छात्र संघों से ही निकलते हैं बड़े नेता, इनको दबाना लोकतंत्र के लिए अहितकर

छात्र संघों से ही निकलते हैं बड़े नेता, इनको दबाना लोकतंत्र के लिए अहितकर

आज देश की संसदीय राजनीति में इस पाठशाला से निकले कई मेधावी छात्र हमारे विविध क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि कॉलेज, विश्वविद्यालय अगर छात्र संघों से दूर रहे तो शैक्षणिक माहौल और गुणवत्ता सही रहती है।

नीतीश कुमार, सुशील मोदी के सामने तेजस्वी यादव क्यों बौने साबित हो रहे हैं ? क्या सिर्फ पीढ़ीगत अंतर के चलते ? अरुण जेटली के बाद दिल्ली बीजेपी में शून्य-सा क्यों है ? क्यों मनोज तिवारी हल्के और प्रभावहीन दिखते हैं वहां ? दिग्विजय सिंह की तरह मप्र की सियासत में पकड़ दूसरी पीढ़ी के कांग्रेस नेताओं की क्यों नहीं है ? नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर की एक तंग गली से निकल कर आज देश की दर्जनभर नीति निर्धारक केन्द्रीय समितियों के सदस्य कैसे हैं? शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, कैलाश विजयवर्गीय, रमेश चेन्नीथला, रीता बहुगुणा, मुकुल वासनिक, अजय माकन, लालमुनि चौबे, रामविलास पासवान, शरद यादव, तारिक अनवर, प्रकाश जावड़ेकर, हुकुमदेव यादव, मनोज सिन्हा, गोपीनाथ मुंडे, रविशंकर प्रसाद जैसे अनेक नामों में वैचारिक विभिन्नता के बाबजूद एक साम्य है। वह यह कि सभी छात्र राजनीति से निकल कर आये हुए हैं। सभी नेताओं के पास अपने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संघर्ष का बीज आधार मौजूद है, अधिकतर जेपी आंदोलन के सहयात्री भी रहे हैं।

आज के नेता तेजस्वी यादव, अनुराग ठाकुर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट, पंकजा मुंडे, अभिषेक सिंह, दुष्यंत सिंह, पंकज सिंह, अगाथा संगमा, दुष्यंत चौटाला, रणदीप सुरजेवाला, मनीष तिवारी, सुखबीर बादल, सुप्रिया सुले जैसे नेताओं की नई पीढ़ी में भी एक साम्य है। ये सब अपने पिता या परिजनों की विरासत के प्रतिनिधि हैं, किसी के पास जनसंघर्षों की कोई पृष्ठभूमि नहीं है। इन्हें सब कुछ विरासत में मिल गया इसलिये इस नई पीढ़ी के साथ आप प्रशासन और राजनीति में उन सरोकारों को नहीं देख सकते हैं जो जम्हूरियत के लिये जरूरी है। सवाल यह है कि क्या भारत में छात्र राजनीति के दिन लद गए हैं ? क्या छात्र राजनीति की उपयोगिता खत्म हो चुकी है ? इसके दोनों आयाम हैं। पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे महान शिक्षा शास्त्री मानते थे कि विश्वविद्यालय में राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिये वे छात्र संघों के विरुद्ध थे। वहीं देश में एक वर्ग ऐसा भी है जिसने छात्र संघों को लोकतंत्र की पाठशाला निरूपित किया है। जेपी, लोहिया जैसे महान नेताओं ने खुद आगे आकर छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया।

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आज देश की संसदीय राजनीति में इस पाठशाला से निकले कई मेधावी छात्र हमारे विविध क्षेत्रों में योगदान दे रहे हैं। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि कॉलेज, विश्वविद्यालय अगर छात्र संघों से दूर रहे तो शैक्षणिक माहौल और गुणवत्ता सही रहती है। सवाल यह है कि बिहार में अस्सी के दशक से छात्र संघ चुनाव नहीं हो रहे हैं, मप्र में भी 1991 के बाद से बंद प्रायः ही है। शेष जगह अब जिस लिंगदोह कमेटी के आधार पर कॉलेजों में चुनाव होते हैं उनका कोई औचित्य इसलिये नहीं है क्योंकि वे अनुशासन के नाम पर इतने सख्त नियमों में बांध दिए गए हैं कि वहां नेतृत्व और सँघर्ष का कॉलम ही नहीं रह गया है। अगर यह मान लिया जाए कि छात्र संघों से कैम्पस की गुणवत्ता खराब होती है तब क्या बिहार, मप्र या दूसरे राज्यों में पिछले 30 वर्षों में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का ट्रैक रिकॉर्ड कोई विशिष्ट उपलब्धि भरा रहा है ? अखिल भारतीय सेवाओं में आज भी मप्र का प्रतिनिधित्व सबसे निचले पायदान पर है राज्य की आबादी के अनुपात से।

