2022 विधानसभा चुनाव के लिए 'अगेन योगी, सीएम योगी' का नारा देगी यूपी बीजेपी

  •  अजय कुमार
  •  नवंबर 21, 2020   12:25
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2022 विधानसभा चुनाव के लिए 'अगेन योगी, सीएम योगी' का नारा देगी यूपी बीजेपी
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हाल ही में एक मीडिया संस्थान द्वारा कराए गए सर्वे में योगी आदित्यनाथ को देश का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री चुना गया था। जनता ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सबसे अच्छा माना और वह सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री साबित हुए थे।

उत्तर प्रदेश में करीब 15 महीने बाद 2022 में होने विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी राजनैतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। इस बार भारतीय जनता पार्टी की रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव यही देखने को मिल रहा है कि 2017 के विधानसभा चुनाव को जहां भाजपा ने बिना मुख्यमंत्री का चेहरा सामने किए हुए लड़ा था, वहीं अबकी से भाजपा ‘अगेन योगी-सीएम योगी’ के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी, जिस तरह से पिछले चार वर्षों में योगी का पार्टी के भीतर कद बढ़ा है, उसको देखते हुए ऐसा स्वाभाविक भी लगता है। योगी ने यूपी में हुए कई उप-चुनावों में तो बीजेपी को जीत दिलाई ही इसके साथ-साथ योगी तमाम राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भाजपा को योगी का चेहरा आगे करने से कई सियासी मोर्चो पर एक दम से बढ़त मिल जाएगी। योगी की छवि साफ है तो सरकार भी वह पूरी धमक के साथ चला रहे हैं। योगी सरकार द्वारा लिए गए कई फैसले तो पूरे देश में मिसाल बन गए हैं। अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति से लेकर, दंगाइयों के पोस्टर सड़क पर चिपकाने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से वसूली, साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ सख्ती, मिशन नारी शक्ति सम्मान, लव जेहाद के खिलाफ कानून बनाने की बात इसमें प्रमुख हैं। कोरोना महामारी के समय योगी सरकार ने जिस तरह से फैसले लिए उसके चलते उनकी तारीफ यूएनओ तक ने की थी।

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हाल ही में एक मीडिया संस्थान द्वारा कराए गए सर्वे में योगी आदित्यनाथ को देश का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री चुना गया था। जनता ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सबसे अच्छा माना और वह सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री साबित हुए थे। निश्चित तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे दिग्गजों के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का देश का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री बनना निश्चित ही उनकी कार्यशैली को प्रदर्शित करता है। योगी 18-18 घंटा काम करने प्रदेश को आगे ले जाने में लगे हैं। बतौर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश में करीब साढ़े तीन वर्ष के अपने कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ ने देश में अपनी कार्यशैली के कारण अलग जगह बना ली है।

गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मन्दिर के महंत योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री हैं। इन्होंने 19 मार्च 2017 को विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत के बाद 21वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इससे पहले 1998 से 2017 तक भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और 2014 लोकसभा चुनाव में भी यहीं से सांसद चुने गए थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महन्त अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं। वह हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं, तथा इनकी छवि एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता की है।

1998 में योगी आदित्यनाथ केवल 26 वर्ष की उम्र में गोरखपुर से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर पहला चुनाव लड़े और जीते थे। योगी देश के सबसे युवा सांसद थे। 1999 में गोरखपुर से वह पुनः सांसद चुने गए। अप्रैल 2002 में इन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी का गठन किया। 2004 में तीसरी बार लोकसभा का चुनाव जीता। 2009 में दो लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर लोकसभा पहुंचे। 2014 में पांचवीं बार एक बार फिर से दो लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर सांसद चुने गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला, इसके बाद उत्तर प्रदेश में 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इसमें योगी आदित्यनाथ से काफी प्रचार कराया गया, लेकिन परिणाम निराशाजनक रहा। 2017 में विधानसभा चुनाव में भाजपा अध्यक्ष ने सांसद योगी आदित्यनाथ से पूरे राज्य में प्रचार कराया। इन्हें एक हेलीकॉप्टर भी दिया गया। चुनाव में पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक दल की बैठक में योगी आदित्यनाथ को विधायक दल का नेता चुनकर मुख्यमंत्री पद सौंपा गया।

