जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है?

हम आपको बता दें कि एलन मस्क का आरोप है कि मुकेश अंबानी का प्रभाव स्टारलिंक की भारत में एंट्री में बाधा बन रहा है। जबकि भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और वनवेब जैसी कंपनियों को सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।
स्टारलिंक की भारत में एंट्री का रास्ता साफ होता नहीं दिख रहा, तो एलन मस्क ने मुकेश अंबानी पर हमला करने का नया तरीका खोज लिया है। पहले अंबानी को भारत का ‘असली बॉस’ बताया और अब उन्हें ‘प्राइम मिनिस्टर अंबानी’ कहकर तंज कस दिया। लेकिन मस्क साहब, जरा ठहरिए! यह सिर्फ मुकेश अंबानी पर कटाक्ष नहीं है, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री पद को भी एक कारोबारी विवाद में घसीटने की कोशिश है। प्रधानमंत्री का पद किसी उद्योगपति की जागीर नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था का प्रतीक है। ऐसे में अपनी कंपनी के हितों के लिए इस पद पर तंज कसना आखिर किस तरह की कारोबारी शालीनता है? सवाल यह भी है कि भारत में अपनी शर्तें मनवाने के लिए मस्क इतने उतावले क्यों हैं कि उन्हें अब देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था की गरिमा का भी ख्याल नहीं रहा?
हम आपको बता दें कि एलन मस्क का आरोप है कि मुकेश अंबानी का प्रभाव स्टारलिंक की भारत में एंट्री में बाधा बन रहा है। जबकि भारत सरकार का रुख स्पष्ट है कि स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और वनवेब जैसी कंपनियों को सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम से जुड़े नियमों का पालन करना होगा। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज कर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब नियमों के तहत मंजूरी मिलनी है, तो मस्क बार-बार अंबानी को निशाना बनाकर आखिर साबित क्या करना चाहते हैं?
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देखा जाये तो मस्क जिस स्टारलिंक को भारत में जल्द शुरू करने की मांग कर रहे हैं, वह कोई सामान्य इंटरनेट सेवा नहीं है। यह हजारों उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराती है। दूरदराज के गांवों, सीमावर्ती इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह तकनीक उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा संबंधी सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाए। रूस और चीन समेत दुनिया के तमाम देशों ने स्टारलिंक को अनुमति नहीं दी है। वहीं भारत के लिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या विदेशी कंपनी के नियंत्रण वाले नेटवर्क पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जोखिम पैदा कर सकती है?
भारत सरकार की चिंताओं में डेटा की सीमा पार आवाजाही, संचार पर नियंत्रण और सुरक्षा एजेंसियों की कानूनी निगरानी जैसे मुद्दे शामिल हैं। यह चिंता काल्पनिक भी नहीं है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मार्च 2025 में ही स्टारलिंक पर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत पड़ने पर संचार बंद करने का अधिकार स्टारलिंक के पास होगा या उसके भारतीय साझेदारों के पास? उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या इन समझौतों के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने की कोशिश थी? विडंबना देखिए कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस पहले सुरक्षा संबंधी सवाल उठा रही थी, उसी मुद्दे पर आज राहुल गांधी मस्क के आरोपों को राजनीतिक समर्थन देते दिखाई दे रहे हैं।
