'जोता वाली मंदिर' जहाँ होती है हर मुराद पूरी, जानें इस मंदिर की महत्ता

  •  विंध्यवासिनी सिंह
  •  अक्टूबर 24, 2020   11:47
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'जोता वाली मंदिर' जहाँ होती है हर मुराद पूरी, जानें इस मंदिर की महत्ता

कहा जाता है कि एक बार मुगल शासक अकबर ने मां ज्वाला के इस चमत्कार को सुना तो वह अपनी पूरी सेना को लेकर माता के मंदिर में पहुंच गया और जोतों को बुझाने की कोशिश करने लगा। लेकिन अकबर की पूरी सेना मिलकर माता रानी की ज्वाला को बुझा नहीं पाई।

नवरात्रों का आरंभ हो चुका है और हम इस दौरान देवी माता की कई रूपों में पूजा करते हैं। वहीं आज हम माता रानी के एक ऐसे मंदिर के बारे में बात करेंगे, जिसकी जोत कभी नहीं बुझती है। इस मंदिर को 'जोता वाली मंदिर' कहते हैं और यह मां भवानी के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर को ज्वालामुखी मंदिर के नाम से पूरी दुनिया जानती है।

मंदिर को लेकर क्या है पौराणिक कथा?

पुराणों के अनुसार एक बार राजा दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया और उसमें उन्होंने अपनी 60 कन्याओं को निमंत्रण दिया। विचित्र बात यह थी कि भगवान शिव से नाराजगी के कारण उन्होंने अपनी पुत्री सती को यज्ञ के लिए निमंत्रण नहीं दिया था।

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बावजूद बिना निमंत्रण के, देवी सती पिता का घर समझकर बिना बुलाए वहां पहुंच जाती हैं। जब यज्ञ-स्थल पर माता सती पहुंचती है, तो वहां राजा दक्ष के द्वारा लगातार भगवान शिव का अपमान किए जाने को लेकर वह बेहद दुखी होती हैं और हवन कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग देती हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव माता सती के देहत्याग से विचलित हो गए थे और उनके मृत शरीर को लेकर तीनों लोकों में घूमते रहे। इस दौरान माता सती के शरीर के अंग 51 जगह गिरे और उन्हें 51 शक्तिपीठों के रूप में जाना जाता है। वहीं माता सती की जिह्वा जिस स्थान पर गिरी वह स्थान 'ज्वालामुखी मंदिर' के नाम से जाना जाता है।  

9 जोतों के जलने की कथा

कहा जाता है कि ज्वालामुखी मंदिर में 9 जोतें जलती हैं, जो क्रमशः माता के नौ रूपों का प्रतीक हैं। इनमें से जो सबसे बड़ी जोत जलती है, उसे ज्वाला माता का रूप माना जाता है और अन्य 8 जोतों को मां अन्नपूर्णा, मां चंद्रघंटा, मां विंध्यवासिनी, मां महालक्ष्मी, मां हिंगलाज माता, मां सरस्वती, मां अंबिका और माँ अंजी के रूप में पूजा जाता है।

इन ज्वालाओं के जलने के पीछे एक और कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार एक बार माता ज्वाला के प्रचंड भक्त बाबा गोरखनाथ माता की तपस्या में लीन थे। तभी गोरखनाथ को जोरों की भूख लगती है और वह माता को यह कह कर बाहर चले जाते हैं कि हे माता में भिक्षा मांग कर खाने के लिए कुछ ले आता हूं तब तक आप पानी गर्म करके रखें भोजन पकाने के लिए। कहा जाता है कि गोरखनाथ भिक्षा मांगने गए तो वापस नहीं लौटे और तभी से उनकी प्रतीक्षा में यह ज्वाला जल रही है। 

ऐसा भी कहा जाता है कि कलयुग के अंत तक गोरखनाथ लौटकर आएंगे तब तक उनके प्रतीक्षा में यह ज्वाला जलती रहेगी।

