Supreme Court ने प्रदर्शनों पर कहा: भटके युवाओं को परामर्श दें, पुलिस बरते संयम

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उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों को संयम बरतने और पथराव करने वाले गुमराह युवाओं को आक्रामक रवैये के बजाय परामर्श देकर शांत करने की सलाह दी है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 20 जुलाई को आयोजित संसद चलो मार्च से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि युवाओं की नाराजगी को दूर करने का सबसे प्रभावी उपाय उनकी बात सुनना और समझना है।

नयी दिल्ली, पांच अगस्त उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कानून-प्रवर्तन एजेंसियों को संयम बरतना चाहिए और कुछ ‘‘गुमराह तत्व’’ पथराव भी करें, तब भी युवाओं को शांत किया जाना चाहिए। न्यायालय ने 20 जुलाई को आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के आयोजकों के खिलाफ कथित तौर पर हिंसा भड़काने के आरोप में कार्रवाई के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमति जताई। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एक सेवानिवृत्त वायुसेना अधिकारी की ओर से दायर इस याचिका को इसी तरह के विषय पर एक याचिका के साथ जोड़ दिया।

याचिकाकर्ता मनीष कुमार सोलंकी की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने कहा, ‘‘15 दिन बीत चुके हैं... आयोजकों की जवाबदेही का क्या? वे एक चैनल से दूसरे चैनल पर जाकर भड़काऊ बयान दे रहे हैं और आग शांत करने के बजाय उसे भड़काने का काम कर रहे हैं।’’ राजस्थान में हाल में हुई कानून-व्यवस्था से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए वकील ने दलील दी कि सरकारों को प्रदर्शनकारियों की बात मानने के लिए ‘‘जरूरत से ज्यादा नहीं झुकना’’ चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘एक युवक की मौत हो चुकी है।

अगर सरकार राष्ट्रीय राजधानी से जुड़े मामले में हद से ज्यादा झुकती, तो क्या इससे राजस्थान में कोई मिसाल कायम नहीं होगी? वहां भी सरकार छात्रों की बात मानने के लिए जरूरत से ज्यादा झुकेगी। कल, अगर लखनऊ में डिग्री कॉलेज के छात्रों की कोई मांग हो और वे बसों पर पत्थर फेंकने लगें तो क्या उत्तर प्रदेश सरकार भी जरूरत से अधिक झुकेगी?’’ उनकी इस दलील पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि भले ही कुछ ‘‘गुमराह तत्व’’ पत्थर फेंके, लेकिन युवाओं को शांत करने और उन्हें सही सलाह देने की जरूरत है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘उन्हें सलाह और ‘काउंसलिंग’ की जरूरत है। राज्य की ओर से कोई भी आक्रामक रवैया सामाजिक तनाव को और बढ़ा सकता है तथा हिंसा को और भड़का सकता है। इससे हर हाल में बचा जाना चाहिए।’’ वकील ने कहा कि सरकार दबाव में थी, सिर्फ इसी आधार पर पथराव में शामिल लोगों को बिना किसी सजा या जवाबदेही के यूं ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘यह एक बहुत खतरनाक मिसाल है। तीन साल पहले किसान सिंघु बॉर्डर पर थे। कल ‘जेनरेशन अल्फा, बीटा, डेल्टा’ आएंगी।’’ वकील ने दलील दी कि संसद ‘‘लोकतंत्र का मंदिर’’ है।

उन्होंने कहा कि अगर 500 लोग परिसर में घुस जाते तो ‘‘कौन जानता है कि उनके पास हथियार था या नहीं?’’ उन्होंने कहा, ‘‘अगर वे गोली चला देते तो क्या होता? वे किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर मार्च नहीं कर रहे थे। वे रेलवे लाइन पर मार्च नहीं कर रहे थे।

वे लोकतंत्र के मंदिर की ओर मार्च कर रहे थे। हर किसी को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।’’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए और किसी घटना के होने पर संयम बरतना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘सबसे जरूरी बात है शांतिपूर्ण मार्च को बढ़ावा देना।

कोई घटना हो भी जाती है, तो पुलिस को भी बहुत संयम बरतना होगा ताकि स्थिति हाथ से न निकले। ऐसी घटनाएं जहां भी हों, हमें उनसे बहुत सावधानी से निपटना चाहिए।’’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हमें बहुत सावधानी से कदम उठाने होंगे, ताकि ये युवा हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएं। बेहतर तरीका यह है कि उन्हें परामर्श दिया जाए और उनकी नाराजगी को शांत किया जाए।

सबसे प्रभावी उपाय उनकी बात सुनना है। उनकी बात सुनिए और समझिए कि वे क्यों नारे लगा रहे हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन हम इसे कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की समझ-बूझ पर छोड़ते हैं। वे आपसे भी बेहतर जानते हैं और हमसे भी बेहतर जानते हैं कि ऐसी स्थिति से कैसे निपटना है।’’ याचिका में यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि पुलिस और सुरक्षा बलों के कर्मियों के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक का इस्तेमाल करने वालों की पहचान की जाए और उनसे सामुदायिक सेवा कराई जाए।

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