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योगी आदित्यनाथ हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं, जो हिन्दू युवाओं का सामाजिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी समूह है। योगी की छवि एक कट्टर हिन्दू नेता की है। राजनीति के मैदान में आते ही योगी आदित्यनाथ ने सियासत की दूसरी डगर भी पकड़ ली। उन्होंने कई बार विवादित बयान भी दिए, लेकिन दूसरी तरफ उनकी राजनीतिक हैसियत बढ़ती चली गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सियासत की बात की जाए तो वह जाति विशेष के विकास को मद्दनेजर न रखते हुए हिंदुत्व को आगे बढ़ाने पर फोकस करते हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि योगी आदित्यनाथ के बारे में एक सांप्रदायिक नेता होने की हवा बना दी गई है जबकि ऐसा नहीं है। हर धर्म का आदर करते हैं, हां यदि अन्याय हो रहा है तो निश्चित ही उसकी मुखालफत करना गलत नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 2014 में यूपी के उपचुनाव के लिए योगी आदित्यनाथ के हाथ में कमान दी थी। जिसके बाद वह फिर से चर्चा में आए थे।

2022 में योगी मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे तो इसी के साथ-साथ बीजेपी आलाकमान द्वारा संगठन को भी मजबूती प्रदान की जा रही है। उधर, योगी सरकार अपने कुछ फैसलों से भी सियासत का रूख भाजपा की ओर मोड़ने की कोशिश कर रही है। बहरहाल, योगी का चेहरा आगे करने से यह तय है कि 2017 की तरह बीजेपी पूरी तरह से मोदी पर आश्रित नहीं रहेगी। बल्कि मोदी-योगी मिलकर विपक्ष पर डबल प्रहार करेंगे। इसका बीजेपी को काफी सियासी फायदा मिलेगा।

गौरतलब है कि राज्य में पिछले आम चुनाव 11 फरवरी से 18 मार्च, 2017 तक सात चरणों में हुए थे। उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। बीजेपी ने 2017 के चुनावों में भारी बहुमत के साथ 312 सीट जीतकर सत्ता हासिल की थी। कांग्रेस को केवल 7 सीटों से संतोष करना पड़ा था। वहीं समाजवादी पार्टी को 47 और बसपा को कुल 19 सीटें मिली थीं। हालांकि 2019 में हुए उप-चुनाव के बाद इस संख्या में परिवर्तन भी आया।

-अजय कुमार







क्या है वह रोशनी एक्ट जिसके तहत करोड़ों के जमीन घोटाले को अंजाम दिया गया

  •  ललित गर्ग
  •  नवंबर 28, 2020   13:29
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क्या है वह रोशनी एक्ट जिसके तहत करोड़ों के जमीन घोटाले को अंजाम दिया गया
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अब केन्द्र शासित जम्मू-कश्मीर में यह उम्मीद जगी है कि न्यायपालिका के दबाव में सरकारी जमीन पर हुए इन अवैध कब्जों को हटाया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सीबीआई जांच में और परतें खुलेंगी और लाभार्थियों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा।

जम्मू-कश्मीर के आजादी के बाद के राजनीतिक जीवन एवं शासन-व्यवस्था में कितने ही भ्रष्टाचार, घोटाले, गैरकानूनी कृत्य एवं आर्थिक अपराध परिव्याप्त रहे हैं। अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद एवं वहां स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया को अग्रसर करते हुए अब इनकी परतें उघड़ रही हैं। एक बड़ा घोटाला जम्मू-कश्मीर में रोशनी एक्ट की आड़ में 25 हजार करोड़ का सामने आया है। असल में नाम से यह एक विद्युत से जुड़ा घोटाला प्रतीत होता है, लेकिन यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति एवं शासन-व्यवस्था की अंधेरगर्दी से जुड़ा सबसे बड़ा जमीन घोटाला है। आजादी के बाद से राजनैतिक एवं सामाजिक स्वार्थों ने कश्मीर के इतिहास एवं संस्कृति को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया है, भ्रष्ट, विघटनकारी एवं आतंकवादी संस्कृति को एक षड्यंत्र के तहत पनपाया गया। लेकिन अपनी मूल संस्कृति को रौंद कर किसी भी अपसंस्कृति को बड़ा नहीं किया जा सकता। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कश्मीर के जीवन के हर पक्ष पर हावी हो रही अराजकता, स्वार्थ की राजनीति, आतंक की कालिमा को हटाया जा रहा है ताकि इस प्रांत के चरित्र के लिए खतरा बने नासूरों को खत्म किया जा सके, आदर्श शासन व्यवस्था स्थापित हो सके।

