बाल विवाह कम तो हुए हैं पर इस पर अब तक पूरी तरह रोक नहीं लग पायी है

बाल विवाह कम तो हुए हैं पर इस पर अब तक पूरी तरह रोक नहीं लग पायी है

यूनिसेफ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत के कई क्षेत्रों में अब भी बाल विवाह हो रहा है। इसमें कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत में बाल विवाह की दर में कमी आई है। लेकिन कई प्रदेशों में यह प्रथा अब भी जारी है।

विकास के दौर में बाल विवाह एक नासूर के समान है। देश में हर व्यक्ति को शिक्षित करने की मुहिम चल रही है। हर व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में बाल विवाह होना समाज के माथे पर एक कलंक के समान है। देश में अक्षय तृतीया (आखा तीज) पर हर वर्ष हजारों की संख्या में बाल विवाह किए जाते हैं। कोरोना संकट को लेकर देश में चल रहे लॉकडाउन के कारण हर जगह पुलिस प्रशासन की व्यवस्था चाक-चौबंद होने के चलते इस बार अक्षय तृतीया पर बाल विवाह होने की संभावना बहुत ही कम लगती है।

इसे भी पढ़ें: लापरवाही बनी रही तो तीसरी लहर में भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है

राजस्थान सरकार ने तो कोरोना संकट को देखते हुये आगामी 31 मई तक बिना इजाजत विवाह करने पर ही कानूनन रोक लगा दी है। इससे बाल विवाह होने की सम्भावना काफी कम हो गयी है। कोरोना के चलते देश भर में अपनाए जा रहे सोशल डिस्टेंसिंग का प्रचार पूरे देश में हो रहा है। देश की अधिकांश जनता इसका पालन भी कर रही है। ऐसे में यदि कहीं बाल विवाह होता है तो उसकी सूचना सरकार के पास पहुंचने की संभावना ज्यादा है।

फिर भी तमाम प्रयासों के बावजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अन्त नहीं हो पा रहा है। भारत में बेटी-बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान के शुरू होने के बावजूद एक नाबालिग बेटी की जबर्दस्ती शादी करा दी जा रही है। बाल विवाह मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। यह जीवन का एक कड़वा सच है कि आज भी छोटे-छोटे बच्चे इस प्रथा की भेंट चढ़े जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर जगह बेटी बचावो बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं। देश के सभी प्रदेशों में बेटियां शिक्षित हो रही हैं। ऐसे में समाज को आगे आकर कम उम्र में लड़कियों के होने वाले बाल विवाह रुकवाने के प्रयास करने होंगे। आजकल कई लड़कियां खुद भी आगे आकर अपना बाल विवाह रुकवाने का प्रयास करने लगी हैं। गत वर्ष बिहार के बेगूसराय में एक 14 साल की लड़की की शादी हो रही थी। जिस पंडित को शादी के लिए बुलाया था। लड़की की उम्र पता चलने पर उस पंडित ने ही स्थानीय थाने को सूचना देकर बाल विवाह रुकवा दिया। बिहार के बेतिया में लॉकडाउन में रोजगार का कोई जरिया नहीं रहने से एक मजदूर पिता अपनी 13 साल की बेटी का विवाह करने जा रहा था। गरीबी में बेटी की शादी कर वो पेट भरने के बोझ से मुक्त हो जाना चाहता था। लेकिन लड़की स्कूल में पढ़ने जाती थी। उसने हेल्पलाइन नंबर पर फोन कर दिया। पुलिस आई और शादी रोक दी गई।

भारत में यह प्रथा लम्बे समय से चली आ रही है जिसके तहत छोटे बच्चों का विवाह कर दिया जाता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि आज के पढ़े लिखे समाज में भी यह प्रथा अपना स्थान बनाए हुए है। जो बच्चे अभी खुद को भी अच्छे से नहीं समझते। जिन्हें जिन्दगी की कड़वी सच्चाईयों का कोई ज्ञान नहीं। जिनकी उम्र अभी पढ़ने लिखने की होती है। उन्हें बाल विवाह के बंधन में बांधकर क्यों उनका जीवन बर्बाद कर दिया जाता है।

