विश्व बाघ दिवस: बाघ को बचाने के लिए घास को बचाना होगा

विश्व बाघ दिवस: बाघ को बचाने के लिए घास को बचाना होगा

प्रकृति एक चक्र में बंधी है। सब एक दूसरे से जुड़े हैं। शाकाहारी और मांसाहारी प्राणी अलग अलग हैं, किंतु उनमें एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं। बाघ, चीते, गुलदार, लकड़बघ्घे सब मांसाहारी प्राणी हैं। हिरन, नील गाय, खरगोश, लोमड़ी, आदि शाकाहारी हैं।

पूरी दुनिया में बाघों को बचाने की कवायद हो रही है। सबका ध्यान बाघ को बचाने की ओर तो है पर किसी का ध्यान वन की घास की ओर नहीं है। यह अब विलुप्त होने की कगार पर है। आज भारत के वनों में सबसे ज्यादा खतरा वन  की घास और पौधों को है, यदि वे न रहे तो बाघ भी नहीं रहेंगे।

प्रकृति एक चक्र में बंधी है। सब एक दूसरे से जुड़े हैं। शाकाहारी और मांसाहारी प्राणी अलग अलग हैं, किंतु उनमें एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं। बाघ, चीते, गुलदार, लकड़बघ्घे सब मांसाहारी प्राणी हैं। हिरन, नील गाय, खरगोश, लोमड़ी, आदि शाकाहारी हैं। दोनों अलग−अलग है किंतु दोनों के बिना एक दूसरे का अस्तित्व नहीं है। वन के शाकाहारी प्राणी घास, पेड़, पौधों को खाकर जीवित रहते हैं। मांसाहारी पशु शेर आदि का भोजन ये शाकाहारी वन्य प्राणी नील गाय, हिरन आदि ही हैं। यदि वन में शाकाहारी प्राणी न रहे तो मांसाहारी प्राणियों का जिंदा रहना असंभव हो जाएगा। मांसाहारी प्राणी मांस ही खाएंगे, घास, पेड़-पौधे नहीं।

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आज सबसे ज्यादा खतरा शाकाहारी प्राणी नीलगाय, हिरन आदि के भोजन घास को है। वनों में उग आई अमेरिकन प्रजाति की झाड़ी लैंटाना कैमरा, वन की इस घास को तेजी से खत्म करती जा रही है। यह पिछले कुछ साल में वनों में बड़ी तेजी से साथ बढ़ी है। आज हालत यह है कि यह देश के झाड़ी टाइगर रिजर्व के 40 प्रतिशत भाग में फैल चुकी है। एक स्टडी में यह बात प्रकाश में आई है कि लैंटाना कैमरा नामक घास देश के टाइगर रेंज के 40 प्रतिशत भाग को अपनी चपेट में ले चुकी है। इसने शिवालिक पहाड़ी, मध्य भारत और दक्षिण पश्चिम वन भाग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। देश का कुल वन आवरण 7,12,249 वर्ग किलोमीटर है। इस प्रजाति से अब लगभग 300,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय वनों को खतरा है।

बदलती जलवायु के अनुकूल होने की क्षमता के साथ, लैंटाना उच्च तापमान और नमी को सहन कर सकती है। यह पौधा, लैंटाना कैमरा, उष्णकटिबंधीय अमेरिका के मूल की एक झाड़ी है। इस पर सुंदर रंग बिरंगे फूल आते हैं। 1800 के दशक की शुरुआत में यह भारत में एक सजावटी पौधे के रूप में पहुंचा। लैंटाना बगीचों में लगी और जल्दी ही सारे में फैल गई। आज यह अकेली भारत की बाघ वन के 40 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर चुकी है। लैंटाना की कई संकर किस्में भारत में लाई गईं और इसकी शुरूआत के 200 वर्षों में, किस्मों ने संक्रमण किया है। अब एक लकड़ी की बेल के रूप में पेड़ पर चढ़ने में सक्षम है। अब यह घनी बेल वन के अन्य पौधों को उलझाती है, और वन तल पर झाड़ी के रूप में फैलती है। इस झाड़ी की हालत यह है कि यह जहां उग आती है, आसपास के पेड़−पौधे और घास पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। सूखा और गर्मी भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। गर्मी में यह पूरी तरह सूख जाती है किंतु जरा सा पानी मिलते ही यह फिर हरी हो जाती है। बीस साल बाद भी यह हरी हो सकती है। 

वन अधिकारी इस झाड़ी के बढ़ाव को लेकर चिंतित हैं, उनकी समझ में इसका कोई उपाय नहीं आ रहा। यह झाड़ी बेंत की तरह होती है। कुछ जगह इसे पौधों से बेंत के फर्नीचर की भांति फर्नीचर बनाया गया किंतु इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रक्त बीज की तरह इसका पौधा दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है।

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बफर जोन, सफारी जोन से तो घास निकाली जा सकती है किंतु कोर जोन में तो बाहरी व्यक्ति का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहां किसी चीज से बिलकुल छेड़छाड़ नही हो सकती। ऐसे में लैंटाना को रोकना संभव नहीं है। आज वन्य प्राणियों के शहर की ओर आने और वन क्षेत्र में रहने वाले प्राणियों पर हमला करने की घटनाओं के पीछे का मन्तव्य भी यही है कि उन्हें सरलता से भोजन नहीं मिल रहा। उन्हें अब पेट भरने के लिए आबादी की ओर आना पड़ रहा है।

लैंटाना का आंतक अभी से प्रभाव दिखाने लगा है। आगे इससे और हालात खराब ही होंगे। ऐसे में बाघ संरक्षण और उसे बचाने के लिए चिंतन और कवायद के बीच हमें वन के शाकाहारी प्राणियों के भोजन घास को बचाने के उपाय और लैंटाना को खत्म करने पर विशेष ध्यान देना होगा।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)