विनोद दुआ ने दिया हिन्दी टीवी पत्रकारिता को नया आयाम

विनोद दुआ ने दिया हिन्दी टीवी पत्रकारिता को नया आयाम

विनोद दुआ के माता-पिता भारत-पाक विभाजन से पहले तक दक्षिण वजीरिस्तान के एक छोटे से शहर डेरा इस्माइल खान में रहते थे लेकिन विभाजन के बाद वे परिवार सहित मथुरा आ गए थे। वहीं वर्ष 1954 में विनोद दुआ का जन्म हुआ।

हिन्दी पत्रकारिता का जाना-पहचाना चेहरा रहे विख्यात पत्रकार विनोद दुआ का 4 दिसम्बर को लंबी बीमारी के बाद 67 साल की उम्र में दिल्ली के अपोलो अस्पताल में निधन हो गया। वे काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। कोरोना की दूसरी लहर में इसी साल अप्रैल माह में उन्हें तथा उनकी 56 वर्षीया रेडियोलॉजिस्ट पत्नी डा. पद्मावती चिन्ना को कोरोना होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जून माह में कोरोना से पत्नी का निधन होने के बाद उनकी हालत में भी कोई खास सुधार नहीं आया और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया। विनोद दुआ के निधन पर भारत के पूरे पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ने के पीछे अहम कारण यही है कि आधुनिक पत्रकारिता के मौजूदा दौर में भी अपनी बेहद शालीन और शिष्ट पत्रकारिता के लिए जाने जाते रहे दुआ को अपने युग के पत्रकारों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता रहा। निर्भीक, निडर और असाधारण पत्रकारिता के लिए मशहूर विनोद दुआ हिन्दी टीवी पत्रकारिता में अग्रणी थे। उन्होंने टीवी पत्रकारिता में ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन के उस दौर में कदम रखा था, जब टीवी की दुनिया केवल दूरदर्शन तक ही सिमटी थी और धूमकेतु की भांति टीवी पत्रकारिता में उभरने के बाद वे जीवन पर्यन्त टीवी पत्रकारिता में जगमगाते रहे।

दूरदर्शन, एनडीटीवी, आज तक, जीटीवी इत्यादि कई समाचार चैनलों में लंबे समय तक सेवाएं दे चुके दुआ दिल्ली की शरणार्थी कालोनियों से शुरुआत करते हुए न केवल 42 वर्षों तक पत्रकारिता की उत्कृष्टता के शिखर तक बढ़ते गए बल्कि सदैव सच के साथ खड़े रहे। दूरदर्शन की ओर से 1984 के दौरान आयोजित जीवंत चुनावी चर्चा ने उनके कैरियर को बुलंदियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। चुनाव परिणामों के विश्लेषण के दौरान एनडीटीवी के प्रणय रॉय के साथ उनकी जोड़ी ने पूरे देश को मंत्रमुग्ध सा कर दिया था, जिसके बाद धीरे-धीरे विनोद दुआ की लोकप्रियता बढ़ती गई। वे ऐसे बेखौफ पत्रकार थे, जो अपने कार्यक्रम में सत्ताधीशों से बड़े तीखे सवाल पूछा करते थे। दूरदर्शन के ‘जनवाणी’ कार्यक्रम में वे जिस प्रकार मंत्रियों से कड़े सवाल पूछते हुए उन पर टिप्पणियां भी करते थे, उस जमाने में ऐसी कल्पना करना भी नामुमकिन सा लगता था। टीवी पत्रकारिता में सवाल पूछने की यात्रा की पहचान उन्हीं से बनती है और इसी विशिष्ट पहचान के साथ उनकी पत्रकारिता जीवन पर्यन्त जुड़ी रही। आज के दौर में जहां टीवी पत्रकारिता में बहुत से एंकर और पत्रकार सत्ता की चाटुकारिता करते दिखते हैं, वहीं विनोद दुआ ऐसे बेबाक और बेखौफ पत्रकार थे, जो सत्ता से टकराने में भी कभी नहीं घबराए। कुछ समय पूर्व सत्ता पक्ष के एक नेता द्वारा उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज किए जाने पर भी उन्होंने बगैर घबराए उस मामले में सुप्रीम कोर्ट से जीत हासिल की।