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जम्मू-कश्मीर के इस सबसे बड़े घोटालों में सीबीआई जांच के दौरान कई बड़े नेताओं, अफसरों और व्यापारियों के नाम सामने आए हैं। जिनमें पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू, पूर्व गृह मंत्री सज्जाद किचलू, पूर्व मंत्री अब्दुल मजीद वानी और असलम गोनी, नेशनल कांग्रेस के नेता सईद आखून और पूर्व बैंक चेयरमैन एमवाई खान के नाम प्रमुख हैं। जम्मू-कश्मीर की लगभग 21 लाख कनाल भूमि पर लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था। तत्कालीन सरकारों ने अवैध कब्जे हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए कानून बना दिया जिसे रोशनी एक्ट या रोशनी स्कीम का नाम दिया गया। मगर एक्ट का फायदा उठा कर राजनेताओं, नौकरशाहों और व्यावसायियों ने सरकारी और वन भूमि की बंदरबांट की। अब केन्द्र शासित जम्मू-कश्मीर में यह उम्मीद जगी है कि न्यायपालिका के दबाव में सरकारी जमीन पर हुए इन अवैध कब्जों को हटाया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सीबीआई जांच में और परतें खुलेंगी और लाभार्थियों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा।

जम्मू-कश्मीर की राजनीति का चरित्र कई प्रकार के अराष्ट्रीय दबावों से प्रभावित रहा है, जिसमें आर्थिक अपराधों की जमीन को मजबूती देने के साथ आतंकवाद को पोषण दिया जाता रहा है। विडम्बना तो यह है कि इस प्रांत एवं प्रांत की जनता को राजनेता अपने आर्थिक लाभों-स्वार्थों के लिये लगातार हिंसा, अराजकता एवं आतंकवाद की आग में झोंकते रहे हैं, जिसमें प्रांत की सरकार को केन्द्र की सरकार से संरक्षण एवं आर्थिक सहायता भी मिलती रही है। अब अगर जम्मू-काश्मीर में चरित्र निर्माण, विकास, शांति और अमन का कहीं कोई प्रयत्न हो रहा है, आवाज उठ रही है तो इन भ्रष्ट राजनेताओं को लगता है यह कोई विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुसाया जा रहा है। जिस मर्यादा, सद्चरित्र और सत्य आचरण पर हमारा राष्ट्रीय चरित्र एवं संस्कृति जीती रही है, सामाजिक व्यवस्था बनी रही है, जीवन व्यवहार चलता रहा है वे इस प्रांत में जानबूझकर लुप्त किये गये। उस वस्त्र को जो इस प्रांत के अस्तित्व एवं अस्मिता एवं शांतिपूर्ण जीवन को ढंके हुए था, कुछ तथाकथित राजनेताओं एवं घृणित राजनीति ने उसको उतार कर खूंटी पर टांग दिया। मानो वह पुरखों की चीज थी, जो अब इस प्रांत के भ्रष्ट एवं अराष्ट्रीय नेताओं के लाभ एवं स्वार्थ की सबसे बड़ी बाधा बन गयी। इस बड़े घोटाले की परतें खुलने से जम्मू-कश्मीर का भाग्यविधाता मानने वाले भ्रष्ट राजनेताओं की नींद उड़ गयी है। नींद तो उनकी अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद से ही उड़ी हुई है। तभी तो नेशनल कांफ्रैंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और अन्य नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं और उन्होंने कश्मीरियों के अधिकारों के लिए लड़ने और अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए गुपकर संगठन भी बना लिया है। इन राजनेताओं की बौखलाहट इतनी अधिक उग्र है कि फारूक अब्दुल्ला अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए चीन की मदद लेने की बात करते हैं तो महबूबा तिरंगे का अपमान करती हैं। इस तरह की अराष्ट्रीय घटनाओं एवं विसंगतिपूर्ण बयानों से न केवल प्रांत बल्कि समूचे राष्ट्र का चिंतित होना स्वाभाविक है।

