जब हिटलर ने माना था सुभाष चंद्र बोस का लोहा, जानें नेताजी के जीवन के दिलचस्प किस्से

जब हिटलर ने माना था सुभाष चंद्र बोस का लोहा, जानें नेताजी के जीवन के दिलचस्प किस्से

नेताजी पढ़ाई लिखाई में बहुत तेज थे। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी। लेकिन उन्होंने भी आजादी के दीवानों की तरह ही सरकारी नौकरी का मोह नहीं किया। देश प्रेम की वजह से उन्होंने अंग्रेजी नौकरी ठुकरा दी। सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया।

जब-जब भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों की गाथा लिखी जाएगी उसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। नेताजी ने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' के नारे से भारत में राष्ट्रभक्ति की ज्वार को पैदा किया जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बेहद कारगर साबित हुआ। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी का योगदान अभूतपूर्व रहा है। भारत को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए सुभाष चंद्र बोस ने कई आंदोलन किए जिसकी वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। अंग्रेजो के खिलाफ भारत की लड़ाई को और तेज करने के लिए नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन किया था। इतिहास के विशेषज्ञ यह बताते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथनी और करनी में गजब की समानता थी। वह जो कहते थे, उसे हर हाल में करके दिखाते थे। यही कारण था कि विश्व के बड़े दिग्गज भी उनसे घबराते थे। चलिए आपको नेता जी के जीवन के कुछ किस्सों के बारे में बताते हैं।

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- भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सुभाष चंद्र बोस की लोकप्रियता बहुत अधिक थी। भारत के लोग उन्हें प्यार से 'नेता जी' कहते थे। उनके व्यक्तित्व एवं वाणी में एक जोश एवं आकर्षण था और यही कारण था कि उनकी अपील पर हर भारतवासी गौर करता था। उनके हृदय में राष्ट्र के लिए मर मिटने की चाहत थी। जानकार बताते हैं कि नेताजी के हर कदम से अंग्रेजी सरकार घबराती थी।

- कहा जाता है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही नेता जी हिटलर से मिलने गए थे। इस दौरान उन्हें एक कमरे में बैठा दिया गया था। उस समय वित्तीय विश्वयुद्ध चल रहा था और हिटलर के जान को खतरा था। थोड़ी ही देर बाद हिटलर की शक्ल का एक शख्स नेताजी से मिलने आया और उनकी तरफ अपने हाथ को बढ़ाया। नेताजी ने हाथ तो मिला लिया लेकिन मुस्कुराते हुए यह भी कहा आप हिटलर नहीं हो सकते हैं। यह सुनते ही वह शख्स चौंक गया। 

- हालांकि यह सिलसिला रुका नहीं। ठीक कुछ देर बाद एक और शख्स उनसे मिलने आता है। वह भी नेताजी से हाथ मिलाता है। लेकिन इस समय भी नेता जी कहते हैं कि वह हिटलर से मिलने आए हैं ना कि उनके बॉडी डबल से। कहा जाता है कि इसके बाद खुद हिटलर आया और उसे नेताजी ने पहचान लिया। हिटलर को परिचय देते हुए नेताजी ने बताया कि मैं सुभाष हूं भारत से आया हूं। आप हाथ मिलाने से पहले कृपया दस्ताने उतार दें क्योंकि मैं मित्रता के बीच में कोई दीवार नहीं चाहता। नेताजी के इस आत्मविश्वास को देखकर हिटलर भी उनका कायल हो गया था।

- नेताजी पढ़ाई लिखाई में बहुत तेज थे। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी। लेकिन उन्होंने भी आजादी के दीवानों की तरह ही सरकारी नौकरी का मोह नहीं किया। देश प्रेम की वजह से उन्होंने अंग्रेजी नौकरी ठुकरा दी। सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया। 

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- नेताजी सुभाष चंद्र बोस बंगाल के देशभक्त चितरंजन दास की प्रेरणा से राजनीति में आए थे। उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भी भाग लिया और जेल गए। कांग्रेस में वह लगातार आगे बढ़ते गए और 1939 में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष भी चुन लिया गया। हालांकि नेताजी के विचार कांग्रेस और गांधीजी के अहिंसावादी विचार से मेल नहीं खाती थी और इसी कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ दिया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। उन्होंने पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रखा और नारा दिया जय हिंद।

- 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में आजाद भारत के अस्थायी सरकार की घोषणा की थी। इस दौरान उन्होंने नए सिरे से आजाद हिंद फौज का गठन भी किया और उसमें जान फूंक दी। बोस की इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, इटली और आयरलैंड जैसे देशों ने तुरंत मान्यता भी दे दी थी। उसी दौरान जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को इस अस्थाई सरकार को दे दिए थे। 30 दिसंबर 1943 को इन द्वीपों पर आजाद भारत का झंडा फहराया गया था। 

एक परिचय

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकीदास बोस एक वकील थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रारंभिक शिक्षा कटक में ही हुई। बाद में वह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता चले गए। नेताजी को जलियांवाला बाग कांड ने इस कदर विचलित किया कि वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से पढ़ाई की है। नेताजी ने असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। स्वराज अखबार के जरिए बंगाल में कांग्रेस के प्रचार प्रसार की भी जिम्मेदारी संभाली। 1923 में कांग्रेस युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए थे। सुभाष चंद्र बोस ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था। सुभाष चंद्र बोस को 11 बार जेल हुई है। उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया था और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी थी।

- अंकित सिंह