नेशनल हेल्थ फैमेली सर्वे-5 की 2020 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 40.8 फीसदी लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में हो गया। त्रिपुरा में 40.1 और पश्चिम बंगाल में 41.6 फीसदी लड़कियां बाल विवाह की शिकार हुई हैं। गुजरात में भी 20 फीसदी लड़कियां साल 2019 में बाल विवाह का शिकार हुई हैं। वहीं बिहार में 11 फीसदी लड़कियां ऐसी थीं, जो 15 से 19 आयु वर्ष के बीच ही या तो मां बन गई थीं या गर्भवती थीं। त्रिपुरा में 21.9 और पश्चिम बंगाल में 16.4 फीसदी लड़कियां 15 से 19 वर्ष के बीच मां बन चुकी थीं।

इसके अलावा असम और आंध्र प्रदेश में 11.7 और 12.6 फीसदी लड़कियां 18 वर्ष से कम आयु में भी मां बन चुकी थीं या गर्भवती थीं। आंकड़ों से साफ है कि आजादी के 74 साल बाद भी इस देश में महिलाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। हम अपनी बेटियों को बाल विवाह और कम उम्र की गर्भावस्था से नहीं बचा पाए हैं। यही कारण है कि इस देश में 50 फीसदी से ज्यादा महिलाएं और बच्चे एनीमिया (रक्ताल्पता) के शिकार हैं।

इसे भी पढ़ें: राष्ट्र एकजुट होकर मुकाबला करे तो कोरोना पर काबू पाया जा सकता है

यूनिसेफ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत के कई क्षेत्रों में अब भी बाल विवाह हो रहा है। इसमें कहा गया है कि पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत में बाल विवाह की दर में कमी आई है। लेकिन कई प्रदेशों में यह प्रथा अब भी जारी है। रिपोर्ट के अनुसार बाल विवाह की यह कुप्रथा आदिवासी समुदायों सहित कुछ विशेष जातियों के बीच प्रचलित है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बालिका शिक्षा की दर में सुधार, किशोरियों के कल्याण के लिये सरकार द्वारा किये गए निवेश व कल्याणकारी कार्यक्रम और इस कुप्रथा के खिलाफ सार्वजनिक रूप से प्रभावी संदेश देने जैसे कदमों के चलते बाल विवाह की दर में कमी देखने को मिली है। यूनिसेफ के अनुसार अन्य सभी राज्यों में बाल विवाह की दर में गिरावट लाए जाने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। किंतु कुछ जिलों में बाल विवाह का प्रचलन अब भी उच्च स्तर पर बना हुआ है।

यह रिपोर्ट हमारे सामाजिक जीवन के उस स्याह पहलू की ओर इशारा करती है जिसे अक्सर हम रीति-रिवाज व परम्परा के नाम पर अनदेखा करते हैं। देश में बाल विवाह के खिलाफ कानून बने हैं और समय-समय पर उसमें संशोधन कर उसे और प्रभावशाली बनाया गया हैं। फिर भी लगातार बाल विवाह हो रहे हैं। भारत में बाल विवाह पर रोक संबंधी कानून सर्वप्रथम सन् 1929 में पारित किया गया था। बाद में सन् 1949, 1978 और 2006 में इसमें संशोधन किये गए। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत बाल विवाह कराने पर 2 साल की जेल व एक लाख रुपए का दंड निर्धारित किया गया है।

देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जड़ से खत्म करना है तो इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा तथा बालिकाओं के पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। समाज में शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। अभिभावकों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना होगा। सरकार को भी बाल विवाह की रोकथाम के लिये बने कानून का कड़ाई से पालन करवाना होगा। बाल विवाह प्रथा के खिलाफ समाज में जोरदार अभियान चलाना होगा। साथ ही सरकार को विभिन्न रोजगार के कार्यक्रम भी चलाने होंगे ताकि गरीब परिवार गरीबी की जकड़ से मुक्त हो सकें और इन परिवारों की बच्चियां बाल विवाह का निशाना न बन पाएं।

अगर सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अन्त नहीं हो पा रहा है तो इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है इसके प्रति सामाजिक जागरूकता की कमी। जब तक समाज में बाल विवाह रोकने के प्रति जागरूकता नहीं आएगी तब तक यह कुरीति खत्म नहीं होने वाली है। बाल विवाह एक सामाजिक समस्या है। सिर्फ कानून के भरोसे बाल विवाह जैसी कुप्रथा को नहीं रोका जा सकता है। इसका निदान सामाजिक जागरूकता से ही सम्भव हो पायेगा।

-रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित होते हैं।)







This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept