्च न्यायालय आगे नहीं बढ़ सकता था।” उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश की जानकारी उच्च न्यायालय को विशेष रूप से दी गई थी।
साल 1991 के कानून का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून का पूरा उद्देश्य यही था कि विवादों को बढ़ने न दिया जाए और उन्हें शुरुआत में ही रोक दिया जाए। इस मामले में दलीलें चार अगस्त को भी जारी रहेंगी। मस्जिद समिति ने उच्च न्यायालय में 19 नवंबर 2024 के दीवानी न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी।
दीवानी न्यायाधीश ने मुगलकालीन मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया गया और उसी दिन सर्वे भी किया गया था। समिति का दावा था कि 24 नवंबर 2024 को किया गया दूसरा सर्वे अवैध था, क्योंकि दीवानी अदालत ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया था। पिछले साल 22 अगस्त को उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ मस्जिद समिति की याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताई थी।
उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था, “इस बीच, सभी पक्ष आज की स्थिति के अनुसार यथास्थिति बनाए रखें।” संभल की दीवानी अदालत में एक मुकदमा दायर किया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि संभल में एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। याचिका में दावा किया गया था कि मुगल बादशाह बाबर ने 1526 में हरिहर मंदिर को तोड़कर इस मस्जिद का निर्माण कराया था। उच्चतम न्यायालय ने 29 नवंबर 2024 को संभल की अदालत को मस्जिद और चंदौसी में उसके सर्वे से जुड़े मामले की कार्यवाही रोकने का आदेश दिया था।
साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को शहर में शांति एवं सद्भाव बनाए रखने का निर्देश दिया था।
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