Gyan Ganga: संसार के भय से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं भगवान

Gyan Ganga: संसार के भय से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं भगवान

प्रभु को सामने देखकर ध्रुव उनकी स्तुति करना चाहते थे, परंतु किस प्रकार करें यह नहीं जानते थे। सर्व अंतर्यामी भगवान उनके मन की बात जान गए, उन्होंने कृपा पूर्वक अपने वेदमय शंख को ध्रुव जी के गाल से स्पर्श करा दिया। शंख का स्पर्श होते ही उन्हें दिव्यवाणी प्राप्त हो गई।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥ 

प्रभासाक्षी के श्रद्धेय पाठकों ! आज-कल हम सब भागवत कथा सरोवर में गोता लगा रहे हैं। 

पिछले अंक में हमने पढ़ा था कि– घर से ध्रुव के निकल जाने के बाद उत्तानपाद पुत्र वियोग में बहुत दुखी हुए, उन्हें अपने पुत्र की चिंता सताने लगी। नारद जी ने सांत्वना देते हुए कहा- हे राजन ! तुम अपने बेटे की चिंता मत करो उसके रक्षक भगवान हैं। 

आइए ! अब आगे की कथा प्रसंग में चलते हैं—

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इधर बालक ध्रुव जी कठोर तपस्या करने लगे। भागवत में लिखा है कि ध्रुव ने पाँच महीने तक निश्चल भाव से अपनी समस्त इंद्रियों को अवरुद्ध करके एक पैर पर खड़े होकर घोर तपस्या की उनकी तपस्या के प्रभाव से सम्पूर्ण चराचर ब्रह्मांड हिलने लगा। सभी जीवों का श्वास-प्रश्वास रुक गया। स्वर्ग के सभी देवता डर गए और दौड़ते हुए भगवान की शरण में पहुंचे। भगवान ने सभी देवताओं को आश्वासन देकर विदा किया। इधर ध्रुव ने अंत:करण से प्रभु को पुकारा--- 

नाम तुम्हारा तारनहारा कब तेरा दर्शन होगा 

जिसकी रचना इतनी सुंदर वो कितना सुंदर होगा॥

ध्रुव जी महाराज की अनन्य भक्ति और घोर तपस्या देखकर भगवान नारायण गरुण पर सवार होकर ध्रुव के पास आए। ध्रुवजी को दर्शन लाभ दिया। 

सामने प्रभु का दर्शन पाय, गिरे झट चरणों में अकुलाय हर्ष से अंग-अंग मुसकाय ॥  

प्रभु को सामने देखकर ध्रुव उनकी स्तुति करना चाहते थे, परंतु किस प्रकार करें यह नहीं जानते थे। सर्व अंतर्यामी भगवान उनके मन की बात जान गए, उन्होंने कृपा पूर्वक अपने वेदमय शंख को ध्रुव जी के गाल से स्पर्श करा दिया। शंख का स्पर्श होते ही उन्हें दिव्यवाणी प्राप्त हो गई और वे अनन्य भाव से भगवान की प्रार्थना करने लगे।

हे प्रभो! आप सर्वशक्ति सम्पन्न हैं। मैं आप अंतर्यामी भगवान को प्रणाम करता हूँ। इस प्रकार द्वादश अक्षर के मंत्र से प्रसन्न होने वाले भगवन नारायण की स्तुति द्वादश श्लोकों में की। आइए हम सब भी मिलकर ध्रुव स्तुति का गायन करें। 