अकबर ने की थी ज्वाला बुझाने की कोशिश

कहा जाता है कि एक बार मुगल शासक अकबर ने मां ज्वाला के इस चमत्कार को सुना तो वह अपनी पूरी सेना को लेकर माता के मंदिर में पहुंच गया और जोतों को बुझाने की कोशिश करने लगा। लेकिन अकबर की पूरी सेना मिलकर माता रानी की ज्वाला को बुझा नहीं पाई। 

अंत में अकबर को माता रानी की शक्ति का एहसास हुआ और उसने माता रानी के मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाने का निश्चय किया लेकिन माता रानी ने अकबर के इस चढ़ावे को अस्वीकार कर दिया और सोने का छत्र गिरकर किसी अनजान धातु में तब्दील हो गया और तब से लेकर अब तक उस धातु का पता नहीं लगाया जा सका है।

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कैसे पहुंचे माता के धाम?

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। यहाँ पठानकोट, दिल्ली, शिमला आदि प्रमुख शहरों से सीधे बस, टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है। यहाँ पहुँचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट गगल में है, जो कि ज्वालाजी से 46 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। नजदीकी रेलवे स्टेशन की बात करें तो पालमपुर नजदीकी स्टेशन है।

कहा जाता है कि माता के मंदिर में जो भी सच्चे मन से मांगता है उसकी हर मुराद पूरी हो जाती है।

- विंध्यवासिनी सिंह







Gyan Ganga: गीता में भगवान ने कहा है- मुझे याद करो लेकिन सांसारिक कर्म भी करते रहो

  •  आरएन तिवारी
  •  मार्च 5, 2021   18:03
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Gyan Ganga: गीता में भगवान ने कहा है- मुझे याद करो लेकिन सांसारिक कर्म भी करते रहो

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! तुम हर समय मेरा स्मरण करते हुए अपने सांसारिक कर्मों को भी करते रहो और युद्ध भी करो। इस समय युद्ध करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। अपने मन और बुद्धि को मुझमें लगाकर मेरे शरणागत हो जाओ। तू निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगा।

प्रभासाक्षी के सहृदय पाठकों ! प्रेम की भावना मनुष्य को कभी हारने नहीं देती और नफरत की भावना कभी जीतने नहीं देती। हमें अपने जीवन में प्रेम को सर्वोपरि रखना चाहिए। 

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं-

पिछले अंक में हमने पढ़ा कि प्रेम तत्व को समझने वाला सच्चा साधक ही भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हो सकता है। अर्जुन ने प्रश्न किया था, हे परम पिता परमेश्वर! मनुष्य अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आपको कैसे जान सकता है? उसके जवाब में भगवान कहते हैं-

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श्री भगवान उवाच 

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ ।

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ 

हे कुंती नन्दन अर्जुन! जो मनुष्य जीवन के अंत समय में मेरा ही स्मरण करता हुआ शारीरिक बन्धन से मुक्त होता है, वह मेरे ही भाव को अर्थात् मुझको ही प्राप्त होता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। हम मनुष्यों को भगवान ने एक विशेष छूट दे रखी है, मरणासन्न व्यक्ति के कैसे भी आचरण क्यों न हों, उसने किसी भी तरह का जीवन क्यों न बिताया हो, पर अंत समय में वह भगवान को याद कर ले तो उसका कल्याण हो जाएगा। श्रीमद्भागवत में अजामिल की एक बहुत ही प्यारी कथा आती है। उसने जीवनभर पाप का आचरण किया था, किन्तु मृत्यु के समय नारायण नाम का उच्चारण करने से वह बैकुंठलोक को गया था। भगवान ने मनुष्य का उद्धार करने के लिए ही जीव को मानव शरीर दिया है और जीव ने भी मानव शरीर को स्वीकार किया है। इसलिए जीव का उद्धार हो जाए, तभी भगवान का यह शरीर देना और जीव का यह मानव तन  लेना सफल होगा। परंतु वह अपना उद्धार किए बिना ही आज इस दुनिया से विदा हो रहा है, इसके लिए भगवान कहते हैं— “कि भैया ! तेरी और मेरी दोनों की इज्जत रह जाए, इसलिए अब जाते-जाते तू मुझको याद करता जाए। इसीलिए आज भी हमारे सनातन धर्म में मरणासन्न व्यक्ति को तुलसी और गंगा-जल दिया जाता है तथा राम नाम कहलवाया जाता है।

