Gyan Ganga: भगवान ने गीता में कहा है- कर्म के अनुसार ही व्यक्ति बार-बार जन्म-मरण का फल भोगता है

Gyan Ganga: भगवान ने गीता में कहा है- कर्म के अनुसार ही व्यक्ति बार-बार जन्म-मरण का फल भोगता है

वह परमात्मा सभी ओर से हाथ-पाँव वाला है, वह सभी ओर से आँखें, सिर तथा मुख वाला है, वह सभी ओर सुनने वाला है और वही संसार में सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर स्थित है। कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान किसी भी प्राणी से दूर नहीं हैं। भगवान में सब जगह सब कुछ है।

जिस तरह थोड़ी-सी औषधि भयंकर रोगों को शांत कर देती है, उसी तरह भगवान की थोड़ी-सी स्तुति और प्रार्थना हमारे दुख-दर्द तथा दोषों का भी नाश कर देती है। पिछले अंक में हमने पढ़ा कि यदि हमारे व्यवहार और वृति में कोई दोष हो तो उसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। यदि कोशिश करने के बावजूद भी दूर न हो सके तो प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए।

आइए ! आगे के गीता प्रसंग में चलते हैं---

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अर्जुन के पूछने पर भगवान तेरहवें अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विवेक की चर्चा करते हैं--- 

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥

श्री भगवान ने कहा- हे कुन्तीपुत्र ! यह शरीर ही क्षेत्र (कर्म-क्षेत्र) कहलाता है और जो इस क्षेत्र को जानने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कहलाता है। भगवान के कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार खेत में जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही अनाज पैदा होता है, ठीक उसी प्रकार इस शरीर से जैसे कर्म किए जाते हैं उन कर्मों के अनुसार ही जीव को फल प्राप्त होते हैं। कर्म के अनुसार ही व्यक्ति बार-बार सुख-दुख और जन्म-मरण का फल भोगता है। इसीलिए इस शरीर को क्षेत्र अर्थात् खेत कहा गया है।  

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥

हे भरतवंशी अर्जुन ! तुम इन सभी शरीर रूपी क्षेत्रों का ज्ञाता मुझे ही समझो। मेरे विचार के अनुसार इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ही सच्चा ज्ञान कहलाता है।

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌ ।

ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥

इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से वैदिक ग्रंथो में वर्णन किया गया है एवं वेदों के मन्त्रों द्वारा भी अलग-अलग प्रकार से गाया गया है और इसे विशेष रूप से वेदान्त में नीति-पूर्ण वचनों द्वारा कार्य-कारण सहित भी प्रस्तुत किया गया है। 

महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।

इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः ।

एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌ ॥

हे अर्जुन! यह क्षेत्र (शरीर) पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), अहंकार, बुद्धि, प्रकृति के अव्यक्त तीनों गुण (सत, रज, और तम), दस इन्द्रियाँ (कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक, हाथ, पैर, मुख, उपस्थ और गुदा), एक मन, पाँच इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध)। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, चेतना और भावनाओं का पिण्ड है जिसे हम शरीर कहते हैं।  

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ ।

आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥

अब भगवान पाँच श्लोकों में हम शरीर धारी मनुष्यों को शिक्षा देते है कि इस संसार में हमारी जीवन शैली कैसी होनी चाहिए---

विनम्रता (मान-अपमान के भाव का न होना), दम्भहीनता (कर्तापन अर्थात् मैंने किया है के भाव का न होना), अहिंसा (किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाने का भाव), क्षमाशीलता (सभी अपराधों के लिये क्षमा करने का भाव), सरलता (सत्य को न छिपाने का भाव), पवित्रता (मन और शरीर से शुद्ध रहने का भाव), गुरु-भक्ति (श्रद्धा सहित गुरु की सेवा करने का भाव), दृढ़ता (संकल्प में स्थिर रहने का भाव) और आत्म-संयम (इन्द्रियों को वश में रखने का भाव)। 

