विकास की बात करने वाले राजनीतिक दल चुनाव प्रचार में गाली गलौच पर उतर आये

विकास की बात करने वाले राजनीतिक दल चुनाव प्रचार में गाली गलौच पर उतर आये

राजनीतिक दलों के नेता सत्ता हथियाने के लिए कैसे समाज में जहर घोल कर देश को कमजोर करने का काम करते हैं, इसे पांच राज्यों में चले रहे विधानसभा चुनावों में देखा−समझा जा सकता है।

राजनीतिक दलों के नेता सत्ता हथियाने के लिए कैसे समाज में जहर घोल कर देश को कमजोर करने का काम करते हैं, इसे पांच राज्यों में चले रहे विधानसभा चुनावों में देखा−समझा जा सकता है। परवान पर पहुंच चुके चुनाव प्रचार में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने मानो नैतिकता, देश की एकता−अखण्डता और सौहार्द को गिरवी रख दिया है। चुनावों में दोनों ही प्रमुख दलों के नेता एक−दूसरे के खिलाफ विष वमन करने में पूरी ताकत से जुटे हैं। विकास और तरक्की के वायदे हवा हो गए हैं।

राजस्थान, मध्य देश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनावी प्रचार चरम पर है। इसमें जमीनी मुद्दों के बजाय व्यक्तिगत छींटाकशी, जाति, धर्म, सम्प्रदाय और क्षेत्रवाद हावी हो गया है। इसमें कोई भी दल दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहता। एक−दूसरे की जाति को लेकर निजी हमले किए जा रहे हैं। वायरल हुए कई वीडियो में नेता चुनाव जीतने के लिए किसी भी तरह के हथकंडे इस्तेमाल करने की दलील दे रहे हैं। इन पांचों राज्यों में करोड़ों मतदाताओं की आशा−अपेक्षा अब धूल−धूसरित हो रही है। बुनियादी विकास की बातें हवा हो गई हैं। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है। तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्रीय समिति और मिजोरम में कांग्रेस की सरकार है।

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इन तीनों ही राजनीतिक दलों को अपने पूर्व के विकास और भविष्य में प्रदेशों की तरक्की पर भरोसा नहीं रहा है। तीन राज्यों में भाजपा की सरकार और दो राज्यों में विपक्ष में होने के कारण केंद्र सरकार भी चुनाव में कूदी हुई है। भाजपा के दिग्गज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और पार्टी के फायर ब्रान्ड नेता योगी आदित्यानाथ तूफानी गति से रोड शो और जनसभाएं कर रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस की तरफ से क्षेत्रीय नेताओं के अलावा चुनाव प्रचार की मुख्य कमान राहुल गांधी संभाले हुए हैं। जैसे−जैसे चुनावों की तारीख नजदीक आती जा रही है वैसे−वैसे नेताओं के बोल बिगड़ते जा रहे हैं।

चुनावी प्रदेशों में आम मतदाताओं की दुख−तकलीफों से लगता है कि किसी दल का वास्ता ही नहीं रह गया। राजनीतिक दल देश की समस्याओं के प्रति कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इन चुनावों से लगाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों में बुनियादी सुविधाओं को विकास हो गया हो, भ्रष्टाचार समाप्त हो गया हो। रोजगार के पर्याप्त अवसर मौजूद हों। ऐसे वास्तविक मुद्दों की बजाए मतदाताओं को बांटने की पूरी कोशिश की जा रही है। यह अलग बात है कि मतदाताओं ने बेतुकी और विकास को भटकाने वाली बातें करने वाले नेताओं को पहले भी कई बार आईना दिखाया है। इसका भाजपा और कांग्रेस ने अपने राजनीतिक इतिहास से सबक नहीं लिया। भाजपा ने चुनावी माहौल में वोटों का ध्रुवीकरण करने और सत्ता हासिल करने के लिए फिर से राम मंदिर निर्माण का सुर अलापा।