    

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ ।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ 

हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। अंत समय में हुए, चिन्तन के अनुसार ही अगले जन्म की प्राप्ति होती है। जिसका जैसा स्वभाव होता है, अंतकाल में वह वैसा ही चिन्तन करता है। राजा भरत जो बाद में जड़ भरत के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। उन्होंने शरीर छोड़ते समय एक मृग शिशु का चिन्तन किया था इसीलिए उनको दूसरे जन्म में मृग बनना पड़ा था। अब अगले श्लोक में बताते हैं कि, अंत समय में भगवान का स्मरण होने के लिए हमें क्या करना चाहिए।   

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च ।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌ ॥ 

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! तुम हर समय मेरा स्मरण करते हुए अपने सांसारिक कर्मों को भी करते रहो और युद्ध भी करो। इस समय युद्ध करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। अपने मन और बुद्धि को मुझमें लगाकर मेरे शरणागत हो जाओ। तू निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगा। गीता का यह शाश्वत संदेश, भगवान के स्मरण में हमें समय का विभाग नहीं करना चाहिए, भगवान का चिंतन और स्मरण तो सदा सर्वदा करते रहना चाहिए।

अब अपनी प्राप्ति का माहात्म्य बताते हुए भगवान कहते हैं--  

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌ ।

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ 

मुझे प्राप्त करके उस मनुष्य का इस दुख-रूपी क्षणभंगुर संसार में पुनर्जन्म कभी नही होता है, बल्कि वह महात्मा परम-सिद्धि को प्राप्त करके मेरे परम-धाम को प्राप्त होता है। पुनर्जन्म का अर्थ है- फिर से जन्म लेना। चाहे मनुष्य रूप में हो या पशु-पक्षी रूप में हो। पुनर्जन्म को दु:खालय अर्थात दु:खो का घर कहा गया है। जीव को नौ महीने तक मल-मूत्र से भरे हुए माँ के गर्भ में रहना पड़ता है। माँ के गर्भ से ही दु:ख का प्रारम्भ हो जाता है, जो मृत्यु पर्यन्त चलता रहता है। जन्म के बाद कोई भी कष्ट होने पर वह रोता रहता है। थोड़ा बड़ा होने पर खाने-पीने, खिलौने आदि की इच्छा पूरी न होने पर बड़ा दु:ख होता है। विद्यार्थी जीवन में कष्ट उठाकर पढ़ाई की चिंता बनी रहती है। परीक्षा में असफल होने पर कई विद्यार्थी आत्महत्या तक कर लेते हैं। जवान होने पर अपनी इच्छानुसार विवाह न होने पर दु:ख होता है। विवाह हो जाता है, तो मन मुताबिक पति अथवा पत्नी न मिलने से दु:ख होता है। बाल-बच्चे हो जाते हैं तो उनका पालन-पोषण करने में कष्ट होता है। लड़कियाँ बड़ी हो जाती हैं तो जल्दी विवाह न होने पर माँ-बाप की नींद उड़ जाती है। बुढ़ापे में अनेक प्रकार के रोग घेर लेते हैं। ठीक से उठने-बैठने, चलने-फिरने, और खाने-पीने में दु:ख होता है। रात में खाँसते–खाँसते हाल बेहाल हो जाता है। घर-परिवार के लोग भी मनाने लगते हैं, हे भगवान ! इनको जल्दी उठा लें। मरने के समय भी भयंकर कष्ट होते हैं। ऐसे दु:ख कहाँ तक गिनाएँ ? उनका कोई अंत नहीं, इसीलिए इस संसार को दु:खालय कहा गया है।

