अधिकारियों की कारगुजारी के चलते योगी का जनसुनवाई पोर्टल तोड़ रहा है दम

  •  स्वदेश कुमार
  •  दिसंबर 2, 2019   13:05
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अधिकारियों की कारगुजारी के चलते योगी का जनसुनवाई पोर्टल तोड़ रहा है दम

समीक्षा में पता चला कि जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतों के निपटारे में विभागीय अधिकारी पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं। विभागों के स्तर पर तय समय में जनता की समस्याओं का निपटारा नहीं हो रहा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़ी उम्मीदों के साथ जनता की समस्याओं के निस्तारण के लिए 'जनसुनवाई' पोर्टल शुरू किया था। योगी को उम्मीद थी कि जब अधिकारियों को इस बात का अहसास रहेगा कि जनता की शिकायतों पर अधिकारी क्या कार्रवाई कर रहे हैं, इस पर सीएम साहब की सीधी नजर है तो अधिकारी जन समस्याओं का निस्तारण पूरी ईमानदारी से करेंगे। लेकिन योगी के अधिकारियों ने उनकी उम्मीदों को ठेंगा दिखाकर 'तू डाल−डाल तो मैं पात−पात' की कहावत को सही साबित कर दिया है। हालत यह है कि जनसुनवाई के नाम पर आवदेक की शिकायत को अधिकारी एक से दूसरे अधिकारी को अग्रसारित करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं और अंत में बिना किसी ठोस कार्रवाई के शिकायत को 'निस्तारित' दिखा दिया जाता है। इससे न केवल विभागीय कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लग रहा है बल्कि जनता का मुख्यमंत्री से विश्वास भी उठता जा रहा है। जनसुनवाई पोर्टल में आने वाली शिकायतों पर अधिकारियों द्वारा गंभीरता से कार्रवाई नहीं किए जाने से नाराज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुछ समय पूर्व इसकी समीक्षा भी की थी।

समीक्षा में पता चला कि जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतों के निपटारे में विभागीय अधिकारी पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं। विभागों के स्तर पर तय समय में जनता की समस्याओं का निपटारा नहीं हो रहा है। इस कारण लंबित (डिफाल्टर) मामले बढ़ते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस स्थिति को संज्ञान में लेते हुए संबंधित विभागों से कहा था कि वह इन मामलों का जल्द से जल्द निपटारा कराएं। इस संबंध में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल ने एक पत्र इन सभी विभागों को भेजा था। इसमें कहा गया था कि जनसुनवाई प्रणाली (आईजीआरएस) पर दर्ज जन शिकायतों के निस्तारण की स्थिति की समीक्षा में पाया गया कि आपके कार्यालय स्तर पर समय सीमा के बाद लंबित मामलों मामलों की तादाद अत्याधिक है, लेकिन सीएम की सख्ती के बाद भी हालात बदले नहीं हैं।

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बात यहीं तक सीमित नहीं थी। मुख्यमंत्री कार्यालय ने यह भी चेताया था कि सी श्रेणी प्राप्त कर पुनर्जीवित हुए संदर्भों के मुकाबले आई आख्याएं भी अधिक संख्या में कार्यवाही के लिए लंबित हैं। ऐसे में इन लंबित मामलों का नियमानुसार जल्द समाधान कराया जाए। इस संबंध में संबंधित अपर मुख्य सचिव व प्रमुख सचिवों को पत्र भेजा गया। असल में इस मामले में हर जिले का हर महीने परफार्मेंस का आकलन किया जाता है। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तमाम जिलों के जिलाधिकारियों, पुलिस कप्तान व विभागों के प्रमुख सचिवों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग में सबसे ज्यादा नाराजगी समस्याओं के समाधान तय समय में न होने पर जताई थी। उन्हें कई ओर से फीडबैक मिला था कि शिकायतों के निपटारे में न केवल जिला स्तर पर बल्कि विभागों के स्तर पर भी लापरवाही हो रही है।

इसको उदाहरणों से समझा जा सकता है। योगी सरकार के ऑनलाइन शिकायत पोर्टल 'जनसुनवाई' पर झूठी रिपोर्ट देकर फर्जी निस्तारण किए जा रहे हैं। अब घपले−घोटालों के लिए चर्चित स्वास्थ्य विभाग में ऐसा ही मामला सामने आया है। अलीगढ़ में कॉपर−टी के लिए घूस लेने की आरोपित डॉक्टर के खिलाफ चार बार पोर्टल पर शिकायत हुई। विभाग ने डॉक्टर को मूल तैनाती स्थल चंडौस सीएचसी पर दोबारा भेजने की झूठी रिपोर्ट दी। जबकि, उसे अनुरोध पर शहर की ही दूसरी पीएचसी दे दी गई। पीड़ित पक्ष ने पुनः इस फर्जीवाड़े की पोर्टल पर शिकायत की। जब इस संबंध में सीएमओ डॉ. एमएल अग्रवाल से पूछा गया तो उनका कहना था कि डॉ. जमाल की संबद्धता खत्म कर दी गई है। वे केके जैन पीएचसी के कैंपस में ही रहती हैं। कोई कुछ भी आरोप लगा सकता है। ऐसी कोई परिस्थिति रही होगी कि उन्हें पीपीसी सेंटर पर पुनः संबद्ध करना पड़ा।

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इस संबंध में लखनऊ से जुडी कुछ घटनाओं का भी जिक्र किया जा सकता है। तीन महीने पहले बिजली कनेक्शन की अर्जी देने के बावजूद पांच घर आज भी अंधेरे में रहने को मजबूर है। एक घर में तो मांगलिक कार्यक्रम (शादी) है जो उसे जनरेटर लगाकर करना पड़ रहा है। मामला लखनऊ के चिनहट के देवा रोड स्थित हिन्द सिटी के पांच घरों में विद्युत आपूत्ति से जुड़े आवेदन का है। इन पांच घरों के मालिकों से विद्युत विभाग ने कनेक्शन देने के नाम पर सड़सठ हजार एक सौ इक्यावन पये (67151) वसूलने के बाद भी कनेक्शन अभी तक नहीं दिया है। मजबूरन इन घरों के लोग विद्युत कनेक्शन के अभाव में अपने मांगलिक काम (शादी) जनरेटर का सहारा लेकर कर रहे हैं। पैसा जमा होने के दो माह बाद कॉलोनी में सिर्फ चार पोल लगा पाए हैं। प्रत्येक पोल पर बॉक्स बांधकर उस पर एबीसी लाइन भी खींच दी गयी। इतना कुछ होने के बाद विभाग अब इसे गलत बता रहा है। आवेदक बीते बीते तीन माह से पॉवर हाउस के चक्कर काट रहे हैं। पांच में से एक मकान में शादी है। चिनहट देवा रोड पर हिंद सिटी कॉलोनी में रामाकांत शुक्ला, जयनारायण सिंह, रीता श्रीवास्तव, प्रियंका जौहरी व रेखा चौधरी का मकान है। मकान में बिजली का कनेक्शन लेने के लिए उन्होंने अगस्त माह में देवा रोड स्थित विद्युत सबस्टेशन पर आवेदन किया था। आवेदन का भौतिक सत्यापन करने पर विभागीय अधिकारियों ने यहां 4 नये विद्युत पोल लगाने के बाद मकान में कनेक्शन देने की बात कही। आखिरकार पांच लोगों को विद्युत कनेक्शन देने के लिए विभागीय जेई ने पये 67151 का एस्टीमेट तैयार किया। 4 सितम्बर का रामाकांत शुक्ला ने बैंक ऑफ बडौदा से 67151 रुपये का डीडी (संख्या 106135) बनवाया और 5 सितम्बर को विद्युत सब स्टेशन पर जमा कर दिया। पैसा जमा होने के दो माह विभाग ने अपने ही काम को गलत बताते हुए इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। पैसा जमा होने, पोल लगने व उस पर एबीसी लाइन खिंच जाने के बाद भी इस लाइन को चालू न किये जाने पर रामाकांत शुक्ला ने 16 नवम्बर को इसकी शिकायत मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर की। जनसुनवाई की शिकायत संख्या 40015719073385 को विभाग ने बिना कुछ किए निस्तारित बता दिया। रामाकांत शुक्ला बताते हैं कि उनके बेटे की शादी है। पूरा मकान अंधेरा में डूबा हुआ है। अब हमें यह समझ नहीं आ रहा है कि हम क्या करें।

-स्वदेश कुमार







अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रही उत्तर प्रदेश कांग्रेस को राहुल ने दिया बड़ा झटका

  •  अजय कुमार
  •  फरवरी 25, 2021   11:33
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अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रही उत्तर प्रदेश कांग्रेस को राहुल ने दिया बड़ा झटका

प्रियंका वाड्रा इधर कुछ दिनों से मिशन-2022 को लेकर प्रदेश में काफी सक्रिय नजर आ रही थीं, लेकिन अब राहुल के बयान के चलते प्रियंका बैकफुट पर आ गई हैं। कांग्रेसी भी नहीं समझ पा रहे हैं कि वह राहुल गांधी के नासमझी वाले बयान का कैसे बचाव करें।

उत्तर भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश ने जिस नेहरू-गांधी परिवार को ‘पाला-पोसा' और देश की सियासत में उसे सत्ता की सीढ़ियां तक चढ़ाया। यूपी के बल पर ही कांग्रेस ने दशकों तक देश पर राज किया। इतना ही नहीं यूपी की बदौलत ही इस खानदान से देश को तीन-तीन प्रधानमंत्री मिले। नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य ऐसा नहीं होगा जो उत्तर प्रदेश से चुनाव जीत कर सांसद नहीं बना हो, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को अमेठी की जनता ने क्या नकारा, राहुल बाबा उसी प्रदेश की जनता की समझ पर सवाल खड़े करने लगे हैं। अपने नये संसदीय क्षेत्र वायनाड में राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों के लिए ऐसा कुछ कह दिया कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने दिल्ली से यूपी-बिहार तक में उनके खिलाफ ‘तलवारें’ खींच लीं। निश्चित ही राहुल के विवादित बयान से उनके मिशन 2022 को बड़ा झटका लग सकता है। राहुल गांधी ने यूपी चुनावों में कांग्रेस की वापसी के लिए प्रियंका वाड्रा को राज्य का प्रभारी बनाया था। प्रियंका वाड्रा इधर कुछ दिनों से मिशन-2022 को लेकर प्रदेश में काफी सक्रिय नजर आ रही थीं, लेकिन अब राहुल के बयान के चलते प्रियंका बैकफुट पर आ गई हैं। कांग्रेसी भी नहीं समझ पा रहे हैं कि वह राहुल गांधी के नासमझी वाले बयान का कैसे बचाव करें।

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दरअसल, राहुल को इस बात का अफसोस है कि जिस उत्तर प्रदेश से वह 15 वर्षों तक सांसद रहे, वहां लोग मुद्दों की सतही राजनीति करते हैं। केरल में अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड के दौरे पर गए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तिरुवनंतपुरम में एक सभा में कहा, ''पहले के 15 साल मैं उत्तर भारत से सांसद था। मुझे वहां दूसरी तरह की राजनीति का सामना करना पड़ता था। यहां के लोग मुद्दों की राजनीति करते हैं और सिर्फ सतही नहीं, बल्कि मुद्दों की तह तक जाते हैं। राहुल का यह बयान सुर्खियों में आते ही भारतीय जनता पार्टी हमलावर हो गई। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड़डा ने ट्वीट किया, ‘कुछ ही दिन पहले वह (गांधी) पूर्वोत्तर में थे, देश के पश्चिमी भाग के खिलाफ जहर उगल रहे थे। आज दक्षिण में वह उत्तर के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। जेपी नड्डा ने कहा कि बांटो और राज करो की राजनीति अब नहीं चलने वाली है, इसी लिए राहुल गांधी को लोगों ने खारिज कर दिया है।

उधर, राहुल गांधी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निशाना साधते हुए ट्वीट किया, 'राहुल जी, सनातन आस्था की तपस्थली केरल से लेकर प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली उत्तर प्रदेश तक सभी लोग आपको समझ चुके हैं। विभाजकारी राजनीति आपका राजनीति संस्कार है। हम उत्तर या दक्षिण में नहीं, पूरे भारत को माता के रूप में देखते हैं। एक अन्य ट्वीट में सीएम योगी ने राहुल को संबोधित करते हुए लिखा- श्रद्धेय अटल जी ने कहा था कि भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्र पुरूष है। कृपया आप इसे अपनी ओछी राजनीति की पूर्ति के लिए ‘क्षेत्रवाद‘ की तलवार से काटने का कुत्सित प्रयास न करें। भारत एक था एक है, एक ही रहेगा।

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अमेठी में राहुल गांधी को हार का स्वाद चखाने वाली भाजपा सांसद और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी राहुल गांधी के बयान से काफी आहत हैं। उन्होंने राहुल पर तंज कसते हुए उन्हें एहसान फरामोश बताया। स्मृति ईरानी ने कहा कि राहुल जिस उत्तर भारत पर सवाल खड़े कर रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि सोनिया गांधी भी यहां से ही सांसद हैं। स्मृति ने कहा कि अगर उत्तर भारत के लोगों के प्रति हीन भावना है, तो ये उत्तर भारत में क्यों राजनीति कर रही हैं। प्रियंका वाड्रा ने अभी तक राहुल के बयान का खंडन क्यों नहीं किया। अमेठी की सांसद स्मृति ईरानी ने कहा कि गांधी परिवार जब फिर से अमेठी लौटेगा, तो उन्हें इस बात का जवाब देना होगा। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जिस उत्तर भारत का अपमान कर रहे हैं, वो भूल रहे हैं कि उसी इलाके से उनकी माता सोनिया गांधी भी सांसद हैं, ऐसे में राहुल गांधी ने जो बात कही, वो माफ करने लायक ही नहीं है। स्मृति ईरानी ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि यह अमेठी की जनता का अपमान है। अमेठी की जनता मेरा परिवार है और मेरे परिवार का अपमान करके माफी से काम नहीं चलता। उन्होंने कहा कि जब गांधी परिवार अमेठी आएगा, तब उन्हें अमेठी की जनता अपने अपमान का करारा जवाब देगी। उन्होंने कि राहुल गांधी को अमेठी की जनता ने नकार दिया तो वे वायनाड पहुंचे और वहां पहुंच कर अमेठी की जनता का अपमान कर रहे हैं। बता दें कि ईरानी ने पिछले आम चुनाव में गांधी को उनके पारिवारिक गढ़ माने जाने वाली अमेठी में हराया था, लेकिन वह केरल में वायनाड से जीत गए थे।

राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों को लेकर ऐसे समय में बयान दिया है जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में एक वर्ष का समय शेष बचा है। राहुल के इस बयान को भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी कर ली है। बीजेपी ही नहीं राहुल के बयान से यूपी में कांग्रेस की वापसी के लिए मेहनत कर रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं में भी काफी नाराजगी है। कांग्रेसी खुलकर कह रहे हैं कि राहुल के इस तरह के बयानों से कांग्रेस के मिशन-2022 को करारा झटका लग सकता है।

-अजय कुमार







भारत और सऊदी अरब के बीच पहले युद्धाभ्यास की शुरुआत के गहरे हैं निहितार्थ

  •  कमलेश पांडेय
  •  फरवरी 24, 2021   14:57
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भारत और सऊदी अरब के बीच पहले युद्धाभ्यास की शुरुआत के गहरे हैं निहितार्थ

2020 के दिसम्बर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने सऊदी अरब का दौरा किया था। यह पहली बार था जब किसी भारतीय सेना प्रमुख ने भारत और सऊदी अरब के बीच बढ़ते संबंधों का एक स्पष्ट संकेत देते हुए पश्चिम एशियाई देश का दौरा किया था।

भारत और सऊदी अरब के बीच प्रगाढ़ होते जा रहे द्विपक्षीय सम्बन्धों का ही यह नतीजा है कि वर्ष 2021 में पहली बार दोनों देश युद्धाभ्यास करने जा रहे हैं। यह भारत व सऊदी अरब के बीच मजबूत होते रक्षा सम्बन्धों और अन्य क्षेत्रों में भी विकसित हो रहे विश्वास परक सहयोग संबंधों के नतीजे हैं, जिससे एशिया में भारत की स्थिति और मजबूत होगी, वहीं सऊदी अरब की स्थिति भी एशिया व यूरोप में मजबूत होगी।

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गौरतलब है कि भारतीय और सऊदी अरब की सेनाएं पहली बार संयुक्त द्विपक्षीय अभ्यास करेंगी। खास बात यह है कि इतिहास में इन दोनों देशों के बीच यह पहला युद्धाभ्यास होगा। आपको यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि इससे पहले सऊदी अरब अपनी सेना को युद्ध की बारीकियां सिखाने के लिए पाकिस्तान और अमेरिका के भरोसे रहता था। लेकिन अब भारत की तरफ सऊदी अरब का बढ़ता झुकाव वैश्विक बिरादरी में उसके बढ़ते कद को अभिव्यक्त करता है। अभी सऊदी अरब की सेना भारत की यात्रा करके यहां युद्धाभ्यास करेगी, जबकि अगले वित्त वर्ष में होने वाले अभ्यासों के लिए भारतीय सेना सऊदी अरब की यात्रा करेगी। 

गौरतलब है कि 2020 के दिसम्बर में भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने सऊदी अरब का दौरा किया था। यह पहली बार था जब किसी भारतीय सेना प्रमुख ने भारत और सऊदी अरब के बीच बढ़ते संबंधों का एक स्पष्ट संकेत देते हुए पश्चिम एशियाई देश का दौरा किया था। तब द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के मुद्दे पर व्यापक चर्चा हुई थी। अपनी सऊदी अरब यात्रा के दौरान सेना प्रमुख नरवणे ने रॉयल सऊदी लैंड फोर्स के मुख्यालय, संयुक्त बल कमान मुख्यालय और किंग अब्दुल अजीज सैन्य अकादमी का दौरा किया था। तब उन्हें रॉयल सऊदी लैंडफोर्स के मुख्यालय में गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। उन्होंने रॉयल सऊदी के कमांडर जनरल फहद बिन अब्दुल्ला मोहम्मद अल-मुतीर से भी मुलाकात करके द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को और मजबूत करने के मुद्दे पर चर्चा की थी। इसके बाद उन्होंने संयुक्त बल सऊदी अरब के लेफ्टिनेंट जनरल मुतलाक बिन सलीम बिन अल-अजीमा कमांडर के साथ बातचीत की और रक्षा सहयोग पर विचारों का आदान-प्रदान किया। तब जनरल नरवणे के साथ गए प्रतिनिधिमंडल और उनकी पत्नी वीना नरवणे ने भी ऑल वीमेन सेंटर रियाद सऊदी अरबिया का दौरा किया। उनकी इस यात्रा से रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते खुलने की उम्मीद जताई गई थी।

आपको यह स्पष्ट कर दें कि सऊदी अरब, भारत को 'विज़न 2030' के तहत किंगडम के रणनीतिक साझेदार देशों में से एक के रूप में पहचान देता है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच जुड़ाव बढ़ा है। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सऊदी अरब यात्रा के दौरान रणनीतिक साझेदारी परिषद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। फरवरी 2019 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने नई दिल्ली का दौरा किया था। इस यात्रा के दौरान प्रिंस ने भारत में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के निवेश की घोषणा की थी। दोनों देशों के बीच घनिष्ठ हो रहे संबंधों के नतीजे अब भारतीय और सऊदी अरब की सेनाओं के पहली बार संयुक्त द्विपक्षीय अभ्यास करने का कार्यक्रम बनने से दिखने लगे हैं। 

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भारत-सऊदी अरब के बीच प्रगाढ़ होते सैन्य व अन्य सम्बन्धों से एक तरफ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, बंगलादेश, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, इंडोनेशिया आदि देशों की मानसिकता भारत के प्रति बदलेगी। वहीं, चीन, रूस, इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आशियान देश समूह व ब्राजील आदि साधन संपन्न देशों में भी भारत की सूझबूझ के प्रति एक सकारात्मक संदेश जाएगा। वैश्विक दुनियादारी में भारत के बढ़ते कद और उसे संतुलित रखने के लिहाज से भी सऊदी अरब के साथ हमारे प्रगाढ़ होते रिश्ते के अपने खास मायने हैं, जिसे समझने व समझाने की जरूरत है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार







रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर सतर्क है भारत !

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  फरवरी 23, 2021   14:48
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रूस और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर सतर्क है भारत !

भारत की चिंता यह है कि अफगानिस्तान के बहाने रूस-पाक फौजी-सहकार जोरों से बढ़ रहा है। अभी-अभी अफगानिस्तान पर रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव ने इस्लामाबाद-यात्रा की है। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई तो यह है कि अफगान-समस्या को हल करने में भारत की भूमिका नगण्य है।

भारत के विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला अभी-अभी मास्को होकर आए हैं। कोविड के इस भयंकर माहौल में हमारे रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और विदेश सचिव को बार-बार रूस जाने की जरूरत क्यों पड़ रही है ? ऐसा नहीं है कि किसी खास मसले को लेकर भारत और रूस के बीच कोई तनाव पैदा हो गया है या भारत-रूस व्यापार में कोई गंभीर उतार आ गया है। लेकिन ऐसे कई मुद्दे हैं, जिनकी वजह से दोनों मित्र-राष्ट्रों के बीच सतत संवाद जरूरी हो गया है।

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सबसे पहला मुद्दा तो यह है कि रूस से भारत जो एस—400 मिसाइल 5 बिलियन डॉलर में खरीद रहा है, उसे लेकर अमेरिका कोई प्रतिबंध तो नहीं लगा देगा। ट्रंप-प्रशासन के दौरान यह खतरा जरूर था लेकिन अब इसकी संभावना कम ही है। ये रूसी मिसाइल इस वक्त दुनिया के सबसे तेज मिसाइल हैं। दूसरा, कोरोना महामारी से निपटने में दोनों राष्ट्र परस्पर खूब सहयोग कर रहे हैं। यों भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और मोदी अब तक 19 बार मिल चुके हैं। कोराना-काल में पिछले साल उनकी चार बार बात भी हुई है। तीसरा, मुद्दा है— भारत-प्रशांत का यानि रूस को यह चिंता है कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में भारत कहीं अमेरिका का मोहरा बनकर चीन और रूस के विरूद्ध मोर्चाबंदी तो नहीं कर रहा है ? इसके जवाब में श्रृंगला ने कहा है कि भारत किसी भी देश के विरुद्ध नहीं है। वह चेन्नई से व्लादिवस्तोक तक समुद्री गलियारा बनाने की भी तैयारी कर रहा है। चौथा, अफगानिस्तान के सवाल पर श्रृंगला ने कहा कि भारत को इस बात से कोई एतराज नहीं है कि रूस और पाकिस्तान के बीच सीधा संवाद चल रहा है। यदि यह संवाद अफगानिस्तान में शांति लाता है तो भारत इसका स्वागत करेगा लेकिन अफगानिस्तान पर वह किसी राष्ट्र के कब्जे को बर्दाश्त नहीं करेगा।

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इधर भारत की चिंता यह है कि अफगानिस्तान के बहाने रूस-पाक फौजी-सहकार जोरों से बढ़ रहा है। अभी-अभी अफगानिस्तान पर रूस के विशेष दूत जमीर काबुलोव ने इस्लामाबाद-यात्रा की है। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई तो यह है कि अफगान-समस्या को हल करने में भारत की भूमिका नगण्य है। भारत सरकार और भाजपा में ऐसा कोई नहीं है, जो अफगान-स्थिति को ठीक से जानता-समझता हो। वैसे भी हमारी सर्वज्ञ सरकार अपने बयानों की नौटंकी से ही खुश होती रहती है। दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश होने के नाते हमारी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है लेकिन अफगान-मामले में हम हाशिए में पड़े हुए हैं।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं) 







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