बीएमसी चुनाव 2026 के सियासी मायने, महायुति के राजनीतिक कौशल को मिली जनस्वीकृति

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कमलेश पांडे । Jan 17 2026 7:47PM

एक बात और, महायुति के विकास के एजेंडे ने मुम्बई में पहचान की राजनीति को बहुत पीछे छोड़ दिया। खासकर ठाकरे भाइयों (उद्धव-राज) की हार से विपक्षी एकता की कमी उजागर हुई। वहीं चाचा-भतीजा एकता यानी शरद पवार और अजित पवार की एकता भी उनके हक में कोई रंग नहीं दिखा सकी।

बीएमसी चुनाव 2026 में भाजपा-शिवसेना (शिंदे) गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत हासिल की, जिसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। यह जीत ठाकरे परिवार के तीन दशक पुराने दबदबे को समाप्त करती है। बीएमसी के 227 वार्डों में बहुमत चिह्न 114 है, जहां महायुति 118 वार्डों में विजयी रही। इस चुनाव में भाजपा ने 89 सीटें जीतीं, जबकि शिंदे की शिवसेना को 29 मिलीं, जिससे महायुति गठबंधन को 118 सीटों का बहुमत प्राप्त हुआ। जबकि शिवसेना (यूबीटी) को मात्र 65 सीटें मिलीं, जो अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन रहा। वहीं, कांग्रेस को 24, एआईएमआईएम को 8 एनसीपी अजीत पवार को 3, सपा को 2 और एनसीपी शरद पवार को 1 सीट मिली। वहीं, राज्य के अन्य निकायों में भी भाजपा ने 25 में से 29 पर कब्जा जमाया।

देखा जाए तो कुल 227 वार्डों में मुंबई की सबसे अमीर निगम या यूं कहें देश के भी सबसे अमीर नगर निगम पर भाजपा नीत गठबंधन का कब्जा हो गया। महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों, विशेषकर बीएमसी में, भाजपा-शिंदे शिवसेना गठबंधन ने बहुमत हासिल कर बड़ा जीत दर्ज की है। यह परिणाम ठाकरे गुट की लंबी हुकूमत को समाप्त करता है और राज्य की सियासत में महायुति की मजबूती दर्शाता है। वहीं, पहली बार एआईएमआईएम ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया, जिससे सेक्यूलरों का जनाधार खिसका।

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इसके राजनीतिक मायने अहम हैं क्योंकि यह जीत महाराष्ट्र में भाजपा को शहरी राजनीति का 'असली किंग' बनाती है, जो उसके राज्यव्यापी प्रभाव को मजबूत करती है। खास बात यह कि तमाम व्यक्तिगत विरोधाभासों के बावजूद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिंदे गुट के साथ गठबंधन करके न केवल मराठी वोटों को विभाजित किया बल्कि उस विपक्ष को पूरी तरह से कमजोर किया, जो विगत तीन दशकों से बीएमसी पर हावी था। 

एक बात और, महायुति के विकास के एजेंडे ने मुम्बई में पहचान की राजनीति को बहुत पीछे छोड़ दिया। खासकर ठाकरे भाइयों (उद्धव-राज) की हार से विपक्षी एकता की कमी उजागर हुई। वहीं चाचा-भतीजा एकता यानी शरद पवार और अजित पवार की एकता भी उनके हक में कोई रंग नहीं दिखा सकी। वहीं, कांग्रेस को भी कोई खास फायदा नहीं मिला। कुलमिलाकर बिखरे विपक्ष ने महायुति की राह आसान बना दी।

देखा जाए तो मराठवाड़ा के वैभव को वापिस पाने के घिसे पिटे मुद्दे पर क्षेत्रीय क्षत्रपों यानी ठाकरे परिवार और पवार परिवार की सियासी एकता  भी फुस्स हो गई। इसका महाराष्ट्र की सियासत पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और अब एकनाथ शिंदे की बारगेनिंग पावर भी बढ़ेगी। हालांकि, देवेंद्र फडणवीस उनकी कितनी सुनेंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा।

बता दें कि महायुति ने 29 निगमों में व्यापक जीत दर्ज की, जो आगामी विधानसभा चुनावों के लिए मजबूत आधार तैयार करती है। वहीं, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की नेतृत्व क्षमता को इससे नया बल मिला है, जबकि कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल सियासी हाशिए पर सिमट गए। इससे राज्य में 'ट्रिपल इंजन' की सरकार का विस्तार होगा और जनहितकारी कार्य करने में भाजपा नीत महायुति को बल मिलेगा। जहां तक राष्ट्रीय संदर्भ की बात है तो बीएमसी जैसी महत्वपूर्ण जीत भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर शहरी गठबंधनों को मजबूत करने का संदेश देती है। यह 2024 लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा की वापसी दर्शाती है, जो विकास-केंद्रित नीतियों पर जोर देती है। वहीं, महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव विपक्ष के लिए यह चेतावनी है कि क्षेत्रीय दलों का विभाजन जारी रहेगा। 

इसका राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट है। सच कहें तो यह जीत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली महायुति को भविष्य के विधानसभा और राष्ट्रीय चुनावों के लिए मजबूत आधार देती है। खासकर विकास परियोजनाओं जैसे मेट्रो, कोस्टल रोड और एअरपोर्ट पर जोर ने मतदाताओं को प्रभावित किया। वहीं विपक्षी महाविकास अघाड़ी की हार संगठनात्मक कमजोरी को उजागर करती है। अब बीएमसी पर नियंत्रण से मुंबई में इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरी नियोजन और सेवाओं में बदलाव संभव है। यह शहरी महाराष्ट्र में भाजपा के विस्तार को रेखांकित करता है और ठाकरे ब्रांड को पीछे धकेलता है। इससे राज्य स्तर पर महायुति का प्रभुत्व बढ़ेगा।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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