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आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

हे अर्जुन! इस ब्रह्माण्ड में जितने भी छोटे-बड़े लोक हैं, चाहे ब्रह्म-लोक हो, इंद्रलोक हो या देवलोक हो वहाँ जाने पर लौटकर आना ही पड़ता है। इन लोकों में सभी जीव जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं, किन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मुझे प्राप्त करके मनुष्य का पुनर्जन्म कभी नहीं होता है। अर्थात भग्वत्प्राप्ति का सुख अनंत है, अपार है, अगाध है। यह सुख कभी नष्ट नहीं होता, सदा बना रहता है।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌ ।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन ! जिसे वेदों और शास्त्रों में अव्यक्त अविनाशी के नाम से कहा गया है, उसी को परम-गति कहा जाता हैं जिसको प्राप्त करके मनुष्य कभी वापस नहीं आता है, वही मेरा परम-धाम है। इसलिए तो प्रभु ने स्पष्ट कहा— सर्वधर्मानपरित्यज्यमामेकम शरणमव्रज।

सच्चा साधक संसार के सभी प्रपंचों को छोड़कर भगवान के चरण कमलों में अपना चित्त लगाता है। मीराबाई ने क्या किया? सब कुछ छोड़कर नंदलाल को अपनी आँखों की पुतलियों में बसाकर गाने लगी और सदा के लिए अमर हो गईं...

बसों मेरे नैनन में नन्दलाल॥

मोहनी मुरती साँवली सूरती,

नैना बने विसाल,

अधर सुधारस मुरली राजत॥

उर वैजंति माल,

बसों मेरे नैनन में नन्दलाल..........   

भक्त और भगवान के इतिहास में इस तरह का उदाहरण बहुत कम मिलता है।  

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्री कृष्ण...

-आरएन तिवारी







Gyan Ganga: भगवान की किस बात को सुन कर बालि को ललकारने के लिए तैयार हुए सुग्रीव?

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 4, 2021   18:02
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Gyan Ganga: भगवान की किस बात को सुन कर बालि को ललकारने के लिए तैयार हुए सुग्रीव?

सुग्रीव बिखरे मन को संगठित करता है स्वयं को समझाता व उपदेश करता है। प्रभु के सामर्थ्य व बल का बार−बार स्मरण करते हुए अपने आत्म−विश्वास को प्रखर व अडिग बनाने का प्रयास करता है। और परिणाम यह निकलता है कि सुग्रीव बालि को ललकारने हेतु तैयार हो जाता है।

सुग्रीव के चरित्र से हम सब लोग भली−भांति अवगत हैं कि सुग्रीव भले ही बलवान हों। लेकिन वह बालि से इतना ज्यादा भयभीत हैं कि वह कंद्राओं में छुपकर रह रहे हैं। यह केवल सुग्रीव की ही गाथा नहीं है। अपितु संसार में समस्त जीव किसी न किसी भय से व्याप्त है। और भय जीव को भगाता है, दिन−रात उसके पीछे पड़ा रहता है। भय हमें रह रहकार अहसास करवाता है कि तू निर्बल है, असहाय एवं विवश है। ऐसे में जीव मानसिक रोगी बन जाता है। सुग्रीव जैसे ऋर्षयमूक पर्वत तक ही सिमटकर रह गया था। वैसे ही जीव भी अपने ही कपोल कल्पित विचारों की गुफा में सिकुड़ कर रह जाता है।