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌ ॥

इन्द्रिय-विषयों (शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श) के प्रति वैराग्य का भाव, मिथ्या अहंकार  न करने का भाव, जन्म, मृत्यु, बुढा़पा, रोग, दुःख और अपनी बुराइयों का बार-बार चिन्तन करने का भाव।

असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु ।

नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥

पुत्र, स्त्री, घर और अन्य सांसरिक वस्तुओं के प्रति आसक्त न होने का भाव, शुभ और अशुभ की प्राप्ति पर भी निरन्तर एक समान रहने का भाव।

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥

मेरे अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को प्राप्त न करने का भाव, बिना विचलित हुए मेरी भक्ति में स्थिर रहने का भाव, शुद्ध एकान्त स्थान में रहने का भाव और सांसारिक भोगों में लिप्त मनुष्यों के प्रति आसक्ति के भाव का न होना।

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अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ ।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥

निरन्तर आत्म-स्वरूप में स्थित रहने का भाव और तत्व-स्वरूप परमात्मा से साक्षात्कार करने का भाव। वास्तव में इन्हीं सब को ज्ञान कहा गया है, इनके अतिरिक्त जो भी है वह अज्ञान है।

ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥

अब भगवान अपने परम-ब्रह्म स्वरूप को बताते हुए कहते हैं--- हे अर्जुन! इस जगत में जो जानने योग्य है, उसके विषय में बताता हूँ जिसे जानकर मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य अमृत-तत्व को प्राप्त होता है, जिसका जन्म कभी नही होता है जो मेरे अधीन रहता है, वह न तो कर्ता है और न ही कारण है, उसे परम-ब्रह्म (परमात्मा) कहा जाता है।

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌ ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥

वह परमात्मा सभी ओर से हाथ-पाँव वाला है, वह सभी ओर से आँखें, सिर तथा मुख वाला है, वह सभी ओर सुनने वाला है और वही संसार में सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर स्थित है। कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान किसी भी प्राणी से दूर नहीं हैं। भगवान में सब जगह सब कुछ है। 

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌ ॥

वह परमात्मा चर-अचर सभी प्राणियों के अन्दर और बाहर भी स्थित है, अति-सूक्ष्म होने के कारण उसे इन्द्रियों के द्वारा नही जाना जा सकता है, वह अत्यन्त दूर स्थित होने पर भी सबके पास भी है।

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ ।

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥

वह परमात्मा सभी प्राणियों में अलग-अलग स्थित होते हुए भी एक रूप में ही स्थित रहता है, यद्यपि वही समस्त प्राणियों को ब्रह्मा-रूप से उत्पन्न करता है, विष्णु-रूप से पालन करता है और रुद्र-रूप से संहार करता है।

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कुछ मनुष्य ध्यान-योग में स्थित होकर परमात्मा को अपने अन्दर हृदय में देखते हैं, कुछ मनुष्य वैदिक कर्मकाण्ड के के द्वारा और अन्य मनुष्य निष्काम कर्म-योग द्वारा परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।

तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥

कुछ ऐसे भी मनुष्य हैं जो आध्यात्मिक ज्ञान को नहीं जानते है परन्तु वे महापुरुषों से परमात्मा के विषय में भागवत कथा आदि सुनकर उपासना करने लगते हैं, परमात्मा के विषय में सुनने की इच्छा करने के कारण वे भी मृत्यु रूपी संसार-सागर को निश्चित रूप से पार कर जाते हैं। 

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ॥

जो मनुष्य सभी चर-अचर प्राणियों में समान भाव से एक ही परमात्मा को समान रूप से देखता है वह अपने मन के द्वारा अपने आप को कभी नष्ट नहीं करता है, इस प्रकार वह मेरे परम-धाम को प्राप्त करता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे अपना पतन न करे। भगवान को प्राप्त करने वाला भक्त नाच उठता है और गाने लगता है----

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...

वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा करी अपनायो

जनम जनम की पूँजी पाई जगमें सभी खोवायो

खरचै न खूटै, चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो

सत की नाव, खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर हरख हरख जस गायो

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु--------

जय श्री कृष्ण----------

- आरएन तिवारी