न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करने लगी है राजनीतिक दलों की चालें

By राकेश सैन | Publish Date: Jan 24 2019 3:24PM
न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करने लगी है राजनीतिक दलों की चालें
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देश की न्याय व्यवस्था में इस तरह के प्रावधान किसी पीड़ित को न्याय दिलवाने व गलत ढंग से फंसे आरोपी को बचाने के लिए की गई थीं परंतु वर्तमान में कालनेमि रूपी चालाक लोग इसका गलत लाभ उठाते दिख रहे हैं।

अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के काम में कुछ शक्तियां कालनेमि की भांति विघ्न डालने व विलंब करवाने में जुटी दिख रही हैं परंतु इन शक्तियों को खुद उस मायावी से ही सीख लेनी होगी। मूर्छित लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी लाने निकले हनुमान जी के काम में विलंब कराने के लिए रावण अपने साथी मायावी कालनेमि के पास जाता है। राम की वास्तविकता से परिचित कालनेमि रावण को ही समझाते हुए कहता है -
 
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। 
तासु पंथ को रोकन पारा।।
 


अर्थात् रावण की योजना सुन कर कालनेमि अपना सिर धुनते हुए कहता है, वो हनुमान जिसने देखते ही देखते तुम्हारे नगर को जला डाला उसका मार्ग कौन रोक सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद पर जिस तरह न्याय के मार्ग में रोड़े अटकाने व अनावश्यक विलंब करने की चेष्टा हो रही है उससे कालनेमि एकाएक स्मृति में आता है। सर्वोच्च न्यायालय अलाहबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ द्वारा 30 सितंबर, 2010 को दो-एक के मत से दिए फैसले को लेकर दिवानी मामले की सुनवाई कर रहा है। उक्त पीठ ने विवादित स्थान पर मंदिर होना स्वीकार किया परंतु सरकार द्वारा अधिग्रहित 2.77 एकड़ जमीन को तीन पक्षकारों जिनमें स्वयं रामलला, निर्मोही अखाड़ा व बाबरी मस्जिद में बराबर-बराबर बांटने को कहा। इसके खिलाफ तीनों पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जिस पर अब कालनेमि छाया पड़ती दिख रही है।
 
 
सभी जानते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव के समय 7 दिसंबर, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या मामले पर सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व कैबिनेट मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने अपील की थी कि इस विवाद की सुनावाई लोकसभा चुनाव के बाद जुलाई, 2019 तक टाल देनी चाहिए। कांग्रेस ने केवल अपील ही नहीं की बल्कि महाभियोग के नाम पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा को धमकाने का भी प्रयास किया। कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने तीन न्यायाधीशों द्वारा इतिहास में पहली बार की गई प्रेस कान्फ्रेंस व एक न्यायाधीश की मौत को लेकर तरह-तरह की बातें कीं। कांग्रेस, सपा, बसपा व वामपंथी दलों के 71 सांसदों ने उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा सभापति श्री एम. वैंकेया नायडू के पास इसके लिए आवेदन भी दिया परंतु 24 अप्रैल, 2018 को श्री नायडू ने इस आवेदन को अस्वीकार कर दिया। लेकिन कालनेमि ने हार नहीं मानी और अपना प्रयास जारी रखा। 27 सितंबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय से पहले 1994 को इस्माईल फारूकी के उस फैसले पर विचार करने को कहा गया जिसमें मस्जिद को इस्लाम में इबादत के लिए जरूरी नहीं बताया गया था। चाहे इस निर्णय का अयोध्या विवाद से कोई लेना देना नहीं था परंतु सभी जानते हैं कि यह केवल कालनेमि प्रयास था। न्यायालय ने इस पर भी विचार करने का निर्णय लिया तो मंदिर विरोधियों ने विवाद की सुनवाई बड़ी न्यायिक पीठ से करवाने की मांग रख दी। इस अपील पर विचार करते-करते न्यायाधीश मिश्रा सेवानिवृत हो गए और नए न्यायाधीश श्री रंजन गगोई ने नए सिरे से मामले की सुनवाई शुरू की।
 


 
अदालत ने 29 अक्तूबर, 2018 से इस मामले की नियमित सुनवाई करने का निर्णय लिया था परंतु अज्ञात कारण से न्यायालय ने इसे अपनी प्राथमिकता में शामिल नहीं होने की बात कही जिससे देशवासियों को काफी आघात लगा। अदालत ने 2 जनवरी, 2019 को मामले की सुनवाई को पीठ गठित करने की तारीख दे दी और इसे बढ़ा कर 10 जनवरी कर दिया। इस बीच 8 जनवरी को अदालत के नए मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई के नेतृत्व में पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया जिसमें न्यायाधीश सर्वश्री यूयू ललित, एसए बोबडे, एनवी रमन्ना, डीवाई चंद्रचूड़ को शामिल किया गया। पांच सदस्यीय पीठ गठित होने पर मुस्लिम पक्षकार श्री इकबाल अंसारी ने इस पर भी आपत्ति जतानी शुरू कर दी। हालांकि सुनवाई से पहले न्यायालय ने पीठ का गठन कर दिया और अगर इस पर किसी को आपत्ति थी तो वह पहले ही दर्ज करवा सकता था परंतु 10 जनवरी को सुनवाई एन मौके पर सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश हुए वकील श्री राजीव धवन ने इस बात पर आपत्ति जताई कि पीठ में शामिल न्यायाधीश श्री यूयू ललित उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के केस (सन् 1994) में वकील के तौर पर पेश हो चुके हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश श्री गोगोई ने नई पीठ गठित करने की घोषणा की और अगली तारीख 29 जनवरी डाल दी है। न्यायविदों के अनुसार, हालांकि न्यायाधीश श्री ललित का पीठ में बने रहना किसी तरह गलत नहीं था क्योंकि वे श्री कल्याण सिंह के जिस केस में अदालत में हाजिर हुए वह आपराधिक था और अयोध्या मामला दीवानी है। कल्याण सिंह के केस का इस केस से कोई सरोकार भी नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी यह हमारी न्यायिक प्रक्रिया की सरलता ही कही जा सकती है कि केस की अगली तारीख मिल गई। 
 