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जम्मू-कश्मीर के फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, गुलाम नबी जैसे नेताओं ने प्रांत के धन को जितना अधिक अपने लिए निचोड़ा जा सके, निचोड़ लिया। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार इन्हें पीड़ा नहीं देता था। सबने अपने-अपने निजी सिद्धांत बना रखे थे, भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी थी। इस तरह की ओछी एवं स्वार्थ की राजनीति करने वाले प्रांत एवं समाज के उत्थान के लिए काम नहीं करते बल्कि उनके सामने बहुत संकीर्ण मंजिल थी सत्ता पाने एवं धन कमाने की। ऐसी रणनीति अपनाना ही उनके लिये सर्वोपरि था, जो उन्हें बार-बार सत्ता दिलवा सके। नोट एवं वोट की राजनीति और सही रूप में सामाजिक उत्थान की नीति, दोनों विपरीत ध्रुव हैं। एक राष्ट्र को संगठित करती है, दूसरी विघटित। लेकिन इन नेताओं ने दूसरी नीति पर चलते हुए न केवल कश्मीर को लूटा, घोटाले किये, प्रांत को कंकाल किया, बल्कि हिंसा-आतंकवाद के दंश दिये।

अनुच्छेद 370 के चलते आज तक केन्द्र की सरकारों ने जम्मू-कश्मीर में इतना धन बहाया है कि उसका कोई हिसाब-किताब नहीं। प्रांत के तथाकथित नेताओं एवं अलगाववादियों ने सरकारी धन एवं पाकिस्तान और खाड़ी देशों से मिले धन से देश-विदेश में अकूत सम्पत्तियां बना लीं, जबकि कश्मीरी बच्चों के हाथों में पत्थर और हथियार पकड़वा दिए, उनकी मुस्कान छीन ली, विकास के रास्ते अवरूद्ध कर दिये। गरीबों के घर रोशन करने के नाम पर बनाए गए कानून की आड़ लेकर करोड़ों की सरकारी जमीन हड़प ली। शांति की वादी एवं उपजाऊ भूमि को बंजर एवं अशांत कर दिया। जबसे जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, इनकी दुकानें बंद होने से ये अराजकता एवं अलोकतांत्रिक घटनाओं पर उतर आये हैं, अभी तो एक रोशनी घोटाला उजागर होने पर इनकी यह बौखलाहट है, आगे अभी बहुत से कारनामे खुलेंगे।

जम्मू-कश्मीर देश का शायद एक मात्र ऐसा राज्य होगा जहां सरकारी जमीन पर धड़ल्ले से राजनीतिक संरक्षण में बड़े पैमाने पर कब्जे हुए हैं। सरकारों ने अवैध कब्जे हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001 बनाया। इसके तहत सरकारी जमीनों पर गैर कानूनी कब्जों को कानूनी तौर पर मालिकाना हक देने का षड्यंत्र हुआ। यह स्कीम 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने लाते समय कहा कि जमीनों के कब्जों को कानूनी किए जाने से जो फंड जुटेगा, उससे राज्य में पावर प्रोजैक्टों का काम किया जाएगा, इसलिए इस कानून का नाम रोशनी रखा गया जो मार्च 2002 से लागू हुआ। एक एकड़ में 8 कनाल होते हैं और इस लिहाज से ढाई लाख एकड़ से ज्यादा अवैध कब्जे वाली जमीन हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई। भ्रष्टता की चरम पराकाष्ठा एवं अंधेरगर्दी यह थी कि इस सरकारी भूमि को बाजार मूल्य के सिर्फ 20 प्रतिशत मूल्य पर सरकार ने कब्जेदारों को सौंपी।

अब्दुल्ला सरकार ने ही इस बड़े भूमि घोटाले की मलाई नहीं खाई बल्कि 2005 में सत्ता में आई मुफ्ती सरकार और उसके बाद गुलाम नबी आजाद सरकार ने खूब जमकर अपनी जेबें भरीं। इन लोगों ने रोशनी एक्ट का फायदा उठाते हुए अपने खुद के नाम या रिश्तेदारों के नाम जमीन कब्जा ली। इस घोटाले की गहराई का अंदाजा इस बात से लगता है कि श्रीनगर शहर के बीचोंबीच खिदमत ट्रस्ट के नाम से कांग्रेस के पास कीमती जमीन का मालिकाना हक पहुंचा तो नेशनल कांफ्रैंस का भव्य मुख्यालय तक ऐसी ही जमीन पर बना हुआ है, जो इस भूमि घोटाले से तकरीबन मुफ्त के दाम हथियाई गई। जब सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए तो उनकी अगुवाई वाली राज्य प्रशासनिक परिषद ने रोशनी एक्ट को रद्द कर दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस एक्ट की आड़ में जम्मू-कश्मीर से पलायन कर गए कश्मीरी पंडितों के खाली पड़े मकानों और दुकानों को भी हड़पा गया। इस घोटाले में जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों के लोग शामिल रहे है, अब इनसे मुक्ति ही कश्मीर की वास्तविक फिजाएं लौटा पायेंगी।

