Gold पर सरकार की सख्ती के चलते Jewellery Industry में हाहाकार! खाली बैठे हैं कारीगर, सूने पड़े हैं बड़े-बड़े शोरूम

सोने की लगातार बढ़ती कीमतों ने ग्राहकों की खरीद आदतों में भी बदलाव शुरू कर दिया है। उद्योग के अनुसार पिछले पांच वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग तीन सौ प्रतिशत और पिछले एक वर्ष में लगभग अस्सी प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।
देशभर में ज्वैलर्स की दुकानें इन दिनों वीरान नजर आने लगी हैं और इस कारोबार से जुड़े लाखों कारीगर खाली बैठने पर मजबूर हो रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से नागरिकों से एक वर्ष तक सोने के आभूषणों की खरीद टालने की अपील और सोने पर आयात शुल्क को छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत किए जाने के बाद आभूषण उद्योग में चिंता और असमंजस का माहौल गहरा गया है। सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया संघर्ष, बढ़ती ऊर्जा कीमतों और कमजोर होते रुपये के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है, इसलिए सोने के आयात को नियंत्रित करना जरूरी हो गया है।
हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। ऐसे में सरकार के इस कदम का असर व्यापक माना जा रहा है। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण घरेलू परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि उद्योग को प्रधानमंत्री की अपील का सम्मान करना चाहिए और किसी प्रकार की घबराहट या हड़ताल से बचना चाहिए। उनका कहना है कि कच्चे तेल के बाद सबसे अधिक विदेशी मुद्रा सोने के आयात पर खर्च होती है और सरकार का उद्देश्य भुगतान संतुलन को बेहतर बनाना है।
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हम आपको बता दें कि आभूषण उद्योग से सीधे और परोक्ष रूप से लगभग एक करोड़ लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। इसमें कारीगर, बिक्रीकर्मी, पैकेजिंग, सुरक्षा, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। उद्योग जगत को आशंका है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कोविड काल जैसी आर्थिक मुश्किलें फिर सामने आ सकती हैं।
दूसरी ओर, विवाह और पारिवारिक समारोहों में सोने का सांस्कृतिक महत्व भी इस बहस के केंद्र में आ गया है। दक्षिण भारत में कसुमालै, झिमिकी, जडई बिल्ला और पारंपरिक चूड़ियों जैसे आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक बचत का प्रतीक माने जाते हैं। कई परिवार अब अपनी योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं। एक महिला ने बताया कि उन्होंने विवाह के लिए नकली आभूषण अपनाने और केवल मंगलसूत्र तथा अंगूठियों जैसे सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण गहनों को ही सोने में बनवाने का निर्णय लिया है।
हालांकि कई ग्राहक इस बदलाव से असहज हैं। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि सामान्य ग्राहक जरूरत के अनुसार ही खरीदारी करता है, वह सोना जमा करने के उद्देश्य से नहीं खरीदता। मद्रास ज्वैलर्स एंड डायमंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जयंतीलाल चलानी ने कहा कि शुल्क वृद्धि के बाद ग्राहकों में घबराहट बढ़ी है। कई लोगों ने भविष्य की खरीद पहले ही कर ली ताकि आगे कीमत और न बढ़े।
व्यापारियों के अनुसार शुल्क वृद्धि का सीधा बोझ ग्राहकों पर पड़ेगा, क्योंकि अतिरिक्त शुल्क बिक्री मूल्य में जोड़ दिया जाएगा। फिर भी इसका अप्रत्यक्ष नुकसान व्यापारियों को भी होगा। उदाहरण के तौर पर, पहले जहां कोई ग्राहक बारह तोले खरीद पाता था, अब वह केवल ग्यारह तोले ही खरीद सकेगा। इससे बिक्री की मात्रा घटेगी।
उधर, सोने की लगातार बढ़ती कीमतों ने ग्राहकों की खरीद आदतों में भी बदलाव शुरू कर दिया है। उद्योग के अनुसार पिछले पांच वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग तीन सौ प्रतिशत और पिछले एक वर्ष में लगभग अस्सी प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। अब लगभग आधे ग्राहक पुराने आभूषण बदलकर नए डिजाइन बनवा रहे हैं ताकि केवल निर्माण शुल्क देना पड़े। पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक डिजाइन में बदलवाने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ रही है।
युवा ग्राहकों के बीच चांदी, हल्के हीरे वाले आभूषण और चौदह या अठारह कैरेट के हल्के गहनों की मांग बढ़ रही है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी अब आभूषणों को केवल निवेश नहीं, बल्कि दैनिक फैशन के रूप में भी देख रही है। प्रयोगशाला में बने हीरों और हल्के डिजाइन वाले आभूषणों की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। हालांकि उद्योग मानता है कि प्लेटिनम अभी भी सोने का विकल्प नहीं बन पाया है।
इस बीच, सरकार और उद्योग दोनों की नजर स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पर भी है। इस योजना के तहत लोग अपने घरों में पड़ा सोना जमा कर ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। न्यूनतम दस ग्राम सोना जमा किया जा सकता है और उस पर लगभग दो से ढाई प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलता है। सरकार का उद्देश्य घरेलू सोने को आर्थिक प्रणाली में लाकर आयात पर निर्भरता कम करना है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सोना केवल वित्तीय संपत्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। लोग अपने पारिवारिक आभूषणों को पिघलाकर जमा कराने में सहज महसूस नहीं करते। इसके बजाय वे पुराने गहनों को गिरवी रखकर ऋण लेना या उन्हें बदलकर नए डिजाइन बनवाना अधिक पसंद करते हैं। यही कारण है कि स्वर्ण मुद्रीकरण योजना अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी है।
उद्योग जगत ने सरकार को कई सुझाव भी दिए हैं। इनमें पुराने सोने के विनिमय कार्यक्रम को प्रोत्साहन, स्वर्ण जमा योजनाओं को आकर्षक बनाना, हल्के वजन के आभूषणों को बढ़ावा देना और कर्नाटक की कोलार स्वर्ण खदानों को फिर से सक्रिय करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि अधिक आयात शुल्क से अवैध तस्करी और काले बाजार की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।
इसी बीच, सरकार ने मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के सोने के भंडार को सरकारी योजना के तहत शामिल किए जाने संबंधी अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट कहा है कि मंदिरों के सोने को रणनीतिक स्वर्ण भंडार बनाने या उस पर किसी प्रकार की स्वर्ण मुद्रीकरण योजना लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। लोगों से अपील की गई है कि वे अपुष्ट सूचनाओं पर विश्वास न करें और केवल आधिकारिक घोषणाओं पर भरोसा करें।
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