कालनेमि इतमें ही संतुष्ट हो जाए इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। सुनने में आ रहा है कि केस से जुड़े 14000 से अधिक पृष्ठों का संस्कृत, गुरमुखी, उर्दू, फारसी भाषाओं के अनुवाद पर अगली तारीख लिए जाने की तैयारी है। हालांकि मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने रिकार्ड 15 दिनों में इन पन्नों का अनुवाद करवा कर केस में गति प्रदान करने का काम किया परंतु दूसरा पक्ष इस पर विवाद पैदा करने की सोच चुका है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के एक सदस्य ने न्यायिक पीठ में कोई मुस्लिम न्यायाधीश न होने का सवाल उठा दिया। हो सकता है कि दूसरा पक्ष इसको लेकर भी कोई अपील करे और मामले को लटकाने, अटकाने व भटकाने के प्रयास और भी तेज हों। इस बीच ज्यों-ज्यों केस लंबा खिंच रहा है त्यों-त्यों कांग्रेस नेता श्री कपिल सिब्बल की अदालत को चुनाव तक केस टालने की अपील स्वत: ही स्वीकृत होती दिख रही है। देश की न्याय व्यवस्था में इस तरह के प्रावधान किसी पीड़ित को न्याय दिलवाने व गलत ढंग से फंसे आरोपी को बचाने के लिए की गई थीं परंतु वर्तमान में कालनेमि रूपी चालाक लोग इसका गलत लाभ उठाते दिख रहे हैं।


 
कालनेमि ने अपनी माया से साधू का वेष धारण कर हनुमानजी के मार्ग में कुटिया डाल ली और ऊंचे-ऊंचे स्वरों में रामनाम का जाप करने लगा। उसे देख एक बार तो हनुमानजी भी भ्रमित हुए परंतु उसका कपट अधिक देर तक नहीं चल पाया। आज भी राममंदिर के मार्ग में बाधा पहुंचाने वाले कोट के ऊपर जनेऊ धारण कर मंदिर-मंदिर परिक्रमा करते दिख रहे हैं और सार्वजनिक बहस में राममंदिर के हिमायती भी बनते हैं परंतु उनकी पार्टी के नेता कैसे-कैसे षड्यंत्र करते हैं और विवाद के निपटारे में बाधा पैदा कर रहे हैं वह किसी से छिपा नहीं। इस केस में 14 अपील दायर हुई हैं जिससे साफ पता चलता है कि कुछ कालनेमि ज्ञात हैं तो कुछ अज्ञात शक्तियां भी हैं जो इस विवाद को जिंदा रख कर देश में सांप्रदायिक सौहार्द को बारूद के ढेर पर बैठाए रखना चाहती हैं।
 
 
दूसरी ओर केस को लटकाने के प्रयास इशारा करते हैं कि कहीं न कहीं मंदिर विरोधियों को पूरी आशंका है कि केस की नियमित सुनवाई होती है तो बहुत जल्द फैसला आ सकता है और वह भी उनके विरोध में। न्यायिक प्रणाली विवादित स्थान पर मंदिर होना स्वीकार कर ही चुकी है और इसके एतिहासिक, भू-गौलिक साक्ष्य भी मंदिर के पक्षकारों के साथ हैं। कांग्रेस सहित बाकी छद्म सैक्यूलर दलों का हित इसी में है कि विवाद को जितना हो उतना लटकाया व भटकाया जाए क्योंकि फैसला समय पर आता है तो उन्हें यह निर्धारण करने में असुविधा होगी कि वे मंदिर के पक्ष में बोलें या अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के कोढ़ को खुजाएं। बाबरी पक्ष विलंब को ही अपनी जीत मान रहा है परंतु मंदिर विरोधियों को कालनेमि से ही सीख लेनी चाहिए। रावण को समझाते हुए कालनेमि कहता है- 

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। 
महा मोह निसि सूतत जागू।
काल ब्याल कर भच्छक जोई। 
सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई।
 
हे रावण, हमें मूढ़ता त्याग देनी चाहिए क्योंकि जो राम काल रूपी सर्प के भी भक्षक हैं उनको क्या कोई सपने में भी जीत सकता है?
 
-राकेश सैन

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