सूर्य ग्रहण के दिन ही पड़ रहा है वट सावित्री व्रत, क्या ऐसे में पूजा करना संभव है ?

सूर्य ग्रहण के दिन ही पड़ रहा है वट सावित्री व्रत, क्या ऐसे में पूजा करना संभव है ?

सबसे पहले जानते हैं कि क्या सूर्य ग्रहण का भारत में असर होगा। देखा जाये तो इस साल का पहला सूर्य ग्रहण दस जून को पड़ने जा रहा है और यह भारत में केवल अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के कुछ हिस्सों में ही सूर्यास्त से कुछ समय पहले दिखाई देगा।

अखण्ड सौभाग्य प्रदान करने वाला वट सावित्री व्रत इस बार 10 जून, 2021 को पड़ रहा है। 10 जून को ही चूँकि इस साल का पहला सूर्य ग्रहण भी पड़ रहा है ऐसे में अधिकांश महिलाओं के मन में सवाल है कि ग्रहण के दौरान पूजन कैसे करेंगी क्योंकि ग्रहण काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं होता। इसके साथ ही ग्रहण से 12 घंटे पहले चूँकि सूतक लग जाता है और सूतक काल में भी पूजा-पाठ और शुभ कार्य नहीं होते तो वट सावित्री पूजन कैसे और किस समय होगा? आइये आपके मन की इन समस्याओं का निवारण किये देते हैं।

इसे भी पढ़ें: शनि जयंती का महत्व और पूजन विधि क्या है ? किन उपायों से प्रसन्न हो सकते हैं शनि देव ?

ग्रहण के दौरान पूजा से अनिष्ट तो नहीं होगा?

सबसे पहले जानते हैं कि क्या सूर्य ग्रहण का भारत में असर होगा और अगर होगा तो कितना होगा। देखा जाये तो इस साल का पहला सूर्य ग्रहण दस जून को पड़ने जा रहा है और यह भारत में केवल अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के कुछ हिस्सों में ही सूर्यास्त से कुछ समय पहले दिखाई देगा। खगोल विज्ञानियों के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में सूर्य ग्रहण शाम लगभग 5:52 बजे और लद्दाख के उत्तरी हिस्से में शाम लगभग छह बजे के आसपास देखा जा सकेगा। सूर्य ग्रहण भारत, अमेरिका, यूरोप और एशिया में आंशिक रूप से ही दिखाई देगा जबकि उत्तरी कनाडा, रूस और कुछ अन्य देशों में पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देगा। भारत में चूँकि आंशिक सूर्य ग्रहण ही है इसीलिए हिंदू मान्यताओं और हिंदू पंचांग के अनुसार महिलाएँ इस दिन वट सावित्री व्रत का पूजन पूर्ण विधि-विधान के साथ कर सकती हैं। महिलाओं के पूजन से किसी भी प्रकार का दोष नहीं लगेगा। हाँ, यदि संभव हो तो भोर में ही पूजन करें।

वट सावित्री व्रत का महत्व

वट सावित्री व्रत को सौभाग्य देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। सावित्री ने इस व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज से छुड़ाया था।

वट सावित्री व्रत के दिन पूजा कैसे करें

वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की मूर्ति स्थापित कर पूजा करनी चाहिए तथा बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए। पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप होनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींच कर तने को चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद सत्यवान−सावित्री की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकालकर उस पर यथाशक्ति रुपए रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिएं।

वट सावित्री व्रत की कथा

मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित संतान के लिए सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया। सर्वगुण संपन्न देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घर कन्या के रूप में जन्म लिया। कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दिया। सावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसी दिन महर्षि नारद उनके यहां पधारे। नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहा कि महाराज द्युमत्सेन जिनका राज्य हर लिया गया है, जो अंधे हो गए हैं और अपनी पत्नी सहित वनों की खाक छानते फिर रहे हैं, उन्हीं के इकलौते पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है। नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भूरि−भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुरझा गया। उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परंतु सावित्री ने उत्तर दिया कि आर्य कन्या होने के नाते जब मैं सत्यवान का वरण कर चुकी हूं तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नहीं दे सकती।

इसे भी पढ़ें: सूर्यग्रहण भारत में कहाँ दिखाई देगा ? ग्रहण काल के दौरान क्या करना चाहिए ?

सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों का विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी। नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारदजी द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकड़ी काटने जंगल के लिए चला तो सास−श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी। सत्यवान जंगल में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चढ़ने के बाद उसके सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड़ के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जांघ पर रख लिया। देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्माजी के विधान की रूपरेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये। 'कहीं−कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डंस लिया था।' सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे−पीछे चल दी। पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। इस पर वह बोली महाराज जहां पति वहीं पत्नी। यही धर्म है, यही मर्यादा है।

सावित्री की धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले कि पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी मांग लो। सावित्री ने यमराज से सास−श्वसुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु मांगी। यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए। सावित्री यमराज का पीछा करती रही। यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापस लौट जाने को कहा तो सावित्री बोली कि पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान मांगने के लिए कहा। इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की। तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये। सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही। इस बार सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं मां किस प्रकार बन सकती हूं। अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए।

सावित्री की धर्मनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया। सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा। प्रसन्नचित सावित्री अपने सास−श्वसुर के पास पहुंची तो उन्हें नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई। इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया। आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार चारों दिशाएं सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं।

-शुभा दुबे







This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept