उपनिवेशवाद, धर्म और राजनीतिक विषयों पर मुखर होकर बात रखते थे नायपॉल

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Aug 13 2018 10:44AM
उपनिवेशवाद, धर्म और राजनीतिक विषयों पर मुखर होकर बात रखते थे नायपॉल
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त्रिनिदाद में जन्मे भारतीय मूल के प्रख्यात लेखक तथा नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल का 85 साल की उम में निधन हो गया। उन्हें उपनिवेशवाद, धर्म और राजनीति जैसे प्रमुख विषयों पर मुखर रूप से अपनी बात रखने के लिए जाना जाता है।

त्रिनिदाद में जन्मे भारतीय मूल के प्रख्यात लेखक तथा नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल का 85 साल की उम में निधन हो गया। उन्हें उपनिवेशवाद, धर्म और राजनीति जैसे प्रमुख विषयों पर मुखर रूप से अपनी बात रखने के लिए जाना जाता है। नायपॉल की पत्नी लेडी नादिरा नायपॉल ने बयान जारी कर कहा, 'उन्होंने जो कुछ हासिल किया वह महान था। उन्होंने अंतिम सांस अपने उन प्रियजनों के बीच ली जिनसे वह प्यार करते थे और चारों ओर से उन्हें घेरे थे। उनका जीवन अद्भुत रचनात्मकता और प्रयासों से भरा था।"
 
जीवन का अधिकतर समय इंग्लैंड में व्यतीत करने वाले नायपॉल ने रविवार को लंदन स्थित अपने आवास में अंतिम सांस ली। विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल का जन्म त्रिनिदाद में 17 अगस्त 1932 को एक भारतीय हिंदू परिवार में हुआ था। वह गरीबी में पले बढ़े। इसके बाद 18 साल की उम्र में उन्हें यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑक्सफोर्ड से छात्रवृत्ति मिली। इसके बाद वह इंग्लैंड चले गए। वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में थे, जब उन्होंने पहला उपन्यास लिखा लेकिन यह प्रकाशित नहीं हो सका। बाद में वह अवसाद में चले गए और छात्र जीवन के संघर्ष के दौरान उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश तक की। नायपॉल ने 1954 में यूनिवर्सिटी छोड़ दी और लंदन के नेशनल पोर्ट्रेट गैलरी में सूचीकार की नौकरी कर ली। वह इंग्लैंड में ही बस गए और उन्होंने इसके बाद बड़े पैमाने पर यात्रायें कीं। उन्होंने अपने कॅरियर में 30 से अधिक किताबें लिखी जिसमें स्थापित धर्म और राजनेताओं की तीव्र आलोचना भी की गयी।
 
नायपॉल की पहली पुस्तक ‘द मिस्टिक मैसर’ थी जिसका प्रकाशन 1951 में हुआ था। यह उनके साहित्यिक कॅरियर का आगाज था। वर्ष 1961 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'ए हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास' उनकी सबसे मशहूर एवं लोकप्रिय किताब है। यह उनके पिता सीपरसाद नायपाल के जीवन पर आधारित है जो ‘‘त्रिनिदाद गार्जियन’’ में रिपोर्टर के तौर पर काम करते थे। बताते हैं कि नायपॉल को लिखने पढ़ने की प्रेरणा पिता से ही मिली थी। 1971 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘‘इन ए फ्री स्टेट’’ के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार से नवाजा गया।


 
इस्लामी कट्टरवाद पर उनकी पुस्तक ‘‘अमंग द विलीवर्स’’ और 1998 में प्रकाशित ‘‘बियोंड बिलीफ’’ में उनके शानदार काम को चहुं ओर सराहा गया। 'द मिमिक मेन’ (1967), ‘इन ए फ्री स्टेट’ (1971), ‘गुरिल्लाज’ (1975), ‘ए बेंड इन द रिवर, (1979), ‘ए वे इन वर्ल्ड’ (1994), ‘द इनिग्मा ऑफ अराइवल‘ (1987), ‘बियॉन्ड बिलिफ: इस्लामिक एक्सकर्जन अमंग द कन्वर्टेड पीपुल्स’ (1998), ‘हॉफ ए लाइफ’ (2001), ‘द राइटर एंड द वर्ल्ड’ (2002), ‘लिटरेरी ऑकेजन्स (2003), हाफ ए लाइफ का सीक्वल ‘द नॉवेल मैजिक सीड्स’ (2004) तथा ‘‘इन द मास्क आफ अफ्रीका’’ (2010) उनकी मशहूर रचनाओं में शामिल हैं।
 
अंग्रेजी भाषा के मास्टर के रूप में मशहूर नायपॉल ने अपनी कई प्रसिद्ध पुस्तकों में उपनिवेशवाद पर लिखा है। नायपॉल ने कई उल्लेखनीय सम्मान प्राप्त किये। जिसमें साहित्य की सेवा के लिए 1990 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से मिला नाइटहुड का सम्मान भी शामिल है। ब्रिटिश लेखक को 2001 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था। नायपॉल ने पेट्रीसिया एन हेल से वर्ष 1955 में विवाह किया। वर्ष 1996 में पेट्रीसिया के निधन के बाद उन्होंने तलाकशुदा पाकिस्तानी पत्रकार नादिरा अल्वी से दूसरी शादी की जो उनसे कई साल छोटी हैं।
 
मुखर लेखक अपने कई विवादित बयानों के लिए भी जाने जाते हैं। एक बार उन्होंने पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर तथा मशहूर लेखकों चार्ल्स डिकेन और ईएम फोर्सटर को ‘‘समुद्री डाकू’’ कह दिया था। बुकर पुरस्कार विजेता भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी ने उन्हें ट्विटर के माध्यम से श्रद्धांजलि दी है जिनका वर्षों तक नायपाल के साथ मतभेद रहा। रश्दी ने ट्वीट कर कहा, ‘‘हम अपने जीवन भर राजनीति और साहित्य के बारे में असहमत रहे। मुझे दुख हो रहा है जैसे मैंने अपने एक प्यारे बड़े भाई को खो दिया है। आपकी आत्मा को शांति मिले।’'


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