किसी परी कथा जैसा कहानी है हौज खास की, युवाओं का बन गया है फेवरेट अड्डा

By ट्रैवल जुनून | Publish Date: Jan 31 2019 6:10PM
किसी परी कथा जैसा कहानी है हौज खास की, युवाओं का बन गया है फेवरेट अड्डा
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शुरुआत में, हौज खास विलेज का कॉन्सेप्ट किसी परी कथा जैसा लगता था क्योंकि यह भारत के गांवों की परंपरा के एकदम उलट था। फिल्ममेकर आयशा सूद ने बताया कि विकास और संपन्नता यहां सच होते दिखाई देने लगे थे।

 
दिल्ली में जब आप Hauz Khas या Green Park मेट्रो स्टेशन से बाहर आएंगे आपको 20-25 ऑटो रिक्शा वाले चिल्लाते हुए मिल जाएंगे- भैया हौज खास जाएंगे क्या? ये आवाज ही आपके मन में हौज खास के लिए रोमांच भर देती है। हौज खास विलेज की पहचान पार्टी हब, रोमांटिक डेटिंग और दोस्तों के साथ हैंगआउट प्लेस के रूप में बन चुकी है। शहर के कई प्रेमी जोड़े यहां घंटों एक-दूसरे में डूबे रहते हैं और बेहतरीन शाम का मजा लेते हैं।
 
इस पर भी एक सवाल हमेशा से जहन में कौंधता रहा है कि क्या ये जगह सिर्फ पार्टी और डेट के लिए है ? क्या ये जगह सिर्फ कैफे और क्लब के लिए है ? क्या ये जगह सिर्फ शॉपिंग और फूड के लिए है ? इसका जवाब ‘ना’ है। हौज शब्द का अर्थ वाटर टैंक से है और खास का अर्थ उर्दू में वैभवपूर्ण से है। अलाउद्दीन खिलजी ने इस जगह पर एक वैभवशाली टैंक बनवाया था, जो पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए था। ये गांव दिल्ली के बनने से पहले से हैं लेकिन इसका इतिहास 1980 के बाद तेजी से बदला है।


 
हौज खास में वर्तमान में मौजूद झील के इर्दगिर्द बना किला और मस्जिद अच्छे तरीके से संग्रहित किए गए हैं। इसके बाद कुछ और इमारतें बनाई गईं जिससे झील को आकर्षक रूप मिला और इस जगह को हौज खास विलेज के रूप में पहचान भी। 14वीं सदी में, इस गांव में संगीत संस्कृति का आगमन हुआ और यहीं से इस जगह पर्यटकों और आम लोगों का आना शुरू हो गया।
 
दुनियाभर में कई शहर बीते 20 सालों में नाटकीय रूप से बदले हैं और दिल्ली भी इन्हीं शहरों में से एक है। उपनिवेशवाद के काल से निकलकर दिल्ली एक राजनेताओं और अफसरों का शहर बनी और अब यह लाखों लोगों की पहचान से जुड़ गई राजधानी है। इस बदलाव के साथ ही दिल्ली का विस्तार भी होता चला गया। बीते 20 सालों में वसंत कुंज, द्वारका, रोहिणी, एनसीआर में नोएडा और गुड़गांव नए केंद्र बन चुके हैं। इन्होंने दिल्ली को नया आकार ही नहीं बल्कि नया अर्थ भी दिया है।
 
इसके अलावा, कई दिल्लीवालों के लिए, जो मॉडर्न हैं, ट्रैवलर्स हैं, उनके लिए पार्टी, सेलिब्रेशन और लाइफ को खुलकर जीने का ठिकाना हौज खास विलेज बन चुका है। बीते कुछ सालों में हौजखास में प्रॉपर्टी होना किसी भी रेस्टोरेंट, नाइटक्लब, गैलरी मालिक का ड्रीम बन चुका है। हौज खास विलेज के इस कल्चर ने साउथ एक्सटेंशन, डिफेंस कॉलोनी और खान मार्केट को ओवरटेक कर लिया है। तो, हम इस हौज खास विलेज को ‘गांव’ से जोड़कर क्यों देख रहे हैं? इस ‘गांव’ की यात्रा ने यहां पर पीढ़ियों से रह रहे गांववालों, और बाद में 1980 के दशक में इसे अपना घर बनाने वाले आर्टिस्ट और डिजाइनर्स को किस तरह प्रभावित किया है?