योन्त: प्रविष्य मम वाच मिमां प्रसुप्ताम 

संजीवत्य खिलशक्ति धर: स्व धाम्ना ।   

अन्यांच हस्तचरण श्रवणत्वगादीन्

प्राणान्नमो भगवते पुरूषाय तुभ्यम्।।

कल्पान्त एतदखिलम जठरेण गृहणन 

शेते पुमान स्वदृगनन्त सखस्तदंके । 

यन्नाभिसिंधुरूहकांचनलोकपद्म॥  

हे प्रभो! आप परम आनंदमूर्ति हैं। जैसे की गाय अपने तुरंत के जन्मे हुए बछड़े को दूध पिलाती है और जंगली हिंसक जानवरों से उसकी रक्षा करती है, उसी प्रकार आप भी इस संसार के भय से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। पाँच वर्ष के छोटे बालक ने कितना पवित्र उदाहरण दिया। बड़ी देर तक देखने के बाद प्रभु मुस्कुराए जब भगवान मुस्कुराए तो ध्रुव जी हँसने लगे, दोनों की हँसी देखकर स्वर्ग के देवता भी हँसने लगे। इन तीनों को देखकर परम हंस शुकदेव जी भी हँसने लगे। अब इन चारों की हँसी देखकर परीक्षित भी हँसने लगे। अब इन पाँचों की हँसी देखकर वहाँ उपस्थित साधु-संत श्रोता गण भी हँसने लगे। आइए ! हम भी हँसे और मुस्कुराएँ तथा हँसने का कारण ढुढ़ते हैं। ध्रुव की अनन्य भक्ति देखकर भगवान मुस्कुराए, अपनी तपस्या की सफलता पर ध्रुव मुस्कुराए, शुकदेव जी इसलिए मुस्कुराए कि उन्हे गोविंद मिल गए हैं। “नन्द नन्दन रूपस्तु श्री शुको भगवानृषि” परीक्षित इसलिए हँसे कि कथा के माध्यम से उन्हें भगवान के दर्शन हो गए और अमृत रूपी कथा का पान करके श्रोता गण हँसे। 

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प्रसन्न होकर प्रभु ने कहा- हे राजकुमार ध्रुव ! मैं तुम्हारे हृदय का संकल्प जानता हूँ यद्यपि उस पद को प्राप्त करना बहुत कठिन है फिर भी तुम्हारे तप और स्तुति से प्रसन्न होकर तुम्हें वह ध्रुव लोक प्रदान करता हूँ, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नहीं किया। इस धरा धाम पर तुम छतीस हजार वर्ष तक धर्मपूर्वक राज करोगे और अंत में सप्तर्षियों से भी ऊपर मेरे निज धाम को जाओगे। जहाँ पहुँचने पर फिर संसार मे लौट कर आना नहीं पड़ता। ध्रुव को अपना परम पद प्रदान कर भगवान श्री गरुण ध्वज उसके देखते ही देखते अपने लोक को चले गए।  

बोलिए ध्रुव जी महाराज की जय। 

हमारे संत-महात्माओं ने बिलकुल सच कहा है--

भजन—

चढ़े गजराज चतुरंगिनी समाज संग 

जीति क्षितिपाल सुरपाल सो सजत है 

विद्या अपार पढ़ि तीरथ अनेक करि 

यज्ञ और दान बहु भांति सो करत है 

तीन काल में नहाय इंद्रियों को वश लाय 

करि वनवास विष वासना तजत है 

योग और यज्ञ जप तप को अनेक करे 

बिना भगवंत भक्ति भव ना तरत है॥

रामचरित मानस के गायक गोस्वामी जी भी भक्ति का महत्व बताते हुए रामचरितमानस में कहते हैं-

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे, लवण बिना बहु व्यंजन जैसे। 

इधर ध्रुव जी अपने राज्य में आकार पिता के चरणों में प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर कुशल क्षेम पूछकर दोनों माताओं को भी प्रणाम किया। छोटी माता सुरुचि ने अपने चरणों पर झुके हुए बालक ध्रुव को उठाकर हृदय से उसी तरह से लगा लिया जिस तरह से चौदह वर्ष के बाद जंगल से लौटने पर भगवान श्री राम को कैकई ने लगा लिया था और गदगद वाणी से चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दिया था। ध्रुव की माता सुनीति अपने प्राण प्यारे पुत्र को गले लगाकर सारा संताप भूल गई। ध्रुव के सुकुमार और दिव्य अंगों के स्पर्श से उसे बड़ा ही आनंद प्राप्त हुआ। 

ध्रुव चरित्र की कथा का बड़ा सुंदर संदेश- जिस प्रकार जल अपने आप ही नीचे की ओर बहने लगता है उसी प्रकार मैत्री और नम्रता आदि गुणों के कारण जिस पर भगवान प्रसन्न हो जाते हैं उसके आगे सभी जीव झुक जाते हैं।    

           

क्रमश: अगले अंक में...

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव...

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

-आरएन तिवारी