Modern Dating Issues । क्या 'Someone Better' की सोच आपकी Love Life को कर रही बर्बाद?

Modern Dating Issues
CANVA PRO
एकता । Jan 5 2026 6:04PM

न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सिद्धार्थ वारियर के अनुसार, आज की ऑनलाइन डेटिंग में दिमाग एक साथ दो सवालों से जूझता है: 'क्या यह इंसान सही है?' और 'क्या इससे बेहतर कोई और है?'। इसी दुविधा, धैर्य की कमी और विकल्पों की अधिकता के कारण सार्थक संबंध बनाना एक चुनौती बन गया है।

अगर आपको भी आज के समय की डेटिंग पहले से ज्यादा उलझन भरी या निराश करने वाली लगती है, तो आप अकेले नहीं हैं। ज्यादातर लोग ऐसा ही महसूस कर रहे हैं। आज की डिजिटल दुनिया में डेटिंग अब सिर्फ दो लोगों के बीच की केमिस्ट्री तक सीमित नहीं रही। अब इसमें बहुत सारे ऑप्शन, लगातार मोबाइल का ध्यान भटकाना, कम होता धैर्य और हर समय 'शायद कोई और बेहतर मिल जाए' का दबाव शामिल हो गया है। इन सबका असर हमारे दिमाग पर पड़ रहा है और यही वजह है कि डेटिंग आज पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल और भावनात्मक रूप से थका देने वाली लगने लगी है।

मुंबई के न्यूरोलॉजिस्ट, टेड एक्स स्पीकर और यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर डॉ. सिद्धार्थ वारियर इस बदलाव को साइंस के जरिए समझाते हैं। वे न्यूरोसाइंस, मेंटल हेल्थ और इंसानी व्यवहार पर आधारित जानकारी साझा करते हैं। एक इंस्टाग्राम वीडियो में उन्होंने बताया कि आज की डिजिटल लाइफस्टाइल और हमारा बदलता व्यवहार, सही पार्टनर ढूंढने को क्यों इतना मुश्किल बना रहा है।

आज डेटिंग ज्यादा मुश्किल क्यों हो गई है?

डॉ. वारियर के मुताबिक, आज के समय में डेटिंग इसलिए कठिन हो गई है क्योंकि लोग एक साथ दो सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं। पहला सवाल होता है, 'क्या ये इंसान मेरे लिए सही है?' और दूसरा, 'क्या इससे भी कोई बेहतर बाहर मौजूद है?' उनका कहना है कि पहले रिश्ते में आते समय सिर्फ पहले सवाल पर ध्यान होता था, लेकिन अब दिमाग को दोनों बातों पर एक साथ यकीन दिलाना पड़ता है, जो आसान नहीं है।

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समय की कमी

किसी इंसान को सही से समझने के लिए समय चाहिए। उसके अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को जानने के लिए धैर्य जरूरी होता है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग किसी को समय देना नहीं चाहते। जल्दी फैसला कर लिया जाता है और थोड़ी सी दिक्कत आते ही आगे बढ़ जाने का मन बनने लगता है।

ज्यादा ऑप्शन, ज्यादा कन्फ्यूजन

दूसरे सवाल, 'कोई और बेहतर तो नहीं?' की सबसे बड़ी वजह डेटिंग ऐप्स हैं। बस एक स्वाइप में सैकड़ों प्रोफाइल दिख जाती हैं। इससे दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि हमेशा कोई और विकल्प मौजूद है। ऐसे में किसी एक इंसान पर रुकना और पूरी तरह ध्यान देना मुश्किल हो जाता है।

डॉ. वारियर बताते हैं कि जब तक आप इधर-उधर देखना बंद नहीं करते, तब तक दिमाग को यह भरोसा नहीं हो पाता कि यही सही इंसान है। लेकिन डेटिंग ऐप्स हमें लगातार इधर-उधर देखने के लिए उकसाते हैं।

डोपामाइन का खेल

नए रिश्ते की शुरुआत में जो एक्साइटमेंट और खुशी मिलती है, वो दिमाग में डोपामाइन नाम के केमिकल की वजह से होती है। लेकिन समय के साथ यह शुरुआती जोश कम होने लगता है। तब दिमाग फिर से नई उत्तेजना ढूंढने लगता है। इसी वजह से लोग नए-नए लोगों की ओर आकर्षित होते हैं। यह कनेक्शन बनाने से ज्यादा, उस फील-गुड एहसास के पीछे भागना बन जाता है।

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न्यूरोसाइंस क्या कहती है?

डॉ. वारियर प्यू रिसर्च सेंटर की एक स्टडी का जिक्र करते हैं, जिसमें लगभग आधे लोगों ने माना कि पिछले 10 सालों में डेटिंग ज्यादा मुश्किल हो गई है। इसकी वजह घोस्टिंग, ऑनलाइन बदतमीजी और बेवफाई का डर बताया गया।

वे कहते हैं कि न्यूरोसाइंस के हिसाब से नया रिश्ता दिमाग को नशे जैसा एहसास देता है। लेकिन जैसे-जैसे नयापन खत्म होता है, रिश्ता मजे से ज्यादा मेहनत जैसा लगने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे जिम जाना, शुरू में मुश्किल, लेकिन लगातार करने से ही नतीजे मिलते हैं। डॉ. वारियर के मुताबिक, रिश्ता तभी चलता है जब दोनों लोग लंबे समय तक मेहनत करने के लिए तैयार हों। असली प्रतिबद्धता एक-दूसरे से कम और उस पूरी प्रक्रिया से ज्यादा होती है।

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