Pellet Gun पर रोक लगाने से Supreme Court ने कर दिया साफ इंकार, Delhi Police ने भी FIR वापसी पर लगा दी शर्त!

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सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र से पूछा कि यदि पेलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े कोई स्थायी आदेश या दिशानिर्देश हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि BPRD की सलाह और दिशानिर्देश ऑनलाइन उपलब्ध होने चाहिए ताकि पुलिस प्रशासन में पारदर्शिता बनी रहे।

संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन के इस्तेमाल से उठे विवाद ने अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर नया मोड़ ले लिया है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों में बदलाव किए बिना पेलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। वहीं दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने राहत देते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज 13 एफआईआर वापस लेने का फैसला किया है। हालांकि हिंसा में शामिल आरोपियों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस राहत के दायरे से बाहर रखा गया है।

हम आपको बता दें कि प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने पेलेट गन पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता इन हथियारों को पूरी तरह समाप्त कराना चाहते हैं तो उन्हें उन कानूनी प्रावधानों को ही संविधान के अनुच्छेद-21 के विरुद्ध चुनौती देनी होगी, जो असाधारण परिस्थितियों में भीड़ नियंत्रण के लिए इनके इस्तेमाल की अनुमति देते हैं।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी साफ किया कि वह किसी विशेष घटना में पेलेट गन के कथित दुरुपयोग की जांच करने को तैयार है। अदालत ने केंद्र सरकार और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के महानिरीक्षक को नोटिस जारी करते हुए जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए CJP प्रदर्शन के दौरान तैनात RAF जवानों के हथियारों और इस्तेमाल किए गए गोला-बारूद का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।

हम आपको बता दें कि पूर्व आईबी विशेष निदेशक यशोवर्धन आजाद और दो घायल युवकों की ओर से दायर याचिकाओं में धातुयुक्त पेलेट गनों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन्हें "कम घातक" हथियार बताया जाता है, लेकिन नजदीक से चलाए जाने पर ये आंखों सहित शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने 19 वर्षीय साहिल लोछाब की आंख में लगी गंभीर चोट का हवाला देते हुए इसे पुलिस बल प्रयोग की क्रूरता का उदाहरण बताया।

याचिकाकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र के "लेस लेथल वेपन्स" संबंधी दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें भीड़ पर धातुयुक्त पेलेट इस्तेमाल करने को आवश्यकता, आनुपातिकता और तर्कसंगतता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत बताया गया है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत को बताया कि पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) की भीड़ नियंत्रण संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) में पेलेट गन के इस्तेमाल का उल्लेख नहीं है। हालांकि न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि संबंधित दस्तावेज केवल एक प्रस्ताव है और मौजूदा व्यवस्था में भीड़ नियंत्रण के लिए "ग्रेडेड रिस्पॉन्स" के तहत पेलेट गन का भी प्रावधान मौजूद है।

अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण छात्र आंदोलनों और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों में अहिंसक तरीके अपनाए जाने चाहिए, लेकिन कई बार शांतिपूर्ण आंदोलन असामाजिक तत्वों द्वारा हिंसक रूप ले लेते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास अलग-अलग स्तर के बल प्रयोग के विकल्प होना भी आवश्यक है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र से पूछा कि यदि पेलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े कोई स्थायी आदेश या दिशानिर्देश हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि BPRD की सलाह और दिशानिर्देश ऑनलाइन उपलब्ध होने चाहिए ताकि पुलिस प्रशासन में पारदर्शिता बनी रहे।

दूसरी ओर, इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम में दिल्ली पुलिस ने भी बड़ा फैसला लेते हुए CJP के संसद मार्च के बाद दर्ज 13 एफआईआर वापस लेने का निर्णय लिया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार यह राहत केवल उन प्रदर्शनकारियों को मिलेगी जिन पर हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप नहीं हैं। जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है या जिन पर सुरक्षा बलों पर हमला करने जैसे गंभीर आरोप हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

हम आपको याद दिला दें कि 20 जुलाई को हजारों प्रदर्शनकारी परीक्षा पेपर लीक, विशेष रूप से NEET-UG मामले में जवाबदेही की मांग को लेकर संसद मार्च में शामिल हुए थे। संसद के निकट प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई, जिसके बाद पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज और कथित तौर पर पेलेट गन का इस्तेमाल किया। इस घटना में कई लोग घायल हुए और बाद में दंगा, सरकारी कार्य में बाधा तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित विभिन्न धाराओं में कई एफआईआर दर्ज की गई थीं।

बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और दिल्ली पुलिस के फैसले ने इस पूरे विवाद को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रहने दिया है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि भीड़ नियंत्रण के नाम पर धातुयुक्त पेलेट गन का इस्तेमाल संवैधानिक कसौटी पर कितना टिकता है और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों में पुलिस बल प्रयोग की नई सीमाएं क्या होंगी।

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