साथ ही एलन मस्क ने रिलायंस पर भाजपा की चुनावी चंदा देने का आरोप लगाया है। लेकिन अगर चुनावी फंडिंग और कारोबारियों के राजनीतिक प्रभाव का प्रश्न उठाया जा रहा है, तो यही कसौटी मस्क पर भी लागू होनी चाहिए। अमेरिकी चुनाव आयोग में दाखिल दस्तावेजों से पता चला था कि मस्क ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करने वाले राजनीतिक समूहों को 25.9 करोड़ डॉलर से अधिक दिए थे। इसमें लगभग 23.9 करोड़ डॉलर अमेरिका पीएसी को दिए गए थे। इसलिए सवाल उठता है कि अगर किसी उद्योगपति की चुनावी फंडिंग राजनीतिक प्रभाव का प्रमाण मानी जा सकती है, तो ट्रंप की जीत के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करने वाले मस्क से यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए? क्या अमेरिका में किसी पसंदीदा उम्मीदवार की मदद करना लोकतंत्र है, लेकिन भारत में किसी कंपनी की राजनीतिक फंडिंग अपने आप संदेह का विषय बन जाती है? वास्तविकता यह है कि कॉरपोरेट राजनीतिक चंदा अनेक लोकतंत्रों में चुनावी राजनीति का हिस्सा है।
साथ ही भारत में इंटरनेट की कीमतों की तुलना भी इस बहस को एक नया आयाम देती है। रिलायंस जियो ने सस्ते मोबाइल डेटा के जरिए करोड़ों भारतीयों को इंटरनेट से जोड़ा है और यह कंपनी पूरी दुनिया में सबसे सस्ता डेटा देने के लिए जानी जाती है जबकि एलन मस्क की ब्रॉडबैंड सेवाएं और उनके उपकरण बेहद महंगे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि स्टारलिंक बेकार है। दूरदराज के क्षेत्रों में उसकी उपयोगिता वास्तविक हो सकती है। लेकिन मस्क यदि भारतीयों के हितों की बात करते हैं, तो उन्हें यह भी बताना होगा कि उनकी सेवा कितने भारतीयों की पहुंच में होगी। प्रतिस्पर्धा का स्वागत होना चाहिए, मगर राष्ट्रीय सुरक्षा और आम उपभोक्ता की आर्थिक क्षमता की कीमत पर नहीं।
इसके अलावा, राहुल गांधी ने मस्क के ‘असली बॉस’ वाले सवाल के जवाब में लिखा, ‘वेलकम टू इंडिया, एलन। दूसरे शख्स से मिलोगे तो हैरान रह जाओगे।’ यह टिप्पणी परोक्ष रूप से गौतम अडानी की ओर संकेत करती दिखाई दी। मस्क ने इसके जवाब में राहुल को धन्यवाद दिया। देखा जाये तो राहुल का उद्योगपतियों और सरकार के संबंधों पर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर किसी विदेशी कारोबारी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीतिक तंज कसना पर्याप्त है? विपक्ष का दायित्व सिर्फ सरकार पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि देश की रणनीतिक और डिजिटल सुरक्षा पर कोई समझौता न हो। साथ ही इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जब जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल आता है तब तब राहुल गांधी अलग राह क्यों पकड़ लेते हैं?
यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ट्वीट से नाराज हैं। पूर्व की सरकारों में लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे कांग्रेस नेताओं का कहना है कि निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा से मुद्दों पर राय सोशल मीडिया पर नहीं रखी जाती। उनका कहना है कि पार्टी स्तर पर देशहित में जो राय बनती है उसके आधार पर ही सबको बोलना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि जयराम रमेश इस मुद्दे पर पहले ही पार्टी का पक्ष रख चुके थे और स्टारलिंक के संभावित सुरक्षा जोखिमों पर गंभीर सवाल उठाए थे। कांग्रेस नेताओं ने पूछा है कि राहुल गांधी को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे जयराम रमेश की ओर से उठाये गये सवालों से सहमत हैं या मस्क के समर्थन में उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं?
बहरहाल, एलन मस्क को प्रतिस्पर्धा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए शर्तें तय करने और भारतीय जनता को पारदर्शी व्यवस्था की मांग करने का उतना ही अधिकार है। प्रधानमंत्री पद पर तंज कसकर मस्क अगर अपनी कंपनी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि भारत में कारोबार सिर्फ दबाव या सार्वजनिक बयानबाजी के दम पर नहीं, बल्कि नियमों के तहत होता है। उनकी इस टिप्पणी ने उलटे भारत में उनके रवैये पर सवाल खड़े कर दिए हैं और सोशल मीडिया पर कई भारतीयों ने नाराजगी जताई है। राहुल गांधी को भी यह समझना चाहिए कि सरकार का विरोध करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के हितों को किसी विदेशी कारोबारी और उसकी कंपनी के साथ चल रहे विवाद का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
-नीरज कुमार दुबे
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