-ललित गर्ग

पत्रकार, स्तंभकार, लेखक







लव जिहाद के खिलाफ यूपी सरकार का कानून तो अच्छा है पर कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  नवंबर 27, 2020   11:06
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लव जिहाद के खिलाफ यूपी सरकार का कानून तो अच्छा है पर कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं
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लव जिहाद में न लव होता है और न ही जिहाद होता है। उसमें धोखाधड़ी होती है, तिकड़म होती है, दुष्कर्म होता है, बल-प्रयोग होता है और गंदी राजनीति होती है। इसे रोकना तो हर सरकार का कर्तव्य है। इस उद्देश्य से बने हर कानून का स्वागत किया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ अध्यादेश जारी कर दिया है। उस अध्यादेश में लव जिहाद शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, यह अच्छी बात है, क्योंकि लव और जिहाद, ये दोनों शब्द परस्पर विरोधी हैं। जहां लव होगा, वहां जिहाद हो ही नहीं सकता। लव के आगे सारे जिहाद ठंडे पड़ जाते हैं। लव जिहाद का हिंदी रूप होगा- 'प्रेमयुद्ध'। जहां प्रेम होगा, वहां युद्ध नहीं हो सकता और जहां युद्ध होगा, वहां प्रेम कैसे होगा ?

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लव जिहाद में न लव होता है और न ही जिहाद होता है। उसमें धोखाधड़ी होती है, तिकड़म होती है, दुष्कर्म होता है, बल-प्रयोग होता है और गंदी राजनीति होती है। इसे रोकना तो हर सरकार का कर्तव्य है। इस उद्देश्य से बने हर कानून का स्वागत किया जाना चाहिए। उ.प्र. के मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा है कि धर्म-परिवर्तन याने हिंदू लड़कियों को जबर्दस्ती मुसलमान बनाने के लगभग 100 ऐसे मामले सामने आए हैं। यदि ऐसे मामलों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए यह कानून लाया जा रहा है तो इसका अवश्य स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन छल-छिद्र से धर्म-परिवर्तन करने के खिलाफ तो पहले से ही कठोर कानून बने हुए हैं और कई राज्यों ने इन्हें पूरी दृढ़ता के साथ लागू भी किया है।

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उ.प्र. सरकार के इस अध्यादेश में एक नई और अच्छी बात यह है कि सामूहिक धर्म-परिवर्तन करने वाली संस्थाओं पर प्रतिबंध लगेगा और उसकी सजा भी कठोर है लेकिन सरकार यह कैसे सिद्ध करेगी कि फलां धर्म-परिवर्तन शादी के लिए ही किया गया है ? अगर धर्म-परिवर्तन के लिए शादी का बहाना बनाया गया है तो ऐसी शादी कितने दिन चलेगी ? और शादी के खातिर यदि कोई हिंदू या मुसलमान बनना चाहेगा तो कानून उसे कैसे रोकेगा ? जो हिंदू लड़की किसी मुसलमान से शादी करेगी, वह दो माह पहले इसकी सूचना पुलिस को देगी लेकिन किसी हिंदू लड़के से शादी करने वाली मुसलमान लड़की को भी यह सूचना देनी होगी। सूचना देने भर से शादी कैसे रुकेगी ? ‘हिंदू मैरिज एक्ट’ और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ के मुताबिक ऐसी शादी अवैध होती है लेकिन ‘स्पेश्यल मेरिज एक्ट’ यह अनुमति देता है कि शादी करने वाले वर और वधू अपने-अपने धर्म को बदले बिना भी शादी कर सकते हैं। इसीलिए जो भी वर या वधू अपना धर्म बदलेंगे, उन्हें बदलने से कैसे रोका जा सकता है और जो नहीं बदलना चाहेंगे, उन्हें भी शादी करने से कैसे रोका जाएगा ? क्या यह कानून ‘घर वापसी’ याने शुद्धि करने वालों पर भी लागू होगा ? यदि होगा तो तबलीगी जमात और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी इसे लागू करना पड़ेगा। जिस प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होगी, वह अपने वोटों के गणित के आधार पर इस कानून को लागू करेगी।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक







