सत्ता के खेल में उलझा मध्य प्रदेश का राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय

सत्ता के खेल में उलझा मध्य प्रदेश का राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ शुरू हुई राजनीति ने यहां सिर्फ बदला है तो महानिदेशक से कुलपति का पद। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी स्थापना की गई थी, वह कहीं पीछे छूट गए है।

जहां पूरा देश कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा है। तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश में अलग ही प्रकार की जंग चल रही है। यह जंग है पूर्ण सत्ता की, यह जंग है सत्ता में भागीदारी की, यह जंग है सत्ता के खिलाफ। मध्य प्रदेश की राजनीति में पिछले दिनों जो कुछ घटा उससे कोई अंजान नहीं है। सत्ता में 15 साल बाद लौटी कांग्रेस कैसे 15 महीने में ही विदा हो गई ये सबने देखा और बूझा भी। लेकिन जैसा कि होता है सत्ता परिवर्तन के बाद सब कुछ बदल दिया जाता है ऐसा ही मध्य प्रदेश में भी शुरू हो गया है। 15 महीने पहले कांग्रेस ने आकर बदला तो अब बीजेपी बदल रही है। कहीं बदला जा रहा है तो कहीं बदला लिया जा रहा है। कोरोना के खिलाफ युद्ध स्तर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जुटे हुए है। तो इसी बीच मंत्रिमंडल गठन को लेकर सुगबुगाहट होती है। इसमें कोई दोराह नहीं है कि सत्ताधारी दल के लोग ही सत्ता में अपना हिस्सा चाहते है। तभी इस तरह की खबरें समाचार पत्र और मीडिया की सुर्खिया बनती है। विपक्ष तो बस अपना कर्तव्य पूरा करता है, वो भी एक लाचार विपक्ष जो वर्तमान सरकार की गलतियां गिनाते गिनाते इतना व्यक्तिगत हो जाता है कि वह स्वयं यह भूल जाता है कि उसने सत्ता में रहते क्या किया था?

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लेकिन बात अब सत्ता के गलियारों से निकलकर शिक्षा संस्थानों तक पहुंच गई है। उस शिक्षण संस्थान तक जहां के लिए कहा जाता है कि यहां लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तैयार किया जाता है। जी हां हम बात कर रहे है उसी एशिया के पहले राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय की जिसका नाम ख्याति प्राप्त पत्रकार, राष्ट्रकवि और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम पर रखा गया है माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय। शिक्षा के मंदिर में राजनीति कोई नई बात नहीं है लेकिन यह राजनीति सिर्फ छात्र संघों तक सीमित हो, तो यह उनके व्यक्तित्व विकास के साथ लोकतांत्रिक प्रणाली जानने समझने में उनकी मदद करती है। लेकिन जब शिक्षण संस्थानों में वहां के शिक्षकों को लेकर राजनीति होने लगे तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन यहां उचित और अनुचित को लेकर सवाल ही नहीं है। यहां तो सवाल है राजनीतिक पूर्ण सत्ता का जिसे वर्चस्व की लड़ाई से जोड़ा जा सकता है। जिस राजनीतिक पार्टी की सत्ता उनकी विचारधारा के लोगों का वर्चस्व। 

पिछले तीन दशकों से जो यहां चलता आ रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ शुरू हुई राजनीति ने यहां सिर्फ बदला है तो महानिदेशक से कुलपति का पद। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा जिन उद्देश्यों को लेकर इसकी स्थापना की गई थी, वह कहीं पीछे छूट गए है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खंडवा दौरे के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी के प्रति अपना आदर प्रगट करते हुए उनके नाम से मध्य प्रदेश में विश्वविद्यालय की स्थापना करने की मंशा जाहिर की थी। जिसको लेकर कांग्रेस की मोतीलाल बोरा सरकार में कवायत शुरू हुई। तत्कालीन प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा शरदचंद बेहार बताते है कि पहले पत्रकारिता पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए भोपाल विश्वविद्यालय यानि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में ही एक सेंटर खोलने पर विचार किया गया था। लेकिन विख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी की मंशा थी कि माखनलाल जी के नाम पर एक अलग ही राष्ट्रीय स्तर का विश्वविद्यालय खोला जाए जिसको लेकर उन्होंने प्रयास जारी रखे। जिसमें प्रभाष जोशी, अजीत भट्टाचार्यजी और जस्टिस पी.बी.सावंत तीनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके फलस्वरूप एशिया के पहले राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। शुरूआती उद्देश्यों की बात करें तो यहां शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के लिए पत्रकारिता संस्थानों के द्वार तो खुले ही थे, लेकिन इसके साथ ही राज्य के जनसंपर्क विभाग में यहां के विद्यार्थियों को नियुक्ति देकर सरकार की योजनाओं का संचार करवाना भी एक महत्वपूर्ण पहलू था। चूंकि इस विश्वविद्यालय का संचालन राज्य सरकार का जनसंपर्क विभाग करता है तो जाहिर है, सत्ता बदलने के बाद जनसंपर्क संचालनालय उसी राजनीतिक दल के विचारधारा के समर्थकों के प्रति वफादारी दिखाता है जिस पार्टी की सत्ता होती है। 