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इस बीच शिवसेना के सीधे अयोध्या जा धमकने से भाजपा का सारा खेल बिगड़ गया। चुनाव पूर्व भाजपा जिस तेजी से राममंदिर की दुहाई दे रही थी, शिवसेना के आते ही यह मुद्दा चुनावी परिदृश्य से पार्श्व में चला गया। दरअसल शिवसेना को अंदाजा हो गया कि सत्ता में से हिस्सा बांटे बगैर भाजपा एक बार फिर मंदिर मुद्दे की आड़ में सत्ता पाने की आस में है। इससे पहले इस मुद्दे को परवान चढ़ाती शिवसेना ने भाजपा का संकट बढ़ा दिया। चुनाव प्रचार में भाजपा के नेता अब राममंदिर का जिक्र तक करने से कतरा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस मुद्दे पर भाजपा को कभी भी सत्ता में आने की सफलता नहीं मिली। अन्यथा अयोध्या का विवादित ढांचा ढहाने के बाद भाजपा की राज्यों और केंद्र में पहले ही सरकारें बन गई होतीं।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को एंटी इन्कम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा है। विगत पांच सालों में विकास परवान पर नहीं चढ़ सका। इन राज्यों से भ्रष्टाचार की खबरें आती रही हैं। रोजगार की हालत भी किसी से छिपी हुई नहीं हुई है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इन चुनावों में केंद्र सरकार को भी भाजपा शासित राज्यों में किए गए विकास कार्यों पर भरोसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो पार्टी केंद्र और राज्यों के विकास की तस्वीर मतदाताओं के सामने रखती और विवादित मुद्दों और बोलों से परहेज बरतती।

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गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाने से पहले देश को सिर्फ बेहतर विकास और भविष्य का ख्वाब दिखाया गया था। कांग्रेस के काले कारनामों से आजिज आ चुके देश के मतदाताओं ने मोदी पर पूरा भरोसा जताते हुए देश की कमान सौंप दी थी। लोकसभा चुनाव में मोदी ने गुजरात को विकास के मॉडल की तरह पेश किया था। इसके विपरीत मौजूदा चुनावों में तीन राज्यों में भाजपा की सत्ता होने के बावजूद एक भी राज्य को मॉडल के तौर पर पेश नहीं किया गया। विधानसभा चुनावों में जिन मुद्दों को उछाला जा रहा है, उससे जाहिर है कि भाजपा को अपने विकास कार्यों पर भरोसा नहीं रह गया। मुद्दों को लेकर कमोबेश यही हालत कांग्रेस और दूसरे प्रमुख दलों की भी है।

कांग्रेस ने अपने दागदार अतीत को धोने का और विकास का कोई नया मॉडल पेश करने की बजाए छिछलेपन में भाजपा से प्रतिस्पर्धा की है। कांग्रेस के नेताओं के जो वीडियो वायरल हुए हैं, उनमें भी भाजपा की तर्ज पर ही जवाब दिए जा रहे हैं। जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें बची हैं, उनमें विकास को सामने रखकर मतदाताओं से वोट देने की अपील करने के बजाए कांग्रेस भी भाजपा की नकल करने में जुटी हुई है। विवादित मुद्दों में दोनों दल मशगूल हैं। इसी तरह तेलंगाना विकास समिति कर रही है। मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव को साढ़े चार साल शासन के दौरान किए गए विकास कार्यों पर भरोसा नहीं रहा। राव ने देश में भाजपा के लगातार होते विस्तार से बचने के लिए छह माह पहले ही चुनाव करा लिए। मुख्यमंत्री राव को यह खतरा रहा कि यदि अन्य राज्यों में भाजपा वापस सत्ता पाने में सफल रहती है तो मोदी-शाह की जोड़ी और ताकतवर बन जाएगी। इससे तेलंगाना के भी भाजपा के हाथों में खिसक जाने का खतरा खड़ा हो जाएगा। यही वजह रही कि राव ने छह माह पहले ही चुनाव की रणभेरी बजा दी। भाजपा और कांग्रेस की तरह राव भी तेलंगाना को देश का बेहतरीन राज्य बनाने में नाकामयाब रहे। राजनीतिक दल चाहे वास्तविक मुद्दों से कितना भी दूर भागने की कोशिश करें, किन्तु मतदाताओं की तीखी दृष्टि से किसी के लिए बचना मुश्किल है। आखिरकार जन अदालत ही तय करेगी कि कौन-सा दल कितने पानी में है।

-योगेन्द्र योगी