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श्रीराम जी से बस यही तो नहीं देखा जाता। वे कहते हैं कि हे जीव! तू यह कैसे भूल जाता है कि मैं जब तेरे साथ हूँ, मेरा बल तुझ पर न्योछावर है तो फिर तुझे किस से भय लगता है? हे सुग्रीव! मुझे अगर अपनी पत्नी ढूंढ़ने हेतु किसी समर्थ व बलवान साथी की कोई आवश्यकता होगी तो निश्चित ही मैं तुम्हारी अपेक्षा बालि का ही चयन करता। लेकिन मैंने बालि नहीं अपितु तुम्हारा चयन किया है क्योंकि मुझे किसी के बल की नहीं अपितु मेरे बल की किसी को आवश्यक्ता थी। और मेरे उस बल के अधिकारी तुम हो। और मैं कितने ऊँचे स्वर में कह रहा हूँ कि सुग्रीव तुम आगे बढ़ो। मैं और मेरा बल तुम्हारे पीछे खड़े हैं। आश्चर्य है कि बालि को अपने मिथ्या व अहं युक्त बल पर भी तनिक संदेह नहीं और तुम हो कि मेरा बल साथ पाकर भी भयभीत व विचलित हो। 

सुग्रीव अपने बिखरे मन को संगठित करता है स्वयं को समझाता व उपदेश करता है। प्रभु के सामर्थ्य व बल का बार−बार स्मरण करते हुए अपने आत्म−विश्वास को प्रखर व अडिग बनाने का प्रयास करता है। और परिणाम यह निकलता है कि सुग्रीव बालि को ललकारने हेतु तैयार हो जाता है। और श्रीराम जी को लगता है कि लो मैं अपने लक्ष्य भेदन में सफल हो गया। क्योंकि मेरा संग पाकर भी कोई निर्बल बना रहे तो फिर क्या लाभ। अधर्म, अनीति व अज्ञानता के सामने कोई व्यक्ति उठ खड़ा हो, बुराई को उसके द्वार पर जाकर ललकारे तो समझो समाज परिवर्तित होने वाला है। नई क्रांति का बिगुल बज उठा है और यूं मानो कि ऐसे अनाचारी के खिलाफ कदम उठ खड़े हुए तो युद्ध से पहले ही विजय का स्वाद चख लिया है। कदम नहीं उठाना ही गले में हार के हार को टांगे रखना होता है। और सुग्रीव जैसे दबे−कुचले जीवों का साहस लौट आना वास्तव में सुग्रीव की नहीं अपितु मेरी ही जीत है।

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केवल आज ही क्यों सतयुग में भी तो ऐसा ही घटित हुआ था। हिरण्यकश्यपु ने कैसे दहाड़ कर कहा था कि क्या प्रभु उस निर्जीव स्तंभ में भी हैं? उसके प्रहार की छूहन भर से मेरा उस स्तंभ में से नरसिंह अवतार प्रकट हो गया था। वह निर्जीव खंभा तो केवल संकेत मात्र था। क्योंकि निर्जीव तो वास्तव में सजीव प्राणी थे जो मुर्दों की भांति हिरण्यकश्यपु के अधर्म व पाप के मूक साक्षी बने हुए थे। लेकिन जीवन में जरा-सी एक चोट क्या लगी कि उसमें साहस व क्रांति का ऐसा नरसिंह प्रकट होता है कि हिरण्यकश्यपु रूपी अधर्म को नाश कर देता है। 

