हिंदुओं को भी मिलेगा अल्पसंख्यक का दर्जा? केंद्र के SC में हलफमामे का मतलब और पूरे मामले के बारे में विस्तार से जानें

हिंदुओं को भी मिलेगा अल्पसंख्यक का दर्जा? केंद्र के SC में हलफमामे का मतलब और पूरे मामले के बारे में विस्तार से जानें

हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की मांग अब उठने लगी है। इसी से जुड़ी एक याचिका पर जवाब देते हुए देश की सर्वोच्च अदालत को केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया है कि राज्य सरकार की तरफ से भी अपने राज्यों में आबादी की पहचान कर उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है।

ये तो सभी जानते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। जहां हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी सभी रहते हैं। हिन्दुओं को आबादी की वजह से बहुसंख्यक की श्रेणी में रखा गया है जबकि 14.23 वाले मुस्लिम समुदाय को अल्पसंख्यक की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि भारत में हिन्दू भी अल्पसंख्यक हैं तो आपको थोड़ा अजीब लगेगा। लेकिन ये सत्य भी है। भारत के करीब दस ऐसे राज्य हैं जहां हिन्दुओं की आबादी बेहद कम है। ऐसे में इन राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की मांग अब उठने लगी है। इसी से जुड़ी एक याचिका पर जवाब देते हुए देश की सर्वोच्च अदालत को केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया है कि राज्य सरकार की तरफ से भी अपने राज्यों में आबादी की पहचान कर उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस देश में अल्पसंख्यक कौन हैं और इसका निर्धारण कैसे होता है। सुप्रीम कोर्ट में कैसे हिन्दुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने का मामला पहुंचा। केंद्र सरकार का इस पर क्या स्टैंड है?

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किसने दायर की याचिका

अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने देश के विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशानिर्देश तय करने के निर्देश देने की मांग की है। उनकी यह दलील है कि देश के कम से कम 10 राज्यों में हिन्दू भी अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यहूदी, बहाई और हिंदू धर्म के अनुयायी जो लद्दाख, मिजोरम, लद्वाद्वीप, कश्मीर, नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब और मणिपुर में वास्तविक अल्पसंख्यक हैं अपनी पसंद से शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और संचालन नहीं कर सकते, गलत है। 

केंद्र सरकार का जवाब

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करते हुए बताया कि चुनिंदा राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है। केंद्र सरकार ने यह दलील अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दाखिल याचिका के जवाब में दी है, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम-2004 की धारा-2 (एफ) की वैधता को चुनौती दी है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है कि हिंदू, यहूदी, बहाई धर्म के अनुयायी उक्त राज्यों में अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना कर सकते हैं और उन्हें चला सकते हैं एवं राज्य के भीतर अल्पसंख्यक के रूप में उनकी पहचान से संबंधित मामलों पर राज्य स्तर पर विचार किया जा सकता है। मंत्रालय ने कहा, ‘‘उदाहरण के लिए महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की सीमा में ‘यहूदियों’ को अल्पसंख्यक घोषित किया है जबकि कर्नाटक सरकार ने उर्दू, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लमणी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती भाषाओं को अपनी सीमा में अल्पसंख्यक अधिसूचित किया है।’ 

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कहां-कहां हिन्दू अल्पसंख्यक

साल 2011 के जनगणना के मुताबिक, लक्ष्यद्वीप में हिन्दू 2.5% हैं, जबकि अल्पसंख्यक घोषित मुस्लिम 96.58%. जम्मू कश्मीर में 28.44% हिन्दू हैं, तो मुस्लिम 68.31%. मिजोरम में 2.75% हिन्दू हैं, लेकिन अल्पसंख्यक का दर्जा पाए ईसाई 87.16% से ज्यादा हैं। नागालैंड में हिन्दू 8.75% हैं और ईसाई 87.93% वहीं अगर बात करें मेघालय की तो यहां हिन्दुओं की संख्या 11.53% और ईसाई 74.59% हैं। अरूणाचल प्रदेश और मणिपुर में भी अल्पसंख्यक ईसाईयों की आबादी हिन्दुओं से काफी ज्यादा है। आबादी के हिसाब से पंजाब में भी हिन्दू कम हैं. यहां हिन्दू 38.4% हैं, जबकि सिख 57.69% हैं। 

अल्पसंख्यक का दर्जा कैसे दिया जाता है 

केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर 1993 को नेशनल कमिशन फॉर माइनॉरिटी एक्ट 1992 के तहत नोटिफिकेशन जारी किया था और इसके तहत पांच कम्युनिटी- मुस्लिम, क्रिश्चियन, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है। बाद में 2014 में जैन समुदाय को भी इस लिस्ट में शामिल किया गया है। 

अल्पसंख्यक घोषित करने पर क्या सुविधाएं मिलती है? 

भारतीय संविधान में आर्टिकल 29 और 30 में धार्मित और भाषाई अल्पंसख्यकों का जिक्र है और इसके साथ ही उन्हें कुछ अधिकार भी दिए गए हैं। भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित व सुरक्षित रखने के लिए उन्हें शैक्षणिक संस्थान खोलने का अधिकार है। इसका जिक्र आर्टिकल 350 ए में भी है। इसमें अल्पसंख्यक छात्रों को आरक्षण, धार्मिक कार्यों के लिए भी अल्पसंख्यकों को सब्सिडी, अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री के 15 सूत्रीय प्रोग्राम के तहत रोजगार पर कम दर पर लोन, हर साल 20 हजार अल्पसंख्यकों को टेक्निकल एजुकेशन में स्कॉलरशिप। केंद्र के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की तर्ज पर राज्यों में भी अल्पसंख्यक आयोग की शुरुआत हुई, लेकिन अभी भी देश के 15 से ज्यादा राज्य ऐसे हैं, जहाँ राज्य अल्पसंख्यक आयोग काम नहीं कर रहा है। इसी वजह से जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर भ्रम की स्थिति कायम है और जिस समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए, उसके उलट लोगों को लाभ मिल रहा है।





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