दुनिया का सबसे बड़ा लिखित और सशक्त संविधान भारत के पास

  •  श्वेता गोयल
  •  नवंबर 26, 2020   11:47
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दुनिया का सबसे बड़ा लिखित और सशक्त संविधान भारत के पास
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सर्वप्रथम सन् 1895 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने मांग की थी कि अंग्रेजों के अधीनस्थ भारत का संविधान स्वयं भारतीयों द्वारा बनाया जाना चाहिए लेकिन भारत के लिए स्वतंत्र संविधान सभा के गठन की मांग को ब्रिटिश सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया था।

प्रतिवर्ष 26 नवम्बर को देश में संविधान दिवस मनाया जाता है। हालांकि वैसे तो भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था लेकिन इसे स्वीकृत 26 नवम्बर 1949 को ही कर लिया गया था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अथक प्रयासों के कारण ही भारत का संविधान ऐसे रूप में सामने आया, जिसे दुनिया के कई अन्य देशों ने भी अपनाया। वर्ष 2015 में डॉ. अम्बेडकर के 125वें जयंती वर्ष में पहली बार देश में 26 नवम्बर को संविधान दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया गया था और इस साल हम 71वां संविधान दिवस मना रहे हैं। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जो 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था।

संविधान प्रारूप समिति की बैठकें 114 दिनों तक चली थी और संविधान के निर्माण में करीब तीन वर्ष का समय लगा था। संविधान के निर्माण कार्य पर करीब 64 लाख रुपये खर्च हुए थे और इसके निर्माण कार्य में कुल 7635 सूचनाओं पर चर्चा की गई थी। मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे लेकिन 44वें संविधान संशोधन के जरिये सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर संविधान के अनुच्छेद 300 (ए) के अंतर्गत कानूनी अधिकार के रूप में रखा गया, जिसके बाद भारतीय नागरिकों को छह मूल अधिकार प्राप्त हैं, जिनमें समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24), धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28), संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30) तथा संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 32) शामिल हैं। संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 के अंतर्गत मूल अधिकारों का वर्णन है और संविधान में यह व्यवस्था भी की गई है कि इनमें संशोधन भी हो सकता है तथा राष्ट्रीय आपात के दौरान जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है।

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भारतीय संविधान से जुड़े रोचक तथ्यों पर नजर डालें तो हमारे संविधान की सबसे बड़ी रोचक बात यही है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। सर्वप्रथम सन् 1895 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने मांग की थी कि अंग्रेजों के अधीनस्थ भारत का संविधान स्वयं भारतीयों द्वारा बनाया जाना चाहिए लेकिन भारत के लिए स्वतंत्र संविधान सभा के गठन की मांग को ब्रिटिश सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया था। 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मांग की कि भारत का राजनैतिक भाग्य भारतीय स्वयं बनाएंगे लेकिन अंग्रेजों द्वारा संविधान सभा के गठन की लगातार उठती मांग को ठुकराया जाता रहा। आखिरकार 1939 में कांग्रेस अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा ही एकमात्र उपाय है और सन् 1940 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत का संविधान भारत के लोगों द्वारा ही बनाए जाने की मांग को स्वीकार कर लिया गया। 1942 में क्रिप्स कमीशन द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जाएगा, जो भारत का संविधान तैयार करेगी।

सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा पहली बार समवेत हुई किन्तु अलग पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर मुस्लिम लीग द्वारा बैठक का बहिष्कार किया गया। दो दिन बाद संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया और वे संविधान बनाने का कार्य पूरा होने तक इस पद पर आसीन रहे। 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ और संविधान सभा द्वारा 29 अगस्त 1947 को संविधान का मसौदा तैयार करने वाली ‘संविधान निर्मात्री समिति’ का गठन किया गया, सर्वसम्मति से जिसके अध्यक्ष बने भारतीय संविधान के जनक डॉ. भीमराव अम्बेडकर। संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने के लिए संविधान में पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की गई है, जिससे भारतीय संविधान का सार, उसकी अपेक्षाएं, उसका उद्देश्य, उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना के अनुसार, ‘‘हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’ संविधान की यह प्रस्तावना ही पूरे संविधान के मुख्य उद्देश्य को प्रदर्शित करती है।

-श्वेता गोयल

(लेखिका शिक्षिका हैं)