सुग्रीव का बालि के विरुद्ध उठ खड़ा होना एक नवीन सृजन की नींव है। क्यों मानव को लगता है कि मैं निर्बल हूँ? क्यों वह भूल जाता है कि मेरे पीछे ईश्वर का बल कार्य कर रहा है। जबकि मैं पल−पल जीव को संकेत करता हूँ कि देख तू पग−पग पर असमर्थ था। लेकिन मैंने किसी भी परिस्थिति में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा। माँ के गर्भ में जब तू नौ मास तक उल्टा लटका होता है, तो यह कोई कम प्रतिकूल स्थिति नहीं थी। तुझमें कहाँ यह बल था कि यह कष्ट सह पाते। शरीर के अंग भी ढंग से खुल नहीं पाते थे। कल्पना करो कि आज यद्यपि तुझमें शारीरिक क्षमता व बल भी अधिक है, अब अगर नौ मास तो क्या नौ क्षण भी ठीक वैसे ही उलटे लटकने को विवश कर दिया जाए तो तेरा क्या हाल हो तू इस कल्पना से ही सिहर उठेगा। वहाँ पर किसने तेरी रक्षा की? कभी सोचा भी है? जन्म हुआ तो शारीरिक क्षमता का असीम अभाव था। लाख स्वादिष्ट व्यंजनों के होने के बावजूद भी तेरे मुख में एक दांत तक नहीं था कि उन व्यंजनों का उपभोग कर सके। उसी समय माँ के आँचल में दूध आ जाना क्या ये मेरी प्रत्यक्ष कृपा का प्रमाण नहीं था? मुझे पता था कि धीरे−धीरे दूध के साथ−साथ तेरा अन्य भोज्य पदार्थों के सेवन का भी मन होता है तो मैंने तुझे नन्हें−नन्हें दांत दे दिए। तूने खूब छक कर सब कुछ खाया लेकिन सात−आठ वर्ष के आते−आते तेरे रूचिकर भोजन पदार्थों की सूची लंबी होती गई। जिसका सेवन करने में तेरे नन्हें दांतों का सामर्थ्य अभी सीमित था। तो मैंने सभी के सभी दांत झाड़ दिए और नए सिरे से पक्के दांत पुनः मोतियों की तरह तेरे मुख में जड़ दिए। 

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तेरी समस्त अक्षमताओं को अपनी क्षमता के बल से ढंकने की गाथा बड़ी लंबी व अनंत है। बस तेरे देखने भर की बात है। फिर देखना पग−पग पर भी बालि जैसे बाधक क्यों न बैठे हों, तू उन्हें चुटकियों में मसल सकता है। इसलिए हे जीव! तू किसी और का अंश नहीं अपितु मेरा ही अंश है। मैं जब किसी से भयभीत नहीं तो मेरा अंशी भला भयभीत क्यों हो? मैं पिता हूँ तो पुत्र पिता से अलग क्यों? तेरे हारने का कोई प्रश्न ही नहीं। उठ खड़ा हो और दूर कर दे अपनी प्रत्येक बाधा। प्रभु श्रीराम जी का आदेश प्राप्त कर सुग्रीव तो उठ खड़ा हुआ लेकिन क्या वह सफल हो पाता है? जानने के लिए अगला अंक जरूर पढ़ियेगा। क्रमशः... जय श्रीराम

-सुखी भारती







Gyan Ganga: श्रीराम की बात सुन कर क्यों सुग्रीव की आँखें आश्चर्य से फट गयी थीं

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 2, 2021   18:00
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Gyan Ganga: श्रीराम की बात सुन कर क्यों सुग्रीव की आँखें आश्चर्य से फट गयी थीं

अचानक प्रभु श्रीराम जी ने कुछ ऐसा कह डाला कि सुग्रीव के तो प्राण ही सूख गए। भय के मारे उसकी रूह ही कांप गई। क्योंकि श्रीराम जी ने सुग्रीव से वह कह डाला जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। अब सुग्रीव सोचने लगे कि करें तो क्या करें?