बिहार, मप्र, बंगाल जैसे बड़े राज्यों के विश्वविद्यालयों में सामाजिक, आर्थिक, मानविकी या प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में कोई महानतम उपलब्धियां हासिल की हो ऐसा भी नहीं है। हाल ही में जो वैश्विक रेटिंग जारी की गई है उनमें भारत के विश्वविद्यालयों का नाम नहीं हैं। जाहिर है इस तर्क को स्वीकार करने का कोई आधार नहीं है कि छात्रसंघ कैम्पसों में अकादमिक गुणवत्ता को प्रदूषित करते हैं। सच तो यही है कि छात्र संघ नेतृत्व की पाठशाला है बशर्ते सरकारें ईमानदारी से अपनी भूमिका को तय कर लें। यह समाज में नैसर्गिक नेतृत्व क्षमता वाले तबके को प्रतिभा प्रकटीकरण का मंच है जिसके माध्यम से लोकतंत्र के लिये मजबूत जमीन का निर्माण होता है। पर सवाल यह है कि क्या सरकारें ऐसा चाहती हैं? आज लोकतंत्र का स्थाई चरित्र बन चुकी है सत्ता की निरंतरता। सहमति और असहमति की जिस बुनियाद पर जम्हूरियत चलती है उसे कुचलने का प्रयास सम्मिलित रूप से किया जा रहा है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आज दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है। अरुण जेटली से लेकर उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू, शिवराज सिंह चौहान, नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस, जेपी नड्डा, नरेंद्र सिंह तोमर, रमन सिंह, गिरिराज सिंह, रविशंकर प्रसाद, सदानन्द गौडा जैसे बड़े नेता इसी परिषद से निकलकर आज मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित हुए हैं लेकिन यह भी सच्चाई है कि बीजेपी शासित किसी भी राज्य में छात्रसंघों की मौलिक बहाली पर पिछले 30 सालों में कोई काम नहीं हुआ। कमोबेश आज कांग्रेस के लगभग सभी 60 प्लस के बड़े नेता एनएसयूआई की देन हैं। बावजूद दोनों दलों की सरकारों का रिकॉर्ड छात्रसंघ के मामले में बेईमानी भरा है। सच्चाई यह है कि सत्ता के स्थाई भाव ने राजनीतिक दलों को नेतृत्व के फैलाव से रोके रखा है आज कोई भी जेपी, दीनदयाल या लोहिया की तरह व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करना चाहता है।

सत्ता के लिये परिवारवाद की बीमारी ने भी राजनीतिक दलों को एक तरह से बंधक बना लिया है। क्रोनी कैपिटलिज्म ने आज हमारे लोकतंत्र को शिकंजे में ले लिया है यही कारण है कि संसदीय लोकतंत्र की इस व्यवस्था में बुनियादी रूप से लोकतांत्रिक भाव गायब है। जातिवाद, परिवारवाद और पूंजीवाद के शॉर्टकट मॉडल ने संसदीय राजनीति का चेहरा ही बदल कर रख दिया। छात्रसंघ के जरिये जिस नेतृत्व को समाज आकार देता था उससे सत्ता के स्थाई भाव को चोट पहुँचना लाजमी है इसलिये समवेत रूप से इस विषय पर सहमति कोई आश्चर्य पैदा नहीं करती है। तर्क दिया जाता है कि आज वैश्वीकरण के दौर में काबिल बच्चों के पास अपना कैरियर बनाने के फेर में राजनीति के लिये समय नहीं है लेकिन इस तथ्य को अनदेखा कर दिया जाता है कि देश की सभी नीतियों को बनाने का काम तो आखिर संसदीय व्यवस्था में नेताओं को ही करना है। फिर राजनीति से शुद्धता, बुद्धिमानी औऱ चरित्र की अपेक्षा का नैतिक आधार क्या है?

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कैम्पसों को राजनीति से दूर रखने का तर्क भी बड़ा सुविधाभोगी है क्योंकि आज भी हमारे विश्वविद्यालयों में सर्वोच्च नीति निर्धारक निकाय "कार्यपरिषद" ही हैं जिनमें सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल और मुख्यमंत्री करते हैं, ये सभी नियुक्ति विशुद्ध राजनीतिक आधारों पर होती है। फिर कैसे कहा जा सकता है कि कैम्पस में सरकारें राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं करती हैं। मप्र में तो हर सरकारी कॉलेज में जनभागीदारी समिति के गठन के प्रावधान हैं जिनमें अध्यक्ष की नियुक्ति सरकार करती है और कॉलेज का प्राचार्य सदस्य सचिव की हैसियत से काम करता है। जनभागीदारी समितियां सरकारों के एजेंडे को ही आगे बढ़ाती हैं क्योंकि वे प्रशासन से लेकर प्रबन्धन तक में सर्वेसर्वा हैं। जाहिर है कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक सरकारें अपनी सीधी पकड़ बनाए हुए हैं लेकिन अपनी शर्तों पर। इसलिए यह कहना कि सरकारें कैम्पसों में राजनीतिक दखल रोकने के नाम पर छात्रसंघों को प्राथमिकता नहीं देती हैं सफेद झूठ से ज्यादा कुछ नहीं है। हकीकत यही है कि आज के संसदीय मॉडल में सभी दल पूंजी और परिवारों के बंधक हैं और जनभागीदारी के नाम पर केवल शर्ताधीन भागीदारी को ही इजाजत देते हैं।

-डॉ. अजय खेमरिया

(लेखक छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं)