ममता बनर्जी ने हैल्पलाइन तो शुरू कर दी लेकिन जनता हैल्प करने के मूड में नहीं है

By नीरज कुमार दुबे | Publish Date: Jul 30 2019 5:02PM
ममता बनर्जी ने हैल्पलाइन तो शुरू कर दी लेकिन जनता हैल्प करने के मूड में नहीं है
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विचारधारा से कोई मेल नहीं खाता हो उसके साथ ममता किस तरह से पेश आती हैं या कैसा व्यवहार करती हैं, यही तो उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी सीखेंगे। कार्यकर्ताओं को सीख देने से पहले ममता बनर्जी को अपने आचरण और व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आम लोगों तक पहुँच बनाने और उनकी शिकायतों का निपटारा करने के लिए पार्टी का हेल्पलाइन नंबर और एक वेबसाइट शुरू की है। यह दोनों पहलें साफ दर्शाती हैं कि कभी जनता की नेता के तौर पर पहचान बनाने वालीं ममता बनर्जी जनता से कितनी दूर हो चुकी हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि क्यों ममता बनर्जी को लोकसभा चुनावों में हार के बाद जनता की तकलीफों का ध्यान आया है? ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि अगले सौ दिनों में उनकी पार्टी के एक हजार से अधिक नेता और कार्यकर्ता पश्चिम बंगाल के 10 हजार गांवों में जाएंगे और स्थानीय लोगों के साथ समय बिताएंगे तथा उनकी समस्याएं सुन कर उसका निपटारा करेंगे।
 
संभव है ममता बनर्जी ने यह सभी फैसले चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के सुझाव पर लिये हों। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पीएसी) की सेवाएं ली हैं। लेकिन ममता को यह पता होना चाहिए कि प्रशांत किशोर भाजपा, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के लिए यह सब उपाय आजमा चुके हैं। ऐसे में अब यह उपाय ममता बनर्जी के लिए कितना काम करेंगे यह तो समय ही बताएगा लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि आलोचकों को ट्वीटर पर ब्लॉक कर देने वाले नेता जब गांवों में जाएंगे और लोगों के गुस्से का सामना करेंगे तब उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। अभी आप तृणमूल कांग्रेस के कार्यालय में आसानी से प्रवेश नहीं कर सकते ऐसे में समय बतायेगा कि नेता और जनता के बीच दूरी कितनी पटती है। लोकसभा चुनावों में मैंने खुद देखा कि जहां देश में किसी भी पार्टी के कार्यालय में मीडिया आसानी से जा सकता है वहीं कोलकाता स्थित तृणमूल कांग्रेस के कार्यालय में अनजान लोगों को संदिग्ध नजर से देखा जाता है और लंबी पूछताछ के बाद भी कई तरह की टालमटोल की जाती है।
ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं से वीआईपी संस्कृति छोड़ने को भी कहा है, देखना होगा उनकी इस अपील का कितना असर होता है क्योंकि कुछ दिनों पहले जब ममता बनर्जी ने पार्टी नेताओं से 'कट मनी' का पैसा लोगों को लौटाने को कहा था तो इक्का-दुक्का लोगों ने ही पैसे लौटाये थे। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के यदि सभी सुझावों का तृणमूल कांग्रेस पालन कर रही है तो उन्हें चाहिए कि वह पार्टी को यह भी सुझाव दें कि चिटफंड के जरिये लूटी गयी जनता की गाढ़ी कमाई को भी लौटा दिया जाये। यदि प्रशांत किशोर यह भी सुझाव दे सकें कि भ्रष्टाचारी के दाग लगे नेताओं को ममता बनर्जी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दें तो अच्छा हो। यदि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी को यह भी सुझाव दे सकें कि बार-बार केंद्र से टकराव का रास्ता मोल लेने की बजाय ममता बनर्जी हमारे संघीय ढांचे के अनुसार काम करते हुए सिर्फ राज्य के विकास पर ही ध्यान लगायें तो कितना अच्छा हो। यदि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी को यह भी सुझाव दे सकें कि राज्य में राजनीतिक हिंसा पर पूरी तरह लगाम लगा दी जाये तो कितना अच्छा हो। यदि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी को यह भी सुझाव दे सकें कि तुष्टिकरण की राजनीति बंद कर दी जाये तो कितना अच्छा हो। यदि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी को यह भी सुझाव दे सकें कि केंद्र की आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ राज्य की जनता को भी दिलाया जाये तो कितना अच्छा हो।
 
ममता बनर्जी अपने कार्यकर्ताओं को नैतिकता और मानवता का पाठ तो पढ़ा रही हैं लेकिन उन्हें कार्यकर्ताओं को यह भी सिखाना होगा कि 'ममता बनर्जी की जय' नहीं बोलने पर लोगों को पीटा नहीं जाये। यही नहीं ममता बनर्जी एक ओर नैतिकता की बात कर रही हैं लेकिन दूसरी ओर उनकी कथित तुष्टीकरण नीति के बारे में खुलकर बोलने वाले पूर्व राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के राजभवन से विदाई समारोह में वह अनुपस्थित रहीं। त्रिपाठी को उम्मीद थी कि राज्य से जब वह विदा होंगे तो उस वक्त राजभवन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सद्भावना के तौर पर मौजूद रहेंगी। अपनी विचारधारा से कोई मेल नहीं खाता हो उसके साथ ममता बनर्जी किस तरह से पेश आती हैं या कैसा व्यवहार करती हैं, यही तो उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी सीखेंगे। कार्यकर्ताओं को सीख देने से पहले ममता बनर्जी को अपने आचरण और व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा।


बहरहाल, ममता बनर्जी जनता के बीच ज्यादा से ज्यादा पहुँच बनाने और उनकी समस्याओं का निराकरण करने के लिए तो तकनीक का सहारा ले रही हैं लेकिन मतदान के लिए चुनाव आयोग जिस तकनीक यानि ईवीएम का प्रयोग करता है उससे उन्हें परहेज है। वह मतपत्र प्रणाली की बहाली की मांग कर रही हैं और इसके लिए विपक्ष के विभिन्न नेताओं को गोलबंद कर आवाज बुलंद कर रही हैं। ममता बनर्जी को यह समझना चाहिए कि वह दो बार मुख्यमंत्री बनी हैं, सांसद बनी हैं तो वह भी ईवीएम के जरिये ही हुआ है। ईवीएम पर संदेह छोड़ तकनीक का लाभ खुद भी उठाएं और इसके माध्यम से लोगों का भी भला करें। साथ ही ममता बनर्जी को यह भी ध्यान रखना होगा कि अकसर हैल्पलाइन्स खुद ही हैल्पलैस हो जाती हैं, यह स्थिति कहीं उनकी पार्टी में न पैदा हो जाये।


 
-नीरज कुमार दुबे
 

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