सुग्रीव ने जब देखा कि प्रभु श्रीराम जी तो बालि वध हेतु अडिग हैं और वे बालि को मारकर ही दम लेंगे। तो हो सकता है सुग्रीव ने फिर सोचा हो कि चलो कोई नहीं, अब बालि के मरने का समय आ ही गया होगा, तो कोई क्या कर सकता है? मन में वैराग्य होने के कारण सुग्रीव महान ज्ञानी होने का प्रदर्शन कर ही रहा था और उसे यह भलीभांति आश्वासन भी था कि चलो बालि श्रीराम जी के हाथों से मरेगा तो यह भी शुभ ही है। स्वयं को प्रत्येक क्रिया व परिस्थिति से तटस्थ मान, सुग्रीव को लग रहा था कि बस अभी श्रीराम जी अपना बाण निकालेंगे और बालि का दो क्षण में वध कर निवृत हो जाएंगे। और हमें तो दर्शक की भांति बस देखना ही है। फिर इसके पश्चात् न बालि होगा और न उसका भय। 

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सुग्रीव को यह सब बड़ा सरल व सीधा-सा प्रतीत हो रहा था। मानो हथेली पर लड्डू रखा है और बस उठाकर खा ही लेना है। शायद सुग्रीव के हृदय के किसी कोने में यह भाव भी हों कि चलो अच्छा ही हो रहा है कि बालि का जड़ से ही इलाज होने जा रहा है। और वह भी बड़े तरीके से। अब तो बालि वध का आक्षेप भी मुझ पर नहीं आएगा। क्योंकि मेरी इच्छा नहीं है फिर भी श्रीराम जी बालि का वध कर रहे हैं। तो उत्तरदायित्व भी श्रीराम जी पर ही आएगा। समाज में इसके द्वारा मेरा नाम भी कलंकित होने से बच जाएगा। 

निःसंदेह सुग्रीव स्वयं को अत्यंत ही सुरक्षात्मक घेरे में महसूस कर रहा था। लेकिन अचानक प्रभु श्रीराम जी ने कुछ ऐसा कह डाला कि सुग्रीव के तो प्राण ही सूख गए। भय के मारे उसकी रूह ही कांप गई। क्योंकि श्रीराम जी ने सुग्रीव से वह कह डाला जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। जी हाँ! श्रीराम जी सुग्रीव को संबोधित करते बोले कि हे वीर सुग्रीव! तैयार हो जाओ, समय आ चुका है कि तुम अब बालि को उसके द्वार पर जाकर युद्ध के लिए ललकारो। यह सुनकर सुग्रीव का मुख खुला का खुला रह गया, आँखें आश्चर्य से फटने वाली हो गईं। उसे लगा कि अरे यह श्रीराम जी ने क्या कह डाला। अवश्य ही वे मेरे संग उपहास या व्यंग्य ही कर रहे हैं। लेकिन भाई ऐसा भी क्या उपहास कि सामने वाले का कलेजा ही फटकर मुँह को आ जाए। बोले कि बालि से जाकर युद्ध करो। मेमने को कहो कि जाकर सिंह से भिड़े या कद्दू को कहो कि जाकर चाकू पर जोर से कूदो तो अंजाम तो किसी से छुपा नहीं होता न। ठीक वैसे ही जाकर बालि को युद्ध के लिए ललकारो तो परिणाम मेरी मृत्यु ही तो है। पूर्व की तरफ चलते−चलते श्रीराम जी यूं पश्चिम की तरफ क्यों लौट पड़े। प्रण बालि को मारने का किया है या बालि द्वारा मुझे मरवाने का? न बाबा न, मुझे ऐसा उपहास तनिक भी पसंद नहीं। लेकिन यह क्या श्रीराम जी की भाव भंगिमा तो कहीं से भी उपहास के चिन्ह समेटे नहीं है। 

तो इसका तात्पर्य श्रीराम जी सत्य कह रहे हैं क्या? लेकिन यह क्या धोखा है? कहा तो था कि वे ही बालि को अपने एक तीर में मार डालेंगे और अब अवसर आया तो मुझे ही युद्ध के लिए धकेल रहे हैं। भला यह कैसा प्रण और क्षत्रिय धर्म? श्रीराम जी का क्या है, वे तो वापिस अयोध्या लौट जाएंगे, बखेड़ा तो मुझसे खड़ा हो गया था। बालि से मुझे ही भिड़ना था तो पहले ही बता देते न। मैं व्यर्थ ही क्यों इस झमेले में पड़ता। न, न, न यह तो कदापि उचित नहीं है। 

