Sawan 2026: Omkareshwar Jyotirlinga जहां विश्राम करते हैं Lord Shiva, जानें इस पावन धाम का History और धार्मिक महत्व

मध्य प्रदेश के नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की धार्मिक महत्ता का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि यहां शिव के शयन की परंपरा इसे विशिष्ट बनाती है। स्कंद और शिव पुराण में वर्णित यह चौथा ज्योतिर्लिंग समस्त तीर्थयात्राओं की पूर्णता के लिए अनिवार्य माना जाता है।
सावन का महीना चल रहा है। सभी श्रद्धालु महादेव की पूजा-अर्चना और प्रभु की कृपा पाने में लगे हैं। कई लोग सावन के महीने में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए जाते हैं, इन्हीं से एक है चौथा ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण जैसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, जो कि इंदौर से करीब 77 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, यहां पर रोजाना तीनों लोकों की यात्रा के बाद भगवान शिव विश्राम करने के लिए आते हैं। इसलिए इस मंदिर में भगवान शिव के विश्राम व्यवस्था, अनुष्ठान और शयन दर्शन का ध्यान रखा जाता है। आइए आपको यहां के इतिहास के बारे में बताते हैं।
ओंकारेश्वर के दर्शन नहीं किए तो तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है
हिंदू धर्म में सभी तीर्थ यात्रा के दर्शन के बाद ओंकारेश्वर के दर्शन करना व पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। यहां पर तीर्थ यात्री सभी तीर्थों का जल लेकर ओंकारेश्वर धाम में शिवलिंग पर जला अर्पित करते हैं, तभी सभी तीर्थ पूर्ण माने जाते हैं। वरना वे यात्रा अधूरी मानी जाती है।
मंदिर में 3 समय होती है आरती
बता दें कि, ओंकारेश्वर में कई मंदिर स्थित है। नर्मदा के दोनों दक्षिणी व उत्तरी तटों पर मंदिर बसे हैं। ओंकारेश्वर में ओमकार पर्वत का परिक्रमा पथ करीब 7 किलोमीटर लंबा मार्ग है, जो कि पक्के सीमेंट से बना है। रास्ते भर मन मोह लेने वाले नजारे देखने को मिलते हैं। परिक्रमा पथ पर सुंदर संगम स्थल भी हैं।
ओंकारेश्वर मंदिर में रोजाना 3 पूजा होती है। तीनों ही पूजा कराने के लिए अगल-अलग पुजारी है। सुबह के समय ट्रस्ट के पुजारी, दोपहर के समय सिंधिया घराने के पुजारी और शाम की पूजा में होलकर स्टेट के पुजारी पूजा करते हैं।
हर सोमवार को एक पालकी पर भगवान ओंकारेश्वर की तीन मुखों वाली सोने की मूर्ति को रखकर जुलूस निकाला जाता है। इस भव्य नजारे को देखने के लिए स्थानीय लोगों को भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं।
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