विनोद दुआ के माता-पिता भारत-पाक विभाजन से पहले तक दक्षिण वजीरिस्तान के एक छोटे से शहर डेरा इस्माइल खान में रहते थे लेकिन विभाजन के बाद वे परिवार सहित मथुरा आ गए थे। वहीं वर्ष 1954 में विनोद दुआ का जन्म हुआ। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक और परास्नातक किया। 1974 में वह पहली बार टेलीविजन पर नजर आए, जब उन्होंने ‘युवा मंच’ नामक कार्यक्रम होस्ट किया। उसके बाद 1975 में ‘युवजन’ कार्यक्रम से वे काफी लोकप्रिय हुए और उसी वर्ष वे ‘जवान तरंग’ कार्यक्रम से भी जुड़े, जिसके लिए वे वर्ष 1980 तक कार्य करते रहे। 1980 के दशक में उन्होंने थिएटर भी किए। श्रीराम सेंटर फॉर आर्ट एंड कल्चर के सूत्रधार कठपुतली ने उस समय बच्चों के लिए दो नाटक आयोजित किए थे, जिन्हें विनोद दुआ ने ही लिखा था। 1981 में उन्होंने ‘आपके लिए’ कार्यक्रम में एंकरिंग शुरू की और 1984 तक इसकी एंकरिंग करते रहे। वर्ष 1992 से 1996 तक वे दूरदर्शन पर प्रसारित करंट अफेयर्स की साप्ताहिक पत्रिका ‘परख’ के निर्माता थे, जिससे उन्हें अपार ख्याति मिली।

चुनाव विश्लेषणों के अलावा ‘जनवाणी’, ‘खबरदार इंडिया’, ‘विनोद दुआ लाइव’, ‘जन गण मन की बात’, ‘चक्रव्यूह’, ‘युवा मंच’, ‘प्रतिदिन’, ‘परख’, ‘जायका इंडिया का’ इत्यादि विनोद दुआ के कई ऐसे कार्यक्रम रहे, जो बहुत चर्चित हुए। एनडीटीवी के लिए उनका पाक कार्यक्रम ‘जायका इंडिया का’ तो बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसमें उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों तथा कस्बों की अलग-अलग खाद्य संस्कृतियों की खोज की थी। हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा पंजाबी और उर्दू भाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ थी लेकिन उन्होंने न केवल हिन्दी टीवी एंकर के रूप में अपनी पहचान स्थापित की बल्कि उन्हीं के चलते टीवी पर हिंदी पत्रकारिता पहली बार जगमगाई थी। सटीक, संक्षिप्त, शालीन और नपे-तुले शब्दों का इस्तेमाल कर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने वाले दुआ साहब की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी त्वरित अनुवाद की क्षमता, जो उनकी एंकरिंग में सोने पे सुहागा सिद्ध हुई और वे सदैव एक श्रेष्ठ प्रस्तोता बने रहे। उन्हें लाइव प्रसारण का उस्ताद माना जाता था।

हिन्दी पत्रकारिता को एक अलग पहचान दिलाने वाले विनोद दुआ को श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए अनेक पुरस्कारों के नवाजा गया। वर्ष 1996 में उन्हें विशिष्ट पत्रकारिता के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित किया गया और वह पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पहले पत्रकार थे। उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए वर्ष 2008 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2016 में आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर द्वारा उन्हें डी.लिट की उपाधि दी गई और मुम्बई प्रेस क्लब द्वारा वर्ष 2017 में उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए ‘रेड इंक अवार्ड’ देकर सम्मानित किया। लंबी बीमारी के चलते विनोद दुआ का इस तरह चले जाना वास्तव में हिन्दी टीवी पत्रकारिता के एक पूरे युग का अंत है। बहरहाल, टीवी पत्रकारिता की पहली पीढ़ी के एंकर विनोद दुआ को हिन्दी पत्रकारिता के जरिये हिन्दी को लोकप्रियता और पर्याप्त मान-सम्मान दिलाने वाले बेबाक पत्रकार के रूप में सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)