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लेकिन यहां बात विचारधारा से आगे की भी है। यहां बात शिक्षा की है, उसके गुरूकुल की है जहां निर्माण किया जाता चाहिए ऐसी विचारधारा का जो राष्ट्र और पत्रकारिता के सिद्धांतों को आगे ले जाने वाली हो। लेकिन पिछले दो दशकों में माखनलाल जी के उन विचारों को कही पोटली बनाकर रख दिया गया है और कुछ लोगों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस शिक्षा के मंदिर का उपयोग बस सीढ़ियों की तरह किया है। इसमें वह लोग भी शामिल है जिन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के लिए भी विश्वविद्यालय को राजनीतिक का अखाड़ा बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन अंत में सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई के बीच नुकसान किसका हुआ है इसके मूल्यांकन का वक्त अब शायद आ चुका है। 

पिछले दो दिनों से लगातार समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के बारे में खूब लिखा जा रहा है। एक समाचार पत्र लिखता है कि दो दिन पहले तक विश्वविद्यालय के कुलपति रहे दीपक तिवारी को मुख्यमंत्री कार्यालय से इस्तीफा देने के लिए निर्देश दिए गए थे, इसके बाद ही उन्होंने इस्तीफा दिया। इससे पहले कुछ इसी तरह 2018 में कांग्रेस की सत्ता आने के बाद तत्कालीन कुलपति जगदीश उपासने को भी इस्तीफा देना पड़ा था। यह दोनों ही वरिष्ठ पत्रकार है और उतने ही योग्य जितने एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति के लिए आवश्यक होता है। लेकिन निजाम बदलते ही उनकी विद्युता और ज्ञान को दरकिनार करते हुए उन्हें पद से हटने का निर्देश सत्ताधारियों द्वारा दे दिया गया। राधे श्याम शर्मा से शुरू हुआ यह सिलसिला अच्युतानंद मिश्र जो विश्वविद्यालय के महानिदेशक भी रहे और कुलपति भी से लेकर जगदीश उपासने और दीपक तिवारी तक जारी है। 

कोरोना के खिलाफ हमारी सरकारें जंग जीत भी जाएगी लेकिन गुरूकुलों में गुरूओं का ऐसा अपमान होगा तो हमारी शिक्षा पद्धि कहा जाएगी यह विचारणीय विषय है। जिस पर सत्ताधीशों के साथ ही समाज और विश्वविद्यालय में पढने वाले विद्यार्थियों को भी सोचना होगा। क्योंकि परिवर्तन के लिए साहस जुटाना पड़ता है और परिवर्तन तभी होता है, जब इससे सीधे तौर पर उस संकल्प के लिए जुड़े लोग सत्ताओं को अपने आगे नतमस्तक करने के लिए मजबूर कर दें। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के महानिदेशक रहे शरदचंद बेहार इसके लिए सुझाव देते है कि विश्वविद्यालय का कुलपति मुख्यमंत्री, नेता विपक्ष और अन्य राजनीतिक दल के लोगों सहित प्रबुद्ध व्यक्तियों की परिषद द्वारा चयन किया जाए। जिसमें सभी की सहमति होगी तो ऐसा अवसर नहीं आएगा कि कुलपति को किसी के निर्देश के बाद इस्तीफा देना पड़ेगा। बात बस इतनी सी है कि विश्वविद्यालय में राजनीतिक मौसम के हिसाब से कुलपति न बदले जाए क्योंकि शैक्षणिक संस्थानों को राजनीति का अखाड़ा बनाने वाले सत्ताधारी दलों को आने वाली पीड़ियां कभी भी माफ नहीं करेगी फिर वह चाहे किसी भी विचारधारा के क्यों न हो। 

- दिनेश शुक्ल






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