बीजेपी के पास जीत के लिए पर्याप्त संख्या, फिर भी सपा के बागी पर खेला दांव, 1984 के बाद क्यों आई UP में डिप्टी स्पीकर के लिए वोटिंग की नौबत

बीजेपी के पास जीत के लिए पर्याप्त संख्या, फिर भी सपा के बागी पर खेला दांव, 1984 के बाद क्यों आई UP में डिप्टी स्पीकर के लिए वोटिंग की नौबत

प्रदेश की सियासत में ये दूसरी बार होगा कि जब उपाध्यक्ष पद के लिए वोटिंग जैसी स्थिति आई हो। अभी तक राजनीतिक परंपरा के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष पद सत्ताधारी पार्टी के पास जबकि उपाध्यक्ष का पद विपक्षी दल के पास रहता रहा है।

उत्तर प्रदेश में आज विधानसभा का विशेष सत्र शुरू हो गया है। इस विशेष सत्र में प्रदेश सरकार द्वारा कुछ जरूरी विधेयकों को पास कराया जा सकता है। वहीं विधानसभा उपाध्यक्ष पद के चुनाव के लिए आज वोटिंग भी की जाएगी।  कल नितिन अग्रवाल ने बीजेपी नेताओं की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किया था। कांग्रेस ने डिप्टी स्पीकर चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला किया है। बीजेपी की तरफ से सपा प्रत्याशी नितिन अग्रवाल को अपना समर्थन दिया गया है। वहीं सपा के घोषित उम्मीदवार नरेंद्र सिंह वर्मा ने रविवार भी अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। बता दें कि नितिन अग्रवाल के पिता एवं पूर्व सांसद नरेश अग्रवाल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये थे। 

दूसरी बार विधानसभा उपाध्यक्ष पद के लिए वोटिंग

प्रदेश की सियासत में ये दूसरी बार होगा कि जब उपाध्यक्ष पद के लिए वोटिंग जैसी स्थिति आई हो। अभी तक राजनीतिक परंपरा के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष पद सत्ताधारी पार्टी के पास जबकि उपाध्यक्ष का पद विपक्षी दल के पास रहता रहा है। इसी वजह से उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव अमूमन नहीं होते नजर आते। हालांकि बीजेपी का कहना है कि विधानसभा में डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष का होता है और बीजेपी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। 

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कांग्रेस ने परंपरा तोड़ने की शुरुआत की

इससे पहले अतीत में साल 1984 में उपाध्यक्ष पद के लिए वोटिंग की नौबत आई थी। उस वक्त कांग्रेस 1980 के भारी बहुमत के साथ जीतकर सत्ता में लौटी थी। लेकिन दो साल के भीतर ही उसने दो मुख्यमंत्रियों को बदल दिया था। 1984 में नारायण दत्त तिवारी को सीएम बनाया गया। तभी वो दौर था जब कांग्रेस की ओर से इस परंपरा को तोड़ने की शुरुआत की गई और उपाध्यक्ष पद विपक्षी दल को नहीं देने का फैसला किया गया। कांग्रेस की तरफ से हुकुम सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया गया और संख्या बल अधिक होने की वजह से उन्होंने विपक्ष के रियासत हुसैन को मात देकर उपाध्यक्ष पद संभाला था। 

 





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