 
आज, अर्बन फैंटसीज के लिए हौज खास विलेज एक विशिंग रूम बन चुका है। एक ऐसी जगह जहां आपको सड़क दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों से अलग लगेगी। यहां गलियां आपको खुद को किसी अलग जगह होने का अहसास कराएंगी। यहां के रेस्टोरेंट में हो सकता है कि मालिक किचेन से बाहर आएं और आपके साथ बियर के सिप लगाएं। डिजाइनर स्टूडियोज छोटी शॉप्स में भी अलग रूप में नजर आते हैं। यहां के माहौल में ही एक अजीब-सी एनर्जी है। यहां इतिहास, संस्कृति, क्रिएटिविटी और मॉडर्नेटी का एक संगम आपको साफ-साफ नजर आएगा।
 
1990 में, सुरेश कलमाड़ी ने बीना रमानी के साथ साझेदारी से बिस्त्रो की नींव रखी। बिस्त्रो एक हाई क्लास रेस्टोरेंट था वो भी उस प्लॉट पर जिसे गांव वाले पूरी तरह से छोड़ चुके थे। बिस्त्रो हौज खास विलेज का पहला रेस्टोरेंट भी था। इसने बेहद कामयाबी हासिल की। हालांकि कुछ समय बाद रमानी ने इस साझेदारी से और बाद में इस गांव से ही कदम वापस खींच लिए। सिंह ने बताया कि तब तक हमारा गांव बदल चुका था। हमें ऐसे किराए मिलने लगे जैसी कीमत हमने कभी सोची भी नहीं थी। हमने लोन लेना शुरू कर दिया और इस नए बढ़ रहे बिजनेस के साथ खुद को मिलाने के लिए अतिरिक्त फ्लोर बनवाने शुरू कर दिए। इसका नतीजा ये हुआ कि गांव वालों की आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव नजर आने लगे। पूर्व प्रधान ने बताया कि हम में से कई लोगों ने सरकारी नौकरी की थी। लोगों ने ऐसा 1960 में डीडीए द्वारा जमीनों के अधिग्रहण के बाद किया लेकिन इस नए बदलाव के बाद हमने एयर कंडीशनर लगाए, अपने बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में भेजा, महंगी गाड़ियां खरीदीं और गांव के अधिकतर लोगों ने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी।
 


शुरुआत में, हौज खास विलेज का कॉन्सेप्ट किसी परीकथा जैसा लगता था क्योंकि यह भारत के गांवों की परंपरा के एकदम उलट था। फिल्ममेकर आयशा सूद ने बताया कि विकास और संपन्नता यहां सच होते दिखाई देने लगे थे। इस गांव के मूल निवासी 3 लोग थे। इसमें जाटों को सबसे अधिक फायदा मिला। इनकी ज्यादातर प्रॉपर्टीज मेन रोड पर ही थीं। 2 अन्य समुदाय मुस्लिम राजपूत और बाल्मीकि (हरिजन) इस विकास के बेहद छोटे हिस्से के भागीदार बने। यहां के वास्तविक निवासी मुस्लिम राजपूतों ने, इस नए हौज खास विलेज से निकल कर खुद को अन्यत्र भी स्थापित किया। गांव के एक निवासी शमशेर खान ने एक वेबसाइट को बताया था कि जाटों की संपत्ति से इतर, हमारी संपत्तियां गांव के अंदर थीं जिसमें युवा पेशेवर लोग और मजदूर बेहद कम दामों पर रहने के लिए आया करते थे।
 
दूसरी तरफ बीना रमानी अपने साथ डिजाइनर्स, आर्टिस्ट्स और फैशन के दीवाने लोगों का जत्था हौज खास विलेज लेकर आईं और दो दशक तक इसी बिरादरी ने हौज खास की पहचान को बनाए भी रखा है। यहां गांव वाले एमएफ हुसैन की कहानियां आज भी कहते हैं। किस तरह महान चित्रकार हुसैन गांव में नंगे पांव घूमा करते थे। हालांकि, वक्त बीतने के साथ साथ और कीमतें बढ़ने के साथ साथ छोटे आर्टिस्ट और डिजाइनर इस मार्केट के साथ खुद को बनाए नहीं रख सके। फिल्ममेकर और जामुन स्टूडियो की मालकिन, आयशा सूद की मां ने गांव में एक बिल्डिंग खरीदी थी। आयशा महसूस करती हैं कि ये निर्माण अपने वक्त से पहले के थे। उन्होंने कहा कि शुरुआत में हौज खास विलेज का कॉन्सेप्ट ही किसी परिकथा जैसा था।
 