सुग्रीव अंदर तक डगमगा गया। वैराग्य क्षण भर में छू मंतर हो गया। चंद पल पहले जो सुग्रीव ने कहा था कि प्रभु मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि सब त्यागकर केवल आपकी सेवा भक्ति करूं तो श्रीराम जी हँस पड़े थे। क्योंकि श्रीराम जी जानते थे कि सुग्रीव जब मैं किसी के समक्ष हूँ तो कोई भी भक्त होने का दंभ भर सकता है। लेकिन बात तो तब है न कि सामने साक्षात् यमराज हो और तब भी भक्ति भाव बना रहे। और देखो तुम्हारा भक्ति भाव ढेरी होता जा रहा था। प्रण किया था सेवा का, लेकिन प्राणों का मोह हावी हो रहा हो। सुग्रीव तो मानो सर्प के मुख में छिपकली जैसा प्रतीत कर रहा था। न मौत की रागनी से बच पा रहा है और न जीवन की स्वर लहरियों को अनसुना कर पा रहा है। न श्रीराम जी को छोड़े बन पा रहा है, न बालि को पकड़े चल पा रहा है। हो सकता है कि सुग्रीव को श्री हनुमान जी पर क्रोध आ रहा हो कि पवन पुत्र ने अच्छा फंसाया मुझे। अच्छा होता, श्री हनुमान जी को मैंने परीक्षा के लिए भेजा ही नहीं होता और पहाड़ी छोड़कर चुपचाप भाग जाता। लेकिन अब तो बीच मंझधार में फंस गया हूँ।

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सुग्रीव को यूं दुविधा में फंसा देख श्रीराम जी को दया आ गई। श्रीराम जी सुग्रीव को स्नेह व आश्वासन देते हुए कहते हैं कि सुग्रीव तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। बालि को तो निश्चित ही मैं अपने बाण से ही मारूंगा। लेकिन लड़ना तो बालि के समक्ष तुम्हें ही पड़ेगा। श्रीराम जी ने मानो अध्यात्म का पूरा सूत्र ही खोलकर रख दिया। कर्म सिद्धांत समझने के लिए प्रभु ऐसे ही जीवंत घटनाक्रमों का ही तो चयन करते हैं। जीव चाहता है कि बालि वध रूपी फल अथवा लक्ष्य मुझे यूं ही बैठे−बैठे प्राप्त हो जाए। मैं कुछ न करूं बस चुपचाप बैठा रहुँ और स्वयं प्रभु ही जाकर मेरा कार्य सिद्ध कर दें। परंतु प्रभु कहते हैं कि हे सुग्रीव! निश्चित ही बालि वध तो हम ही करेंगे लेकिन करेंगे छुपकर। हम सामने प्रकट होने की बजाए पेड़, लताओं के पीछे रहकर ही कार्य करेंगे। लेकिन हमारी यह कृपा तब ही होगी, जब तुम भी कर्म करने की अनिवार्यता व रीति का दामन नहीं छोडेंगे। यह तो मुझे भी पता है कि बालि को मारना तुम्हारे वश की बात नहीं। लेकिन मुझ पर विश्वास करके तुम बालि से भिड़ो तो सही। घबराना क्यों, मैं हूँ न तुम्हारे साथ। बालि मुझे नहीं देख पा रहा हो तो मुझे आश्चर्य नहीं। मैं उसके लिए छुपा हूँ लेकिन अपने भक्त के लिए नहीं, तुम तो मुझे देख ही पा रहे हो न कि मैं तुम्हारी खातिर छुपकर खड़ा हूँ। फिर भय क्यों, अविश्वास क्यों? 

क्या सुग्रीव बालि से युद्ध के लिए तत्पर होता है या नहीं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...जय श्रीराम

-सुखी भारती







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