आयशा ने आगे बताया कि एक वक्त के बाद मैंने तय किया कि अपना फिल्म स्टूडियों यहां बनाऊंगी। ये साल 2000 का शुरुआती दौर था। ये जगह मरणासन्न जैसी हो चुकी थी क्योंकि पहली पीढ़ी यहां से जा चुकी थी। नाम बदलने की शर्त पर कामाक्षी तलवार, जो कुछ साल यहां रही हैं, उन्होंने बताया कि सील होने से पहले बिस्त्रो ने कई अच्छे क्लाइंट्स यहां लाने में मदद की और उन्होंने हमारे बिजनेस को सराहा भी। ये एक टूरिस्ट मार्केट भी हुआ करता था और हम अपने क्लाइंट्स और विदेशी पर्यटकों से काफी खुश रहा करते थे लेकिन धीरे धीरे बाजार नीरस होता चला गया।
 
हौज खाज में बिजनेस चलाने वालों के लिए सब कुछ अच्छा है, ऐसा नहीं है। बीते कुछ सालों में संपत्ति के मालिकों और किरायेदारों के बीच रिश्ते तेजी से बदले हैं। गाढ़ी कमाई के लालच में मालिकों ने लीज की अवधि घटानी शुरू कर दी है और पहले जहां किसी तरह का औपचारिक समझौता नहीं हुआ करता था, अब हर चीज समझौते से ही तय होने लगी है। इसने कारोबार को प्रभावित भी किया है। पुराने लोग ये मानते हैं कि कैफे और पब्स ही हौज खास की पहचान बन चुके हैं। Gunpowder के Satish Warrier ने बताया कि लोग इसे हैपनिंग प्लेस के रूप में जानते हैं लेकिन यहां cultural fabric अब रहा ही नहीं है। वह याद करते हैं कि “yuppies” से पहले ये सचमुच एक शांत जगह हुआ करती थी जहां कोई भी आकर शांति से कुछ पल बिता सकता था लेकिन अब अमीर घरों के बच्चे बड़ी बड़ी महंगी गाड़ियों में यहां आते हैं और पैसे का खेल चलता है।
 
लाल डोरा होने की वजह से हौज खास लंबे वक्त तक एमसीडी के रडार पर नहीं आया था। इस चीज ने संपत्ति की बिक्री और उसके नए सिरे से निर्माण को फ्री फॉर ऑल जैसा बनाया हुआ था। लेकिन नए निर्माण में बुनियादी सुरक्षा मानकों का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। सड़कें बेहद संकरी हैं, बिल्डिंग थ्री स्टोरी के मानक से ऊंची बनने लगीं और उसमें उम्दा कंस्ट्रक्शन मटीरियल का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसके अतिरिक्त, ये फिरोज शाह तुगलक मकबरे और मदरसे से लगा हुआ है इसलिए इमारतों ने सीधा सीधा आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के नियमों को ताक पर रख दिया, जिसमें कहा गया है कि किसी भी संरक्षित इमारत के 100 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता है। विलेज में कुप्रबंधन ने इसे चांदनी चौक का आधुनिक वर्जन बनाकर रख दिया है।
 
एक फ्रेंच नागरिक Pio Coffrant ने यहां का पहला होटल The Rose शुरू किया था। वह महसूस करते हैं कि हौज खास ने अपनी खुद की संस्कृति विकसित की है। आज वह मानते हैं कि जिस हिसाब से यहां कीमतें बढ़ रही हैं वह जल्द ही क्रैश होने वाली हैं। उन्होंने कहा कि बेहद अधिक कमर्शलाइजेशन की वजह से ये रियल एस्टेट का गुब्बारा नजर आने लगा है और यहां सहजता नहीं रह गई है।
 
जबकि समुदायों ने अपने सांस्कृतिक चरित्र को बनाए रखने की कोशिश की है, पीढ़ी के बीच का टकराव यहां साफ दिखाई देता है। लाला आगे कहते हैं कि अगर आप करीब से देखेंगे तो पाएंगे कि गांव में सांस्कृतिक असमानताएं अधिक हैं। पुरानी पीढ़ी जहां अपने तरीकों में बंधी नजर आती है, नई पीढ़ी एक पैंपरिंग से भरे जीवन से होकर गुजर रही है। इन दोनों के बीच में नई बिजनेस वाली मिडिल क्लास का जन्म हो रहा है। गांव के ही शमशेर खान ने बताया कि जिंदगी अपरिवर्तनीय थी लेकिन वक्त के साथ हमें सांस्कृतिक अडजस्टमेंट्स करने पड़े। नए बदलाव और लाइफस्टाइल ने शुरुआत में हमें चौंकाया था लेकिन ये लोग अच्छा पैसा लेकर आ रहे थे। शमशेर ने आखिर में कहा, सहते सहते हम सब कुछ सह गए।
 
 

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